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अगले जन्म में हम न मिलेंगे

सारे हिसाब हम पूरे करेंगे अगले जन्म में हम न मिलेंगे...!!
जो हो सो वो सब सह लेंगे अब ना कभी भी आंसू बहेंगे.. अगले जन्म में हम न मिलेंगे...!!
रिश्तो के कश्ती पार करेंगे प्यार भी तुमको पूरा करेंगे अगले जन्म में हम न मिलेंगे...!!
किस्से कहानियों में बसेंगे.  खोने से अब तुम्हे तो हम डरेंगे.. अगले जन्म में हम न मिलेंगे..!!
तेरे लिए ही तो आहे भरेंगे तुझपर ही तो हम मरेंगे.. अगले जन्म में हम न मिलेंगे..!!
सारे ही वादे पूरे करेंगे.. मुश्किलों से नाही डरेंगे.. अगले जन्म में हम न मिलेंगे.. सारे हिसाब हम चुकतु करेंगे..!!
जन्म मरण की भी बात कहेंगे सत्य ज्ञान की ही राह बनेंगे खुदा के बन्दे खुदाई ही करेंगे...!! सारे हिसाब हम पूरे करेंगे..
सारे दुश्मनों तुमको मिलेंगे एक एक ज़ख्म को सिलेंगे दुश्मनी के लिए मिसाल बनेंगे..!! पर...अगले जन्म में हम ना मिलेंगे...!! सुनो...अगले जन्म में हम ना मिलेंगे...!!
- वृषाली सानप काले

हम न मिलेंगे

सारे हिसाब हम पूरे करेंगे अगले जन्म में हम न मिलेंगे...!!
जो हो सो वो सब सह लेंगे अब ना कभी आंसू बहेंगे.. अगले जन्म में हम न मिलेंगे
रिश्तो के कश्ती पार करेंगे प्यार भी तुमको पूरा करेंगे अगले जन्म में हम न मिलेंगे
किस्से कहानियों में बसेंगे खोने से अब तुम्हे तो हम डरेंगे अगले जन्म में हम न मिलेंगे
तेरे लिए ही आहे तो भरेंगे तुझपर ही तो हम मरेंगे अगले जन्म में हम न मिलेंगे
सारे ही वादे पूरे करेंगे मुश्किलों से नाही डरेंगे अगले जन्म में हम न मिलेंगे
(अपूर्ण)
- वृषाली सानप काले

बाँसुरी

क्या करूँ के बनू मैं बांसुरी तुमरी
प्रियतम प्यारी बनूँ अनूठी तुमरी..

पायल बनकर अब हूँ थक गयी
घायल बनकर अब हुं पीस गयी
जन्म जन्म से हुं मैं तेरी कजरी..।

दर्दे दिल का बस तू सच्चा साकी
सर्द जग का क्या हिसाब बाकी
काहे ना सुने तू फिरयाद हमरी...!

रोम रोम बस तोहे ही तो गाये
सोहं सोहं बस मोहे तो भाये
अद्वैत रिश्ते में क्यों आये बदरी..!

प्यास मिलन की कर दो पूरी
कब बतला दूर होगी ये दूरी
बनना मुझे अब तेरी मुरली...!!
प्रियतम प्यारी बनुं अनूठी तुमरी।।

मीरा नहीं, ना हु मैं राधा तेरी
अधूरी हुं, तुझ बिन अँधेरी
भक्ति की भर दो मेरी गगरी..!
प्रियतम प्यारी बनुं अनूठी तुमरी।

- वृषाली सानप काले

सजा (संवादात्मक कथा)

"बोल होमवर्क पूरा क्यों नही किया..?"
"सर नहीं हुवा..?"
"नही हुवा तभी तो खड़ी हो..?"
"जी..जी सर.."
"जी जी... क्या कारण बताओ..?"
"सर नही कर पाई.."
"पर क्यों..?"
"सर कैसे बताऊ..."
"अपनी ज़ुबान से..ज़ुबान है न.."
"..."
" गूंगी है क्या..?"
"सर,.... सच बताऊ...?"
"तो क्या झूठ बताएगी..मेरी अम्मा...?"
"...."
"..बता जल्दी..."
"सर..सर..मेरा बाप दारू पिता है।"
"मुझे लगा ही था, पर पढ़ई तो तुझे करनी है न.."
"जी, पर सर ...
वो घर आकर मां को रोज पिटता है। हमेशा..."
"अच्छा, तो..."
"सर ,परसो भी उसने माँ को खूब पीटा। मेरी माँ पेट से थी सर..."
"....."
"उसने मां की पेट में दो चार लात मारी थी..!"
"....."
"उसका पेट दर्द कर रहा था। मैं दवाई ले आयी थी पर नही रुका दर्द।
..मै उसके 5 घर का काम करने जाती थी महीने से...!"
"क्या...?"
"जी सर..."
"पर अब 4 दिन…

तुम

न जाने क्यों आज रो रही हुं मैं क्या तुम्हें फिर से खो रही हुं मैं...!!
बार बार उसी संघर्ष की तह में हर हार की सहर्ष की गह में क्यों फिर से आजमा रही हुं मैं... क्या तुम्हें फिर से खो रही हुं मैं...!!
क्या चाहना है जिंदगी से न जानु मैं क्या मांगती हुं जिंदगी से न जानु मैं क्यो कश म कश में ढो रही हुं मैं...!! क्या तुम्हें फिर से खो रही हुं मैं...
विरक्त विभक्त सी जी ही रही हुं मैं पर तुम्हारे बिना न जी पा रही हुं मैं क्या हर बार खुद को ही आजमा रही हुं मैं क्या तुम्हें फिर से खो रही हुं मैं...!! 🌲 - वृषाली सानप काले

कुछ भी नही

बिन तुम्हारे कुछ भी नहीं  जिंदगी हमारी कुछ भी नहीं 
क्या हुवा है कुछ भी नहीं  क्या टूटा है कुछ भी नहीं  क्या रुकेगा कुछ भी नहीं  जिंदगी हमारी कुछ भी नही
क्या बनेगी ये कुछ भी नहीं  क्या सजेगी ये कुछ भी नहीं  क्या वफाई थी कुछ भी नहीं  जिंदगी हमारी कुछ भी नहीं 
क्यों सिलवटें जिंदगी की बनी रुकावटें जिंदगी की क्या आफरीने भी नहीं  जिंदगी हमारी कुछ भी नहीं 
क्यों साध ले साधना की क्यों बाँध ले आराधना की शिकायत तो कुछ भी नहीं  जिंदगी हमारी कुछ भी नहीं ...
ये लकीरों की भी क्या ज़्यादती  तकदीरों की भी क्या ताजगी हमको चाहत तो कुछ भी नहीं  बिन तुम्हारे तो कुछ भी नहीं  कुछ भी नहीं  कुछ भी नहीं 
- वृषाली सानप काले

कैसे कहूँ

भावनाओ के खेल में
हर बाज़ी हमने है हारी
कश म कश के खेल में
कैसे कहुँ  के हुं तुम्हारी...

रिश्ता जो मांगे उम्मीदें
क्या होंगे पूरे वो वादे
चाहत जो चाहे इरादे
क्या वो मिलेंगे काँधे..
कैसे हो पूरी जिम्मेदारी...?
कैसे कहूँ के हुं तुम्हारी

पाक पाकिज तो है ही
क्या दिलाएगा वो माही
साद सादगी का राही
क्या दिलाएगा जिंदगी..
जिंदगी है तुमपे ही वारी
कैसे कहूँ की हुं तुम्हारी..

व्यवहार संसार निसार
कैसे होंगे मिलनसार...
कैसे जुड़ेगा इनका तार
कौन वादा निभावु यार..?
हुं मैं तो मर्यादि देहधारी..
कैसे कहूँ की हुं तुम्हारी

- वृषाली सानप काले