प्राप्ति

जिंदगी का नाम रखे तो क्या रखे .  ??
ये भी एक अनूठा सवाल है..
क्योँकि दुनिया के दस्तूर है
अजीबो गरीब सब इसमें मशगूल है...!!

फिर भी यहां यही दौर है
प्राप्ति क्या यही छोर है..
इसी चकाचौध में
मुझे क्या मिला ..
पता नहीं मुझे ..!!

इंसा इंसा की हकीकत है
किसी की दो वक्त की रोटी,
तो किसी की चाय की प्याली,
तो किसी की हप्ते की पैकेट मनी,
तो किसी की साड़ी वो भी मेहँगी...
यही तो
रोजाना की उपलब्धि है।

किसी को नाम,
किसी को दाम,
किसी को धाम..
किसी को राम की दिल्लगी है।

इन सबमे मैं कहाँ हूँ..
मैं सबकी सुनता हूं
मैं सबकी बुनता हूँ..
मैं सबकी चुनता हूँ..
मैं सबकी लिखता हूं
मैं दर्द से चीखता हूँ..

ये जो मैं होता हूँ
उनका भरोसा होता हूँ..
ये जो मैं रोता हूँ
उनका पलिता धोता हूँ..
ये जो मैं होता हूँ
यही तो मैं पाता हूँ...!!

मेरे द्वार होते है खुले
सदा घर के भी व मन के भी झूले..
किसी की भी बात सुननेवाले
हर समय प्रस्तुत रहनेवाले..
शिकायती जग के आंगन में 
हौले हौले प्रीत का मरहम लगानेवाले..

हर किसी की आस व प्यास की
जीवन से जुड़ी सहज सवालों की
हर मुश्किल की उलझन की
 निराशा में आशा के विश्वास की
बस सहारा मेरा
जवाब होता है...!!

ये सब
मुझे रोजाना प्राप्त होता है...!!
ये भरोसे की सांस
प्रेम की आस
विश्वास की बांस
इस क्षणभंगुर संसार में
नुक्ता चीनी व आडम्बरो की
तानाशाही में
ये मुझे
जीवित रहने की ताकत
हौसला देता है...!!

शायद.. नही यकीनन
यही तो मेरी प्राप्ति है...!!
जीवन के जुनून की
सच्ची सच्ची कमाई है..!!
**
- वृषाली सानप काले

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