टूटे किनारों की छाँव में...
जिंदगी हमेशा सीधी लकीर पर नहीं चलती। कई बार रास्ते ऐसे मोड़ पर ले आते हैं जहाँ सब कुछ बिखर जाता है, विश्वास की नींव हिल जाती है और इंसान अकेला पड़ जाता है। जब दो जिंदगियाँ अलग होती हैं, तो वह सिर्फ कानूनी कागज़ों पर मुहर नहीं होती, बल्कि वे दो इंसानों के समूचे वजूद को झकझोर कर रख देती है। इस कड़वे मोड़ पर अक्सर एक अजीब सा सामाजिक यथार्थ देखने को मिलता है। हर अलगाव में दर्द दोनों का बराबर नहीं होता। कई बार एक इंसान लगातार ज़ुल्म करता है, छल करता है, और जब रिश्ता टूटता है तो उसे कोई फ़र्क नहीं पड़ता, वह पलक झपकते ही अपनी दुनिया में मस्त हो जाता है। लेकिन दूसरा इंसान, जिसने उस रिश्ते को बचाने के लिए अपनी अंतिम सीमा तक संघर्ष किया होता है, वह भीतर तक टूट जाता है। उसके लिए यह अलगाव एक ऐसा नासूर बन जाता है जिसकी टीस उम्र भर पीछा नहीं छोड़ती। यह असहनीय वेदना किसी लिंग की मोहताज नहीं होती। यह दर्द किसी स्त्री के हिस्से भी आ सकता है और किसी पुरुष के हिस्से भी। जब कोई इंसान इस तरह की अग्निपरीक्षा और गहरे आघात से गुजरता है, तो उसका पूरा आंतरिक संसार वीरान हो जाता है। वह इंसानों से, रिश्तों से और प...