कभी-कभी जीवन में ऐसे लोग मिलते हैं जिनके लिए हम अपने हृदय में एक विशेष स्थान बना लेते हैं। उनके सुख-दुःख, उनकी बातें, उनकी उपस्थिति—सब हमारे लिए महत्व रखने लगते हैं। हम बिना किसी गणना और बिना किसी शर्त के अपना समय, अपना स्नेह और अपनी शुभेच्छाएँ उन्हें अर्पित कर देते हैं। किन्तु हर संबंध एक-सा नहीं होता। कुछ लोग हमारे भावों को समझते हैं, तो कुछ उन्हें सहज उपलब्ध मान लेते हैं। वे कभी निकट आते हैं, कभी दूर चले जाते हैं, फिर लौटते हैं और फिर वही दूरी बना लेते हैं। उनके इस व्यवहार से मन थकने लगता है। तब प्रश्न उठता है—क्या हमें उनसे शिकायत करनी चाहिए, या स्वयं को समझना चाहिए? समय के साथ समझ में आता है कि मनुष्य का स्वभाव उसके अपने संस्कारों, अनुभवों और दृष्टिकोण से निर्मित होता है। हम किसी के व्यवहार को बदलने का प्रयास कर सकते हैं, पर उसे नियंत्रित नहीं कर सकते। जो हमारे वश में है, वह केवल हमारा दृष्टिकोण और हमारी प्रतिक्रिया है। जब अपेक्षाएँ बढ़ती हैं, तब उपेक्षा अधिक चुभती है। और जब हम अपने सुख का आधार दूसरों की प्रतिक्रिया को बना लेते हैं, तब मन बार-बार आहत होता है। परंतु जिस दिन हम ...
“मेरी लेखनी का उद्देश्य केवल शब्दों का सृजन नहीं, बल्कि विचारों का जागरण है।”