बंद लिफ़ाफ़े की दस्तक
जीवन की राह में चलते-चलते कभी-कभी मन के किसी कोने में एक अजीब-सा सन्नाटा ठहर जाता है और एक सवाल बार-बार सिर उठाने लगता है— क्या रिश्तों को भी जंग लग जाता है? हम सबने कभी न कभी इस बात को महसूस किया होगा। जब हम किसी अपने से, किसी रिश्ते से बेहद दिल से जुड़े होते हैं, रोज़ का हँसना-बोलना और बातें साझा करना हमारी दिनचर्या का हिस्सा होता है, और फिर जीवन की व्यस्तता, बदलती परिस्थितियों या अपनी किसी ज़िम्मेदारी के कारण बीच में कुछ समय के लिए बातचीत का सिलसिला थम जाता है। लेकिन जब एक लंबे अंतराल के बाद, उसी पुराने अपनापन और ढेर सारी यादों के साथ हम लौटते हैं, तो सामने से वैसी गर्माहट नहीं मिलती। कई बार सामने एक ठंडापन या अनचाहा फासला महसूस होता है। जब हमारे भेजे गए संदेशों का जवाब बहुत देर से मिले या ऐसा लगे कि अब उस जुड़ाव की नमी सूखने लगी है, तो मन थोड़ा उदास हो जाता है। जब संवाद ठहरता है, तो मन में कई सवाल तैरने लगते हैं। शायद लोग खुलकर अपनी बात नहीं कह पाते या अपनी परिस्थितियों में उलझ जाते हैं; वजह जो भी हो, पर जब यह अहसास हो कि हमारे होने या न होने से अब सामने वाले की दुनिया पर कोई ख...