विश्वास जब टूटता है
विश्वास जब टूटता है विश्वास किसी भी रिश्ते की नींव होता है। यह केवल किसी के शब्दों पर भरोसा कर लेने का नाम नहीं, बल्कि उसके आचरण, नीयत और व्यवहार में सच्चाई की अपेक्षा भी है। जब कोई व्यक्ति हमारे विश्वास को अपना स्वार्थ सिद्ध करने का साधन बना लेता है, तब केवल एक वचन नहीं टूटता, बल्कि उस रिश्ते की विश्वसनीयता भी डगमगा जाती है। दो मित्र और विश्वास की कसौटी दो घनिष्ठ मित्र थे। एक दिन उनमें से एक मित्र को आर्थिक आवश्यकता पड़ी। उसने दूसरे मित्र से कुछ धन उधार लिया और शीघ्र लौटाने का वचन दिया। मित्र ने उसकी परिस्थिति समझकर बिना किसी संकोच के सहायता कर दी। समय बीतता गया। उधार लेने वाले मित्र की आर्थिक स्थिति सुधर गई, लेकिन उसने धन लौटाने की बात टालनी शुरू कर दी। जब दूसरे मित्र ने विनम्रता से अपना धन माँगा, तो वह कभी परिस्थितियों का बहाना बनाने लगा, तो कभी मित्रता का हवाला देकर उसे चुप कराने लगा। जिस मित्र ने विश्वास करके सहायता की थी, उसे धन से अधिक अपने विश्वास के टूटने का दुःख हुआ। उसे समझ आ गया कि सामने वाले ने उसकी मित्रता को अपनी सुविधा के अनुसार इस्तेमाल किया था। विश्वास का ...