सच्चा सुख किसे कहते हैं? कौन कहे, सुख किसे कहें? क्षणभर हँसना, या फिर सहें? धन-दौलत, वैभव, मान-सम्मान, क्या इनमें बसता है कल्याण? इच्छाएँ जब पूरी होतीं, मन कुछ पल को हर्षित होता। फिर नई चाह जन्म लेती, सुख का भ्रम भी साथ ही खोता। सच्चा सुख तो भीतर रहता, शांत, सरल, निर्मल-सा बहता। संतोष जहाँ दीपक बनता, जीवन वहीं प्रकाशित रहता। सेवा में जो आनंद मिले, प्रेम जहाँ निस्वार्थ खिले। कर्तव्य जहाँ पूजा बन जाए, वहीं हृदय सुख से भर जाए। दुःख केवल नाम नहीं आँसू का, अभाव ही उसका धाम नहीं। सब कुछ पाकर भी जो अशांत, उसे सुख कहना उचित नहीं। सुख कोई वस्तु नहीं, अवस्था है, मन की निर्मल एक व्यवस्था है। जिसने स्वयं को जान लिया, उसने सच्चा सुख पा लिया। ✍🏻 कौशल्या वाघेला ‘कुंदन’
“मेरी लेखनी का उद्देश्य केवल शब्दों का सृजन नहीं, बल्कि विचारों का जागरण है।”