ठहरा हुआ समय
समय की सबसे बड़ी तासीर ही यही है कि वह कभी रुकता नहीं। नदियाँ बहती रहती हैं, दिन ढलता है, रात होती है और घड़ी की सूइयाँ बिना थके अपनी गति से टिक-टिक करती रहती हैं। लेकिन क्या समय वाकई हमेशा चलता रहता है? बाहरी दुनिया में भले ही कैलेंडर के पन्ने बदलते रहें, पर जब परिवार का कोई प्रिय सदस्य हमेशा के लिए अलविदा कह जाता है, तो भीतर का समय अचानक स्तब्ध होकर ठहर जाता है। उस बिछोह का प्रभाव घर के हर कोने पर पड़ता है, पर हर सदस्य के मन की स्थिति अलग होती है—और जिसका लगाव व प्रेम जितना गहरा होता है, उसके भीतर का ठहराव भी उतना ही गहरा और नीरव होता है। एक ही छत के नीचे दुख की अलग-अलग परतें दिखाई देती हैं। परिवार का कोई सदस्य खुद को व्यावहारिक बातों और व्यवस्थाओं के नियोजन में झोंक देता है—"अब आगे क्या करना है और घर कैसे संभालना है?" असल में उसने दर्द छुपाया नहीं है, बल्कि उसके पास रोने या अपने हिस्से का दुख व्यक्त करने का अवसर और समय ही नहीं होता। वहीं दूसरी ओर, जिससे उस जाने वाले इंसान का आत्मीय लगाव सबसे गहरा था, वह बिल्कुल चुप हो जाता है। संतान के चले जाने पर माता-पिता के सामने ज...