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सच्चा सुख किसे कहते है?

  सच्चा सुख किसे कहते हैं? कौन कहे, सुख किसे कहें? क्षणभर हँसना, या फिर सहें? धन-दौलत, वैभव, मान-सम्मान, क्या इनमें बसता है कल्याण? इच्छाएँ जब पूरी होतीं, मन कुछ पल को हर्षित होता। फिर नई चाह जन्म लेती, सुख का भ्रम भी साथ ही खोता। सच्चा सुख तो भीतर रहता, शांत, सरल, निर्मल-सा बहता। संतोष जहाँ दीपक बनता, जीवन वहीं प्रकाशित रहता। सेवा में जो आनंद मिले, प्रेम जहाँ निस्वार्थ खिले। कर्तव्य जहाँ पूजा बन जाए, वहीं हृदय सुख से भर जाए। दुःख केवल नाम नहीं आँसू का, अभाव ही उसका धाम नहीं। सब कुछ पाकर भी जो अशांत, उसे सुख कहना उचित नहीं। सुख कोई वस्तु नहीं, अवस्था है, मन की निर्मल एक व्यवस्था है। जिसने स्वयं को जान लिया, उसने सच्चा सुख पा लिया। ✍🏻 कौशल्या वाघेला ‘कुंदन’

स्वर्णिम संध्या (कविता)

दिनभर की चंचलता थमने लगी, नभ ने ओढ़ी स्वर्णिम चादर। चंदन-सी शीतल आभा बिखरी, मंद हुआ दिन का कोलाहल। धीरे-धीरे रंग गहराए, केसर-सी रेखा मुस्काई। बादलों के कोमल आँचल पर, प्रकृति ने अनुपम छवि सजाई। न कोई शोर, न कोई जल्दबाज़ी, सब कुछ मौन कथा कहता है। जो ठहरकर पल भर देखे, वह जीवन का संगीत सुनता है। वृक्ष बने निस्तब्ध साधक, पवन हुई मृदु प्रार्थना-सी। संध्या की स्वर्णिम मुस्कान में, झलके शांति चंदन-सी। डूबता सूरज कह जाता है— “हर अंत में आरंभ छिपा है।” रात्रि का अंधकार भी देखो, नई प्रभात का स्वप्न लिए खड़ा है। आओ, कुछ पल मौन रहें हम, प्रकृति का यह उपहार निहारें। स्वर्णिम संध्या के इस क्षण में, अपने अंतर्मन को भी सँवारें। प्रकृति का सौंदर्य आँखों को आकर्षित अवश्य करता है, पर उसकी शांति केवल वही अनुभव करता है, जो कुछ क्षण ठहरकर उसे हृदय से निहारता है।

समर्पण प्रार्थना

हे प्रभु श्रीराम! यह जीवन आपका है, यह श्वास आपकी है, यह चेतना आपकी है। हमारे अंतर्मन को सत्य, धैर्य और करुणा के प्रकाश से आलोकित रखें। हमारी वाणी में मधुरता, कर्म में निष्ठा और विचारों में पवित्रता बनी रहे। हमारा प्रत्येक विचार लोकमंगल का कारण बने और प्रत्येक कर्म मानवता के हित में समर्पित हो। हमें ऐसा विवेक दें कि सत्य का मार्ग कभी न छूटे, और ऐसी विनम्रता दें कि सफलता भी हमारे भीतर अहंकार का जन्म न दे। हमारे जीवन का प्रत्येक क्षण आपके स्मरण, सेवा और सद्कर्मों से सुगंधित हो। जो भी करें, वह आपके स्मरण और लोकमंगल का माध्यम बने। आपकी इच्छा ही हमारा मार्ग बने, और आपका नाम ही हमारी शक्ति। जय श्रीराम। 🙏 “प्रार्थना वह नहीं जो केवल होंठों से निकले; प्रार्थना वह है जो अंतर्मन को प्रभु के चरणों में समर्पित कर दे।”

श्रद्धा की अनुभूति

श्रद्धा से किया गया हर जप सबसे पहले साधक के अंतर्मन को स्पर्श करता है। फिर वही भाव मौन प्रार्थना बनकर ईश्वर के श्रीचरणों में पहुँच जाता है। और वहाँ से लौटता है— शांति, धैर्य, विश्वास और एक नई जीवन-ज्योति बनकर। — कौशल्या वाघेला ‘कुंदन’

प्रार्थना का स्वर

प्रार्थना केवल होंठों से निकले शब्द नहीं, वह तो हृदय की मौन पुकार है। जब भाव निर्मल हों और उद्देश्य लोकमंगल का हो, तब हर श्वास स्वयं एक प्रार्थना बन जाती है। — कौशल्या वाघेला ‘कुंदन’

सृजन की साधना

  सृजन की साधना ** विचार पवित्र हों,  वाणी मधुर हो,  कर्म श्रेष्ठ हों,  और हृदय करुणा से भरा हो।  ऐसा जीवन मिले कि  हमारे कारण किसी के चेहरे पर मुस्कान आए,  और किसी का विश्वास दृढ़ हो। भाव जहाँ निर्मल होते हैं,  वहाँ शब्द अपने नहीं रहते।  वे उस सत्य के हो जाते हैं,  जो हर हृदय में मौन होकर भी बोलता रहता है। ** — कौशल्या वाघेला ‘कुंदन’

अटूट श्रद्धा

जब शब्द थक जाते हैं,  तब श्रद्धा बोलती है।  और जब श्रद्धा मौन हो जाती है,  तब अंतर्मन में राम-नाम बोलता है। जब तर्कों की सीमा आती,  मन उत्तर खो जाता है।  तब विश्वास का कोमल दीपक,  अंधकार हर जाता है। जब जीवन की कठिन डगर में,  साथ सभी छूट जाते हैं।  तब प्रभु के पावन स्मरण से,  टूटे मन जुड़ जाते हैं। न धन, न वैभव, न यश की चाह,  न कोई अभिमान रहे।  बस अंतर्मन के मंदिर में,  राम-नाम का गान रहे। लेखनी में चिंतन रहे,  हृदय में राम का नाम।  ‘कुंदन’ की हर रचना बने,  सत्य और प्रेम का धाम। शब्दों में संवेदना बहे,  भावों में विश्वास रहे।  मानवता के कल्याण हेतु,  जीवन का हर श्वास रहे। जब शब्द थक जाते हैं,  तब श्रद्धा बोलती है।  और जब श्रद्धा मौन हो जाती है,  तब अंतर्मन में राम-नाम बोलता है।

राम-नाम की रोशनी

राम नाम की रेखा-रेखा में,  मन को नव विश्वास मिले।  कलम तुम्हारी सत्य लिखे,  शब्दों को मधुमास मिले। चिंतन हो कल्याणमय,  जागरण का भाव रहे।  ‘कुंदन’ की लेखनी में सदा,  सत्य का उज्ज्वल प्रभाव रहे। जब-जब मन विचलित होगा,  राम-नाम आधार बने।  जीवन-पथ के कठिन क्षणों में,  प्रभु ही दृढ़ पतवार बने। अंतरमन के सूने कोने,  भक्ति-सुधा से भर जाएँ।  संशय, भय और मोह के बादल,  राम-किरण से हर जाएँ। लेखनी केवल शब्द न रचे,  मानवता का गीत लिखे।  हर पंक्ति में करुणा झलके,  हर अक्षर नव प्रीत लिखे। सत्य, धर्म और प्रेम-पथिक को,  नव संबल हर बार मिले।  राम-नाम की रेखा-रेखा में,  जीवन को विस्तार मिले। जब तक साँसें साथ चलें,  प्रभु का पावन ध्यान रहे।  मेरे हर शब्द, हर कर्म में,  श्रीराम का सम्मान रहे। — कौशल्या वाघेला ‘कुंदन’

कलम का संकल्प

शब्दों में संवेदना रहे,  विचारों में प्रकाश रहे।  कलम केवल लिखे नहीं,  जन-मन में विश्वास रहे। पीड़ा को स्वर मिल जाए,  मौन हृदय की बात कहे।  अंधकार के घने क्षणों में,  सत्य की ज्योति साथ रहे। लेखनी का ध्येय यही हो,  जागृत हर एहसास रहे।  भटके हुए पथिक के मन में,  आशा का आकाश रहे। निंदा, द्वेष, छल की भाषा,  मेरे शब्दों का वास न हो।  मानवता की कोमल धारा,  कभी हृदय से दूर न हो। मेरी लेखनी का उद्देश्य,  यश या केवल मान न हो।  शब्दों का सृजन भर नहीं,  विचारों का जागरण हो। जब तक साँसें साथ चलें,  सत्य का दीपक जलता हो।  मेरे हर अक्षर में सखी,  श्रीराम का स्मरण पलता हो। — कौशल्या वाघेला “कुंदन”

बंधनमुक्त चंद लड़ियां

वो खुशी में सुकून मिला वो दिल में धड़कन बसी वो आग में शीतल हवा वो मीराज में मंज़िल रही वो तृषा में तृप्ति तू ही वो जान में जीवन है वो प्रेम में प्रीत लगी प्रिय तुम्हीं देखो ना  तारे वास्ते ही सारी  चंद लड़ियां प्यार की  जो चाहे चुनले राहबर  आना है या जाना जो चाहे करले पसंद सबकुछ है तेरे लिए 🌹🌹🌹🌹

टूटते बंधन

हमें दिखा कर वो आईना,  कह रहे की चले जाओ  नहीं जरूरत हमें अब और किसी की तुम रहो अपने दायरे की हद में यही बताकर उन्होंने हमें  पल्ला भारी कर लिया अपना  सारी शिकायतें हमारे नाम सारी सिद्दतें अपने नाम कर ली  कुछ रहा नही बाकी अब  रुकने के लिए चले जाएं जिंदगी से उनकी  कर ऐसा वो यही चाहते है कि हम लौट कर ना आए कभी  वापस आने का रास्ता किया बंध दरवाज़े, खिड़की की किवाड़ों को कर लिया कुछ ऐसे बंध  झांक सके ना मेरी नज़र  उनकी खुशी में ही अपनी खुशी  यदि यही मर्जी तो यही सही  हमारे सर ओढ़ा कर  लज्जा का घूंघट कह दिया तुम्हारा कोई नही है यहां  ***