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Showing posts from 2019

कोलाहल

मेरे खुदा, जबसे तुमसे मुलाकाते हुई क्या कहूँ की जिंदगी कितनी खूबसूरत हुई..!! तुम्हारी हर एक बात, मुझे अनायास सिखला गई... नही कोई होता यहां अपना अरी, हर शख्शियत है पराई...!! अब तक जो न उलझी थी वो हर सूक्ष्म सी भी लड़ी... वो हर प्रश्न बौछार सुलझी..थी जब बस रही तेरे संग मैं खड़ी...!! दर्द पीड़ा यातना संघर्ष कथा मन के कोलाहलो की कथा.. दर्द की अभिव्यक्ति जब होती तब नई कविता बनती जाती...!! ऐ खुदा ,अब हटे कोलाहल सारे तूफान भी तो लगते है सितारे... गुम हु प्यार में ही तुम्हारे... बन गए हम बस तुम्हारे...!! बन गए हम बस तुम्हारे...!! - वृषाली सानप काले

माँ हिंदी का पत्र

प्रति, मेरे समस्त  हिंदी प्रेमी बच्चे.. एवं भारतवासी...!!       मेरे प्रिय बच्चो,      हजारों लाखों प्रेमयुक्त आशीष ...!!जुग जुग जी लो..!!लंबे समय से यह पत्र तुम्हे लिखना चाहती थी,परन्तु शायद वह वक्त अभीतक नही आया था।आज वक्त की मांग अनुसार एवं परमात्मा के आदेश अनुसार यह बात समस्त इंसानों तक पहुंचाना मेरा कर्तव्य बन गया है।बच्चो मैंने पिछले 70-73 सालों से देखा है कि,तुम लोगो मे लगातार मुझे लेकर एक गुमनाम सी लड़ाई चल रही है।मैन देखा है कि ,मैं व मेरी बहनों के अस्तित्व को लेकर तुम इतने विवादात्मक स्थिति में खड़े हो जाते हो कि कभी कभी एक दूसरे की जान के दुश्मन भी बन जाते हो।मैन देखा है कि,इस विवाद में सभी विकारों को बढ़ावा भी तुम देते हो।कभी घृणा,जलसी,ईर्ष्या,दुश्मनी,निंदा,परित्याग,हिंसा तक करने पर आ जाते हो। बच्चो,पर तुम में से कई लोग यही नही जानते के आखिर मैं कौन हूं एवं कब से हूँ...! बच्चो मेरा अस्तित्व नाही स्वतंत्रता के वक्त से आया है ना ही उसके बाद मैं जन्मी हूँ..!!**हा, यह बात है कि जब मेरे व परमात्मा के अति प्रिय बच्चे इस सृष्टि के रंग...

कृष्ण

भारत एक महान देश के साथ साथ अद्वितीय इतिहास की संपदा से युक्त अलौकिक राष्ट्र है। सोने की चिड़िया है..!! ईश्वर का प्रिय देश है..!! अनुपम, महत्तम, श्रेष्ठतम, उच्चतम है..!!   भारत की साहित्यिक संपदा ही भारत की सही परिचायक है..!! भारत को विश्व के सामने चिरस्थापित करने में जिसका अविभाज्य भूमिका है..!!    लेकिन ऐसा होते हुवे भी, बावजूद इस गरिमा के, यह भी एक कटु सत्य है कि, भारत की अत्यंत गरिमायुक्त सत्य ज्ञान को मिथक ने नष्ट कर दिया है..!!  जी हाँ, मिथक ही वह है जो हमे सत्य से बहोत दूर तक ले गया है। हमने कभी भी मिथक की जड़े ढूंढने व जानने की कोशिश नही की, बस आंख बंद कर उसे सत्य के रूप में स्वीकार किया, बिना किसी शिकायत व आशंका को उठाये...!! क्यों..?? क्योँकि उन बातों का सम्बंध केवल लोगो की धार्मिक व भावनिक जज्बातों से होने के कारण कोई भी व्यक्ति सत्य को प्रत्यक्ष रखने व जानने की कोशिश से दूर होते ही रहे.. कभी भी नजदीक नही आये...!!   मिथक की सुरुवात उन दो महान व श्रेष्ठ महाकाव्यों से ही हो जाती है,जिनके ऊपर ही समूची साहित्यिक संस्कृति, सामाजिक, धार्मिक,...

जन्मदिन

जन्मदिन... अर्थात जन्म का दिन..!! हर एक के लिए यह दिन महत्ववपूर्ण होता है, परन्तु क्यो..?? जन्म लेकर हम इस सृष्टि रंगमंच पर अपनी भूमिका निभाने आते है, यह अत्यंत आनंद व खुशी की बात है। तथापि हर साल जन्म दिन क्यो मनाया जाता है..?? हर साल की बढोउती का तो यही अर्थ निकलता है, कि हमारी जिंदगी का एक साल गुजर गया..!! एक एक करते कितनी सारी जिंदगी हम गुजार देते है...!! कभी तो पीछे मुड़कर देखना चाहिए कि -  आजतक की जिंदगी हमने कैसे गुजारी...??  कितनो की जिंदगी सुधारी..??  कितनो की जिंदगी बिगाड़ी..??  कितनी आंखे पानी से भर दी..??  कितनी आंखों का पानी पिया..??  कितनो की दवा ली..??  कितनो की बद दुवा ली..??  कितनो को दुवा दी..??  कितनो को बद दुवा दी...??  कितने पल सफल बनायें..??  कितने पल बेकार गवाए..??  कितने मूल्य संस्कार स्वीकार लिए..धारण किये..??  कितने संस्कार नष्ट किये..??  इन सबका लेखा जोखा करने का पल याने निश्चित जन्मदिन...!! अगर इन प्रश्नों का उत्तर हाँ है... तो बहोत बढ़िया...!! परन्तु एक भी ना ह...

प्राप्ति

जिंदगी का नाम रखे तो क्या रखे .  ?? ये भी एक अनूठा सवाल है.. क्योँकि दुनिया के दस्तूर है अजीबो गरीब सब इसमें मशगूल है...!! फिर भी यहां यही दौर है प्राप्ति क्या यही छोर है.. इसी चकाचौध में मुझे क्या मिला .. पता नहीं मुझे ..!! इंसा इंसा की हकीकत है किसी की दो वक्त की रोटी, तो किसी की चाय की प्याली, तो किसी की हप्ते की पैकेट मनी, तो किसी की साड़ी वो भी मेहँगी... यही तो रोजाना की उपलब्धि है। किसी को नाम, किसी को दाम, किसी को धाम.. किसी को राम की दिल्लगी है। इन सबमे मैं कहाँ हूँ.. मैं सबकी सुनता हूं मैं सबकी बुनता हूँ.. मैं सबकी चुनता हूँ.. मैं सबकी लिखता हूं मैं दर्द से चीखता हूँ.. ये जो मैं होता हूँ उनका भरोसा होता हूँ.. ये जो मैं रोता हूँ उनका पलिता धोता हूँ.. ये जो मैं होता हूँ यही तो मैं पाता हूँ...!! मेरे द्वार होते है खुले सदा घर के भी व मन के भी झूले.. किसी की भी बात सुननेवाले हर समय प्रस्तुत रहनेवाले.. शिकायती जग के आंगन में  हौले हौले प्रीत का मरहम लगानेवाले.. हर किसी की आस व प्यास ...

शिकायत नही है

मुझे शिकायत नहीं  है अपनी सिसकियों से ... ना ही अपनी आहो से.. मुझे शिकवा नही है अपने व्यक्त-अव्यक्त रिश्तों से .. ना ही अपने रिश्तेदारों से.. मुझे गीला भी नही है अपने दर्द से लथपथ अतीत से.. ना ही अपने दर्द के दाता ओ से.. मुझे रुसवाई नही है अपने मासूम सपनो से.. ना ही संघर्ष रत इरादों से... मुझे नाराजी नही है अपने न समझे अनुभवों से.. ना कभी भी कहे न कहे जज्बातों से.. तभी तो आज... मुझे दिललगी हुई न दुनिया से.. न शिकायत जिंदगी से... ना ही कभी मौत से...!! **** - वृषाली सानप काले

कलियुग

आज इस कलियुग की दास्तान में.. अच्छाई व बुराई की धमासान लड़ाई में.. नेकी, ईमान के साथ की बदसलूकी में.. वफ़ा व बेवफ़ाई के लगते धब्बो में.. जात व धर्म के बेख़ौफ़ युद्ध की रक्तपात में.. प्यार, चाहत व नफरत की भड़कती आग में.. जलते हुवे देखा हमने सिर्फ एक इंसान को..!! तब सिर्फ़ एक सवाल तमाम संवेदना के साथ, उठा समूचे मन मस्तिष्क में.. वास्तविकता क्या है... आखिर ये... ये सब इंसान के लिए है ..?? या ये इंसान इनके लिए...?? कहाँ है इंसान इनसे सुखी...?? फिर क्यों भुगते ये सरदुःखी..?? किस स्वार्थ की प्यास में.. सहना ये जानलेवा, पीठ पे बोझा, ढोते रहना दुखी कलेवा...?? इस अनकही बेदाग पीड़ा से रोते तड़पते इंसान को आज हमने देखा..!! दो रोटी के चार टुकडे कमाके बच्चों का पेट भरना बस यही तो है मेरा जीवन...!! कभी कभी तो दवा नहीं, दुआओं पर ही, बच्चों का बुखार भी दांव लगाया है..!! घाव नहीं भूख से बिलखते जीवन गुजारा है। जात कहाँ अजी धर्म नहीं, हमारी तो भूख बला है। रोटी कपड़ा लड़ाई है। हमने तो जीते जी मुर्दों-सा, जीवन जिया है ! सारे कलियुग हमने तो इंसानों को हर पल सड़क पर, दम...

अतुकान्त काव्य

  हिंदी यह एक विश्व् भाषा है, तथापि हिंदी से अभ्यास तथा ज्ञान की दृष्टि से जिनका सम्बन्ध नही आता, वे हिंदी की महत्ता, गरिमा तथा वास्तव सत्य अस्तित्व को पहचान ही नही पाते।    अधिक तर राष्ट्रभाषा के रूप में प्रमुख संपर्क भाषा हिंदी को संविधान में महत्वपूर्ण स्थान मिला, तथा अन्य 22 भाषाओं को राष्ट्रीय भाषा के रूप में गौरवान्वित किया गया। इन भाषाओं में अंतर्गत मात्रा में यह संघर्ष सदैव किसी न किसी दुखती रग के समान कहि भी एवं कभी भी जो छिड़ जाता है।      कभी साहित्यिक संपदा, कभी भाषिक सौदर्य, कभी व्याकरणिक चोटिया, तो कभी अस्तित्व के निम्न एवं उच्च स्तर को लेकर। हर भाषा जो एक व्यक्ति के विचार दूसरे व्यक्ति तक पहुंचाती हैं, भावों की स्तरीयता को सिद्ध करती है, वह वास्तव में परिपकव एवं श्रेष्ठ भाषा हैं...!!बच्चे को जन्म देने वाली माँ की कभी योग्यता सिद्ध नहीं की जाती, वो जन्म देकर जो उपकार करती है उसको किसी भी परिमाण, स्तर, पुरस्कार तथा तुलना में बिठाकर स्थापित करने की चेष्ठा करना ही एक तुच्छ प्रयास होगा। उसी प्रकार भाषा भी ईंश्वर की मनुष्य को मिली हुई एक अ...

माझे...

जीवन भर आपण है माझे ते माझे करीत सर्व वस्तु गोला करीत बसतो परंतु जलताना ते सर्व तर एथेच सोडतो मग त्या कमावतो तरी का..?? त्याचा मोह तरी का..?? जर कफ़न पण आपले स्वताचे नसते...!! या भौतिक जगतात सर्व वस्तु मिलवित आणि त्या वस्तु साठीची विवादात्मक जीवन पद्धति अखेर काय देते..?? काहीच नाही...!! केवळ मानसिक व भावनिक संघर्ष...!!    अखेर मात्र माझे ऐसे कोणीच नसते आणि सोबत ही काहीच नसते..! आयुष्याच्या खड़तर प्रवासात खूप गोष्टी सदैव घडत असतात. काही शिकवून जातात तर काही विचारशील बनवितात. आत्मचिंतन आणि दर्शन यांची भेट घालूनदेतात. सूर्योदयापासून सुर्यास्तापर्यंत या जीवन प्रवाहित ऐसे अनेक जण भेटतात..,  जे जग आणि जीवन यांची परिभाषा उलगडवून सांगतात फक्त अनुभूतिच्या जीवावर...!! सगळेच जीवन भराचे सगे सोबती नाही बनत, काही अल्प तर काही दीर्घ हिशोब घेवून येतात, काही विनाकरण त्रास दायक ठरतात तर काही विनाकरण प्रेम दायक ही सिद्ध होतात, काही दिव्यतेच्या गाभार्यात स्थान प्राप्त करतात तर काही नैतिकतेच्या रासातळाला ही जावून बस्तात.. खूप जण आपल्या अगदी सहज जवळ येतात आणि अगदी सहज दुरावता...

हम भी धीरे धीरे

चाहने लगे उनको हम भी धीरे धीरे हाँ हो चुके उनके तो हम भी धीरे धीरे। नकारा भी जाए ना ये आशियाना दिल का..।। खो गए बाहो में उनके हम भी धीरे धीरे। फ़साना आशक़ी का न बनाना था हमको..।। बाजी इश्क़ की ही  हारे हम भी धीरे धीरे ।। नुरे मोहोब्बत कभी बनना था हमको..।। टूटे संजीदगी के द्वारे हम भी धीरे धीरे।। सबका होकर ही रहना था हमको..।। हाय कम्बख्त मेरा भी हुवा धीरे धीरे।। - वृषाली सानप काळे

नारी शक्ति

सभी प्यारी प्यारी सहेलियों को मेरा प्रेम युक्त नमस्ते...!! आज महिलादिन के शुभ अवसर पर ढेर सारी बधाईया...!! नारी शक्ति को सलाम🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹 नारी शक्ति *********************  तेरे हाथों जिंदगी की कहानी बनेगी नारी है नारी तू ही एक रवानी बनेगी...!! सांसे से ही लहरे रोक लो दुर्बलों के ही सहारे बन लो डूबती कश्तियाँ तू ही संवारेगी तेरे हाथों... तेरी शक्ति को दे परस्तिश तेरी मुक्ति पे नाही बंदिश खुद के संग जग की जंजीरे चुनवायेगी तेरे हाथो... तू ईश्वरीय शक्ति का है प्रतिरूप चन्दन सा जी कर बनी है धूप पवित्रता की अग्नि से आत्मा को परखेगी...!! तेरे हाथों.... - वृषाली सानप काले

हिंदी कविता

साजन क्यों तरसाये जिंदगी हमे क्या बतलाये साथिया तुम्हे... क्यों भर आये अश्क़ ये सुने क्यों हुवे तेज ये धड़कने.. ये खाती मर्यादा हमेशा हमे उलझन में ही डुबाये हमे.. जैसे भँवर में फँसी कश्ती उजाड़े ही भावना की बस्ती.. साँसे संग हर आह तुम्हारी दिखाऊ है कर्जदार तुम्हारी... चाहत इबादत इनायत भी संस्कारो की है इजाज़त भी... खुदा के साथ तुम्हारी भी ऋणी है सारी जिंदगी भी.. जग को हो अमान्य फिर भी तू मेरी इज्ज़त है मोहोब्बत भी...!! हक वफ़ा की चाहत तेरी पूजे हर आदत हम तेरी.. रिश्ते कर्मो से बंधे हमारे हम बंधे जज्बातों से तुम्हारे...!! बड़े कच्चे जग के सारे धागे हम न तेरी मोहोब्बत से भागे..!! निभाना अपनी वफ़ा के वादे पाकिज है साजन मेरे इरादे...!! 🙏 वृषाली सानप काळे

पहेली

एक अजीब पहेली हुं मैं जितना सुलझावोगे उतनी उलझुंगि मैं जितना भी खोलोगे। वो पहेली ही रहनी होगी वरना दुनिया टूटेगी पहेली गर ये सुलझेगी तो रिस्तो को बिखेरेगी। कुछ कड़वे सच खोलेगी तो गुलिस्तो को तोड़ेगी जब महकेंगे फूल सारे तो कांटे भी मुरझायेगी। 🤔 - वृषाली सानप काळे

अब तेरे....

न पालो सीने में गम हाँ है हम तेरे सनम.. न जज्बात से हो नम हर साँस से तेरे सनम..।। लाख चाहा के दूर हो पर देख इतने मजबूर हो.. कोशिश बेकार सब हो माना तुम मेरे ही हो..।। सारे तत्व आदर्श हारे बेकार चाहत के मारे ढूंढे बस तेरे सहारे पहुंचे तेरे ही द्वारे..।। थक हाथ ही जोड़े हम अब हमे अपनाओ तुम.. तन मन से कुर्बान हम काँधे दो अपने सजन...।। - वृषाली सानप काळे

एक कविता मेरी

हिंदी की सेवा में एक कविता मेरी राष्ट्र की पूजा में एक अर्चना मेरी। भाषा की प्रार्थना में एक आराधना मेरी। भारत की पहचान में एक साधना मेरी। हिंदी की महत्ता में एक जिज्ञासा मेरी। राष्ट्रीयता की धरोहर में एक याचिका मेरी। भाषिकता के विवादों में एक मुलाईजा मेरी। प्रांतीयता की घोषणा में एक संवेदना मेरी। हिन्दुस्थान की मिट्ट में एक मुरलिया मेरी। 🌹 - वृषाली सानप काळे

खामोशी

मिलन की प्यास बढ़ेगी इसलिए अपनाई बेरुखी तड़प ही करीब लायेगी इसलिए अपनाई ख़ामोशी।। दिलों का तो हुवा मिलन आत्मा को भी संजीवन अब कैसी है अड़चन जब बना है तू साजन ।। रुत बदली है बदलेगी सुध निकली है निकलेगी रुख बदली है सुधरेगी परत उजली है उजलेगी। भरोसे पे ही चले जहाँ क्यों शको का फासला वहाँ जिंदादिली की है बात यहाँ आ बाहो में बस जा जानेजाँ ।। 🌷 - वृषाली सानप काळे

बेहद

हर बीते नाज़ुक पल में सदा रहे शेष कोई मन में  हल्के से जो आये मन में  छू ले छुपाए हमे सीने में हक जताये दिल के घर में  खेले, कूदे, लड़े पल पल में न मैं न वो मालिक घर में  दोनों भी मेहमा खुद के घर में  न कोई स्वार्थ की आशा में न शिकायत कोई निराशा में नाजुक भाषा समझे पल में बस ये दो दिल, दिल ही दिल में ...!! यही तो इश्क के रंग में अद्वैत बनाये पल ही पल में..!! बेहद को बेहद की अदा में बेहद से बेहद गन्ध दे पल में..!! अनमोल क़ीमत भर दे मन में  कस्तूरी सा पावन महके मन में ..! शायद अमिट जाने मन में  एकांग, अद्वैत प्राण हम है हम में..!! *** - वृषाली सानप काले

सम्मोहन

सम्मोहन एक शक्ति है..!! एक अद्वितीय कला है, जिसकी सहायता से हम हर असम्भव कार्य को संभव कर सकते है।    लेकिन ये सम्मोहन आखिर है क्या..?? मनुष्य तथा अन्य सृष्टि के बीच का लगाव एक सम्मोहन ही तो है। एक दूसरे से प्रेम भी सम्मोहन ही तो है। किसी भी बात की नशा भी तो एक सम्मोहन ही है।  जब भी हमारा मन, हमारी आँखे किसी सुंदर चित्र या वस्तु को देखता है तो स्वतः अपने आप एकाग्र होता चला जाता है, तथा अनायास उस चीज के प्रति खींचते चले जाते है, यही तो है सम्मोहन..!!     कई बार ये भी तो होता है कि हम जीवन मे कोई एक ऐसा पाते है कि केवल उसकी बात हम स्नायास सुनते जाते है। जो हमें निरन्तर सुझाव देता चला जाता है, जिसके हम प्रभाव में आ कर अपने आप उसका कहना मानते चले जाते है बिना किसी दबाव के..!! ये सम्मोहन ही है।     सम्मोहन जीवन के लिए जिंदगी के लिए आवश्यक भी है, परन्तु ये भी आवश्यक है कि हम किस बात के प्रति सम्मोहित हो रहे है...??अगर हम ज़रा भी किसी व्यक्ति, वस्तु, पदार्थ वा वैभव, प्रणय कि तरफ़ आकर्षित हो रहे है। तो यह उनकी सम्मोहन शक्ति के कारण ही हो रहा है, ...

હૃદયનું ઝરણું

સપના માં તો રોજ આવો..  હકીકત માં આવો કોઈ દી હું કોઈ લેખક નથી પણ..  તમને આનો હુનર સારો 👣 મને હતું કે તમે કરશો..  અલક-મલક ની વાત  પણ તમે તો જાણે મૂંગી,  તસવીર બનીને બેસી ગયા..  👣 મારાં અનુભવો,  ઘટનાઓ..  એવાં કે જેનો કોઈ ક્રમ નથી  બસ તારાં વિચારોથી આબાદ મારી દિલ ની સમગ્ર દુનિયા  👣 - 'અનજાન મુસાફિર' 

મુક્તક રચના

તમારી આંખોની શરારત યાદ આવી જયારે પહેલી મુલાકાત થઈ ત્યારની તારી સાથે વિતાવેલી ક્ષણોની યાદ ઝરણું બનીને હૃદયમાંથી નીકળે છે --------- મૈં તો સફર માં જ માનું છું સાથી સફરમાં જ તો જ્ઞાન છે સાંપડયું જ્ઞાન લેવાં થી અનુભવ થાય છે તું બની છે રાધા, ને મેં બનું કૃષ્ણ --------- તારાં બધાં સવાલ નો જવાબ તું છે તારાં પ્રત્યે પ્રીત બંધાયેલી છે એટલે આવી તારી લાગણીઓનાં પ્રવાહમાં પાછો ડૂબકી લગાવી પામું તારો પ્રેમ --------- - 'Anjan Musafir'

साथी

कुछ तो मजबूरियाँ है जीवन में साथी, तेरी जुदाई से प्यार किस को है जाना 🌹 तेरे दिल में रहेंगे, एक याद बनकर तेरे लब पे सजेंगे, मुस्कान बनकर  🌹 कभी मुझे अपने से, जुदा मत समझना  तेरे साथ चलेंगे, आसमान बनकर 🌹 - 'अनजान मुसाफ़िर' 

हम ही किसीके हो न सके

हमने तो कुछ न चाहा रब से तेरे पहले बस मागु मौत कब से। हमने तो कुछ न चाहा रब से तुझसे चाहू सारे गम मैं कब से। हमने तो कुछ न चाहा रब से जीवन हो शुरू बस तेरे दम से। हमने तो कुछ भी न चाहा रब से दे दू दुवा मैं तुम्हे हर महफ़िल से।। हमने तो कुछ भी न चाहा रब से तू मेरा बस बनी धरती ये जब से।। हमने तो कुछ भी न चाहा रब से हम एक दूजे के है लाख जन्म से।। हमने तो कुछ भी न चाहा रब से तरसे मेरी साँसे मिलन को कब से धरती बनी ये शायद जब से तेरे पहले चाहू मौत मैं कब से..। 🌴 वृषाली सानप काळे

कसूर

तुझे चाहा क्या कसूर किया तुझे पूजा ये कबुल किया। तेरा सब दिन दीदार किया प्यार तेरा एख्तिहार किया।। तू रूठा तो ले पानी बने तू टूटा तो ले सुई बने तू झूठा तो ले धागा बने तू पराया तो ले सगा बने जीव तुम पर कुर्बान किया।। तू पत्थर तो मैं लोहा बनु तो परिस तो मैं सोना बनु तू मिटटी तो मैं बीज बनु तू भट्टी तो मै मद्य बनु।। तुम पर तन भी साभार किया। 🏵️ वृषाली सानप काळे

बाजी

लम्हा-लम्हा भी बीत चूका तनहा तनहा सी लिख चूका... अतित फिर न आ सका इतिहास को दफना सका.. क्यों सपनो का रंग फीका क्यों अपनों का संग बिता... कथनी का सब खेल रुका करनी का अब मेल जीता.. आ जीवन का रूप दिखा ला प्रेम का प्रारूप सीखा...!! जग को कदमों पे झुका अब ना हो कोई भूखा...!! नया ये इतिहास लिखा लकीरों को तक़दीर सीखा....!! - वृषाली सानप काळे

याद

तुम्हें भूलने की कोशिश में तुम याद ही आते गए..।। तुम्हे सुनने की कोशीश मे दिल आबाद ही करते गए...।। जान मेरी तो ले जाएगा ये जुदाई का हसी तेज़ाब..।। बेवफ़ा यु फँसा ही जाएगा तेरी वफाई का ये नक़ाब...।। यादो के भूचाल से न टूटो यादो को सदा ही तुम लुटो .।। यादो में ही प्यार, समझो यादो में ही दिलदार ढूंढ़ो।। पर आहो को साथी कभी ना बढ़ाना तुम..।। हर आहो को मनाना देखो साँसों को न भूलना तुम..।। तेरी फूलों को हम तो सजदे में सदा बिठाए है..।। तेरे शेरो से ही तो हरदम हम राहो को सजाये है...। - वृषाली सानप काळे

इल्तजा

रंग में रंगने की है इल्तजा भंग न करना रे ये प्रार्थना। ज्योत हुं दिए की तू मेरी आभा गहराई नाप लो मैं तेरा गाभा अद्वैत दोनों ना शमा न परवाना।। रिश्ता है पीड़ा दर्द की भाषा जिस्म है सजा एक है आत्मा अमर्त्य जीवन ही अभिलाषा।। रंग न कोई दंभ न कोई संग न कोई साथ न कोई श्याम हो मेरे अब मैं बनु राधा।। 🍁 वृषाली सानप काळे

पर....

जग सोया भी नहीं पर सोया है रब रोया भी नहीं पर रोया है..!! गीत गाया भी नहीं पर गाया है सब खोया भी नहीं पर खोया है। गम देखा भी नहीं पर देखा है कब्र लिए भी नहीं पर लिखा है। नम नेत्र किया भी नहीं पर किया सब थम गया ही नहीं पर गया है..। रंग छुटा भी नहीं पर छुया है संग रूठा भी नहीं पर खोया है..। अंग टूटा ही नहीं पर टूटा है मन मिटा ही नहीं पर मिटा है। तभी तो सब लूटा ही लूटा है तभी हर जंग में हम मिटा है। - वृषाली सानप काळे

मिलन

पढ़ना जरा गौर से वेदना के वेद को रखना जरा तौर से कामना के वेद को।। मचल जाए भी आतंक खेलने को फिर भी बहा देना बवंडर के लेद को।। न करो प्रेम जिश्म भरे लाश को जरा सा तो समझो मन के भेद को।। जमाने है गुजरे पूजने विवेक को खरा खरा ही रखो आत्मिक अभेद को।। सुनो उस मिलन से मिलो मन मेल को नहीं आस कोई अब शरीर संवेद को।। 🌲🌲🌲 - वृषाली सानप काळे

न करो ऐसे

न करो ऐसे करतब..  के खफ़ होे जाए हम..।। न भरो ऐसे पनघट के आहो से भर जाए हम।। न डरो ऐसे हमदम के सहम हि जाए हम..।। न हारो ऐसे प्रियतम के मर ही न जाए हम..।। न गिनो ऐसे पतझड़ के मौसम में बिखर जाए हम..।। न लिखो ऐसे आफताब के जल ही जाए हम...।। न छूवो ऐसे दामन के बेशरम होये हम..।। न मलो ऐसे कागज के मिट जाए ही हम..।। 🌲 वृषाली सानप काळे

तनहा

मेहसूस नहीं था की तन्हा हु आजकल तुमने सवाल छेड़कर अच्छा न किया।। एहसास नहीं था की दिल रोता है अक्सर तुमने खरोचे निकालकर अच्छा नहीं किया। शिकवा नहीं था इन रंजो गम का शायद तुमने घावो को रौंदकर अच्छा नहीं किया। गीला नहीं था भले बाज था ये जीवन तुमने फांसा फेंककर अच्छा नहीं किया।। दाग नहीं था की बेदाग़ ही है जीवन तूने ताने बेतुके कसकर अच्छा नहीं किया।। इल्ज़ाम नही थी पर फक्र था खुद पर तुमने दुश्मनी जताकर अच्छा नहीं किया।। जीना तो नहीं था हमे मरना ही तो था तुमने जीते जी मारकर अच्छा नहीं किया।। 💎 - वृषाली सानप काळे

हे ईश्वर तू ज्ञान सीखा दे...

मंदिर बांटा मस्जिद बांटा बाँट भी चुके भगवान को.. हे ईश्वर तू ज्ञान सीखा दो इस नादान बने इंसान को...।। आचार विचार व्यवहार से ही ये पहचाने धर्म को.. ये बँटवाये साक्षात सभी जीवन के भी हर कर्म को.. अरे धर्म बांटा, कर्म बांटा बांट चूका है कर्म काण्ड को.. हे ईश्वर तू...... ।।1।। प्रांत-प्रांत के विभेद से तो इसने बँटवाई जमीन भी... बाँट चुके सारा अमन भी दुनिया भी बनी सारी अंधी.. अरे जमीन बाँटी, अम्बर भी बाँटा, बाँट चुके इंसान को.. हे ईश्वर तू... ।।2। पूजा से पहचाने प्रथा को, सब बंटवाए भूले ये इंसान.. तन का कपडा, पोशाख ये आज बनी इनकी पहचान.. अरे पूजा बाँटी, प्रथा बाँटी अरे बाँट चुके पोशाख को... हे ईश्वर तू.. ।।3।। बस जाँत, भाषा, धर्म, प्रांत के बिच पीसे सारे साहित्य.. विधा के बँटवारे से जन्मे प्रांतीयता का हर आदित्य.. अरे विधा बांटी, कथा बाँटी बाँट चुके है हर भाषा को.. हे ईश्वर तू.. ।।4। पूजन से ही जन्मे कारण यहाँ सबने है तन भी बांटा.. भक्ति का साधन है जो मन पर अंधेपन में मन भी बांटा... अरे तन भी बांटा, मन भी ...

जीवन रास ना आए

गुरु बिन जीवन रास न आये गुरु पाये तो सारा जग पाये..।। गुरु अंधे की लाठी जैसा गुरु कस्बे की माटी जैसा मिट-मिट कर जो उपज लगाए.. गुरु पाये तो सारा जग पाये..।। गुरु शिष्य का नाता ही ऐसा कुम्हार मिटटी का रिश्ता जैसा मार मार के नेक मूरत जो बनाये गुरु बिन जीवन रास ना आये..।। गुरु मिले तो चारो धाम हमारे गुरु होले तो सत जन्म हमारे गुरु से युगों की भी पूंजी पाये.. गुरु बिन जीवन रास ना आये..।। 💐🙏💐 - वृषाली सानप काळे

घर अपने जा तू आत्मा

इस तन ने तुमको क्या दिया अब घर अपने जा तू आत्मा..!! कभी धागा टुटा रे रिश्ता टुटा हर परिक्षा में रे तेरा सब्र लूटा अब कर भी दे तू इसका खात्मा। अब घर अपने जा तू आत्मा।। तन के कर्म में ये मन था सर्द क्या झाड़ता तू रे उसकी गर्द अब न बन तू उसका रे बालमा । अब घर अपने जा तू आत्मा।। सिद्धान्त तथा व्यवहार के बिच आदर्श में था आचार भी सच पर होता ही गया तेरा खात्मा।। अब घर अपने जा तू आत्मा।। तेरी सादगी से तो ये तन बचे तेरी बंदगी से ही ये मन बचे पर तनमन न गाये तेरा चालीसा अब घर अपने जा तू आत्मा।। ⭐ - वृषाली सानप काळे

बाप

किसको क्या समझाए क्या होती है ये कसक.. बाप बिना दुनिया में ओलाद की हालत...।। पग पग पे हो संघर्ष या फिर हो जाए हर्ष कमजोर ही पड़ती है उसे सहने की ताकत..।। बाप बिना दुनिया में.. जहाँ बनता है हैवान ओर जीवन कब्रस्थान.. एक अनाथ का सबब ना ला पाये रिस्तो में दमक..।। बाप बिना दुनिया में.. मिले पैसा ताकत, स्वर्ग अनोखा है उसका वर्ग.. उस हिमालय व्यतिरिक्त बने जीवन भी आफत..।। बाप बिना दुनिया में... बाप ही होता है खिवैया तारे उसकी जीवन नैया कोई क्या दिलाये बाप क्या बाप की भी क़ीमत..। क्या समझाए कीसको कया होती है कसक.. बाप बिना दुनिया में.. 💐 - वृषाली सानप काळे

शर्त

कोई शर्त होती नहीं प्यार में न प्यार शर्तों पे किया हमने...।। कोई दर्द टिकता नहीं प्यार में न दर्द से नाता जोड़ा था हमने..। कभी सर्द हवा को छुवा यार ने न मौसम से दिल लगाया हमने। किसी मर्ज से दिल ही नहीं माने दिल्लगी को न सजाया तुमने..। चाहत में वफ़ा को ही पुजा हमने क्यों शर्तों का इल्ज़ाम लगाया तुमने। ईमान वफ़ा को ही अपनाया हमने न टिकने की बद्दुआ कहा तुमने..?? ~~~~~~~~~~~~~~~~~~ - वृषाली सानप काळे

गुरु

अंतर्मुख तथा गंभीरता से सिखलाए बनो तुम निरहंकारी..। गुरु ही तो जीवन धारा की भवसागर से नैया पार करी..। बन सच्चा मधुर तू  सेवाधारी न गाये महिमा न अहंकारी..। सहनशीलता का कुशल व्यापारी गुरु बिन कौन यह व्रत आचारी.। गुरु ज्ञान सागर मैं तो एक सिंधु गुरु पुरवैय्या मैं तो एक बिंदु...। गुरु भास्कर सम मैं तो दीपक हु गुरु महत्तम मैं तो नतमस्तक हु.। ऋण ऋण में तेरे तो मैं डूबा हु कण कण गुरु का अब हिस्सा हु। ~~~~~~~~~~~~~ - वृषाली सानप काले 

जरुरी है

जिंदगी को जीने के लिए, एक मुलाक़ात जरुरी है..।। ताजगी को निभाने के लिए अब महकियात जरुरी है..।। बंदगी को जताने के लिए अश्क़ो की बरसात जरुरी है..।। सादगी को बताने के लिए प्रीत के सादे अल्फाज़ जरुरी है.।। पाकीजगी के खाते के लिए अब इबादत ही जरुरी है..।। आवारगी को मिटाने के लिए अब तहकीकात जरुरी है...।। दोस्ती को निभाने के लिए अब थोड़ी मोहोब्बत जरुरी है..।। आशक़ी में मरने के लिए अब चाहत की अदावत जरुरी है..।। ~~~~~~~~~~~~~~~ - वृषाली सानप काले

भोगी

कर्म सिद्धांत परिक्षा ही लेगा योग सिद्धांत तपा ही देगा भोग सिद्धांत रमा ही लेगा सन्यस्तता वीराना ही देगा रम जा तो फिर जानेगा जीवन सफल तब मानेगा ज्ञान ज्ञानी वित् राम रागी विरक्तता ही सम्मान देगी संभव असंभव झुल्सायेगी आशा निराशा भरमायेगी नित दिन साधक बन रोगी तभी मुक्ति भोग से होगी..।। ⭐ - वृषाली सानप काले

खुद की खुद के लिए रूहानी सेवा

मैं अत्यंत पवित्र आत्मा हु। मैं शक्ति स्वरूप आत्मा हु। मैं आत्मा इस देह की मालिक हु। मैं, इस देह की मालिक आत्मा इस देह में स्थित समस्त भटकती हुई सूक्ष्म अति सूक्ष्म आत्माओ को आदेश देती हूं, इस देह से बाहर निकलो। इस देह में रहकर कोई भी फायदा नहीं। ऐसे भटकते रहने से बेहतर मुक्ति पाओ। तुमको मुक्ति केवल परमपिता परमात्मा देगा। अन्य कोई भी न राा,म न कृष्ण, न सीताा, न राधा, न हनुमान, न जगदम्बा कोई भी तुमको मुक्ति नहीं दे सकता। परमात्मा से डरो नहीं। वो किसीको सजा नहीं देता वो तो प्रेम का सागर है। वो प्यार देता है, दुख हर्ता व सुख करता है। मनुष्य के कर्म उसको दुख देते है। समस्त भटकती आत्माओ निकलो, आंखों से, माथे से, चेहरे से, गले से, गालों से, भृकुटि से, हर जगह से निकलो जाओ आसमान के पास जाओ। आगे बढ़ो। सीधे आगे चलो। परमात्मा से माफी मांगो वो जन्म जन्मानन्तर की तमाम गलतियों के लिए तुम्हें माफ कर देगा। जाओ आत्माओ मुक्ति हासिल करो। खुदा मुक्ति बांट रहा है। संगम युग में ही मुक्ति मिलती है। अन्य किसी भी जन्म में मुक्ति नही मिलती। खुद ही खुद पर कृपा करो। उठो आत्माओ उठो, मुक्ति की डगर ...

किस्मत

जल्द असर करती है तेरी दुआ  मुश्किलों से उभरी शख्सियत कहती है कैसे कहे, हम अब उससे किस तरह हमें अक्सर किस्मत की तलाश रहती है माँगू मन्नत खुद के लिये कभी फ़रियाद वक्त के सितम सहती है हँसना चाहती हूँ खुलकर मैं वो मेरे आँसुओ में बहती है करती है पूरी ख़्वाहिश तब मेरी जब रूह मुझसे 'अलविदा'  कहती है 🌹 - स्नेहा कोळगे

तेरी कहानी

शाखों के पत्ते कहते है मुझसे तेरी कहानी... दूर चली आती हूँ उनसे मैं... मुझे आज भी तुझसे पुरानी शिकायत है... गिरनेे लगते है पत्ते फिर शाखों से... हवा के झोंको से इर्द गिर्द घूमते घूमते टकराते है... पैरोंसे... विरान हो जाती है, वो डालियाँ मगर वो पत्ते मेरा रुख करते है.. कहते है डलियों से रुको...उसे.. मनाकर आते है... मेरा गुस्सा बन बैठता है मेरा ग़ुरूर... पत्तों से छलकता है तेरी चाहत का नूर... रुक  जाती हूँ मैं इक पेड़ की छायातले टप टप करती बारिश की बूँदो को, हाथों में समेटने के लिए लेकिन... फिर इक पत्ता आता है हथेली पर तेरा जिक्र करने के लिए... याद आते है वो लफ्ज , जो तूने कहे थे इकरार-ए-मोहब्बत में रखा है... वो बेशकीमती तोहफा ... सहेजकर... इक सुखा पत्ता ले रहा है साँसे.. बंद किताब में... ©स्नेहा कोळगे

सिया की मौन पीड़ा

सुनो.. राम के दूत आये हैं तुम्हे समझाने.. अब तो समझ जाओ.. कर दो माफ..मान जाओ.. मैं मान तो जाऊँ.. मगर .. लव-कुश को कैसे समझाऊँ.. उनका छूटा बचपन कहाँ से लाऊँ.. सिखाया गया उन सभी स्त्रियों को सीता जैसा बनना... उनकी पीड़ा देखकर कैसे चुप रह जाऊँ?.. क्यों चलू मैं उस राम के साथ एक पल भी.. जो लेता रहा मेरे चरित्र की परीक्षा.. हर मोड़ पर .. सब कुछ जानकर .. माना मैंने सिर्फ उनसे प्रेम किया.. पूरा जीवन उनके लिए समर्पित किया.. लेकिन .. अपनी पीड़ा उन्हें क्यों सुनाऊँ.. बेकसूर होते हुए.. दोषी की तरह क्यों झुक जाऊँ?.. वो तो राजा राम हैं.. सिया के राम नहीं.. जी लेगी सिया राम के बिना.. उसका चरित्र.. उसका व्यक्तित्व.. सिर्फ उसका हैं.. किसी और के नाम नहीं.. ©®स्नेहा..

जन्मों का फेरा

मतलबी दुनिया मे जन्मकर बस मतलब न सिख सके हिसाब चुकता कर ले .. अब ऐ दिल.. तमाम जिंदगी के कहकर थोड़ा सा खिलती धूप की लहरों की खुशी में चहकते पंछी की तरह हम भी परो को फड़फड़ाने निकले..!! अगले पिछले सारे हिसाब मिटाने थे हमें तमाम उम्र के... यू कहो कि जन्मजन्मांतर के...!! सदियों से दिल मे दबाकर रखी हुई कुछ दुख की कुछ सुख की कुछ अंनबन की कुछ कण कण की, अल्फाजो के दरमियान तोड़कर कह गए राजे दिल...!! कह गए बस कह गए... बिना थके बिना रुके... अब तक था जो जो सह गए...!! हिसाब के हिसाबी बनने की जिद में न जाने क्या कितना बह गए..!! जो बोले सो निहाल ही रहे पर शायद तुझे रुला ही गए दिल की कही जान पर बनी नजरो में तेरी ले आये नमी मेरी भी तो आंख कहाँ थी थमी तू क्या जाने मेरे भावों की जमी ऐ दोस्त तेरी दोस्ती पे कुर्बान मेरी आन,बान,शान,मान तू वजूद मेरा तू मसीहा मेरा पर चुकाना तो था जन्मों का फेरा बस इतना बता दे जरा क्या गिर गए तेरी नजरो में हम..?? क्या फिर गए अपनी वादों से हम..?? क्या मिट गए तेरी दोस्ती से हम..?? या चूक गए अपनी चाहत में हम..?? - वृषाली सानप काले

रिश्ता

रिश्तों ने हमको किया न गवारा या रिश्तों का हमे मिला न सहारा..। न बना कोई रिश्ता पाक हमारा या रिश्ते में रिश्तेदार न था न्यारा...। रिश्ते ने रुलाया तड़पाया हमे फ़रिश्ते सा न कभी सजाया हमे..। रिश्ते ने सदा ही आजमाया हमे काँटो पथ पर ही चलाया हमे..। मजाक सा जग ने देखा नजारा रिश्ते ने हमको किया न गवारा..।। जग क्या हमे आजमाता रुलाता आत्मिक शक्ति को क्या सुलाता..। न था किसमे दम के तड़पाता अपने उसूलोसे हमे पहचानता..। रिश्तों की दरिंदगी ने हमे मारा रिश्ते ने हमको किया न गवारा...।। जग पूछे अश्क़ो का बोलो कारण रब कहे जी लो मैं हु ना तारण..। सब कहे स्वार्थ से भरो आँगन नैतिकता की तो मैं हु पुजारन..। रिश्तों की बदनामी है न गवारा रिश्तों ने हमको किया न गवारा..।। जंग अपनों से लढके दिल ये टूटा रंग सभीकें देखमहफ़िल से रूठा..। संग न पाके जीवन से बेरुखा भीख न दया न चाहे कुछ झूठा...। हम चाहे रिश्तों से मूल्य हमारा रिश्तों ने हमको किया न गवारा..।। ~~~~~~~~~~~~~~~~~~ - वृषाली सानप काले 

रूहानी मोहब्बत

वो माँगे हमसे बस प्यार जिस्मानी हम माँगे सदा इख़्ति हार रूहानी । वो सुनाये किस्से वादे पैमानी हम दिखाए उन्हें राहे दीवानी। हम कहते ही रहे रूह रूह को चाहे रूह के मिलन से परम आत्मा बने। जिस्मानी मोह से इनको बचाये रूहानी चाहत सबकी बढाए। वो जिस्म तक क्यों रुके ऐ खुदा हम कैसे समझाए ये होये बूढ़ा। वो जिस्म को ही माने के आत्मा हम बताये के ये बस घर बालमा। वो आलंबन वफ़ा ओर देहिक वास्ते हम गर्दिशों में जताए रूहानी फ़रिश्ते। वो जिस्मानी मिलन में ढूंढे तादात्म्य हम रूहानी वफ़ा में चाहे अध्यात्म। ~~~~~~~~~~~~~~~~ - वृषाली सानप काले ~~~~~~~~~~~~~~~