जब शब्द थक जाते हैं,
तब श्रद्धा बोलती है।
और जब श्रद्धा मौन हो जाती है,
तब अंतर्मन में राम-नाम बोलता है।
जब तर्कों की सीमा आती,
मन उत्तर खो जाता है।
तब विश्वास का कोमल दीपक,
अंधकार हर जाता है।
जब जीवन की कठिन डगर में,
साथ सभी छूट जाते हैं।
तब प्रभु के पावन स्मरण से,
टूटे मन जुड़ जाते हैं।
न धन, न वैभव, न यश की चाह,
न कोई अभिमान रहे।
बस अंतर्मन के मंदिर में,
राम-नाम का गान रहे।
लेखनी में चिंतन रहे,
हृदय में राम का नाम।
‘कुंदन’ की हर रचना बने,
सत्य और प्रेम का धाम।
शब्दों में संवेदना बहे,
भावों में विश्वास रहे।
मानवता के कल्याण हेतु,
जीवन का हर श्वास रहे।
जब शब्द थक जाते हैं,
तब श्रद्धा बोलती है।
और जब श्रद्धा मौन हो जाती है,
तब अंतर्मन में राम-नाम बोलता है।

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