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Showing posts with the label Kahani

सजा (संवादात्मक कथा)

"बोल होमवर्क पूरा क्यों नही किया..?" "सर नहीं हुवा..?" "नही हुवा तभी तो खड़ी हो..?" "जी..जी सर.." "जी जी... क्या कारण बताओ..?" "सर नही कर पाई.." "पर क्यों..?" "सर कैसे बताऊ..." "अपनी ज़ुबान से..ज़ुबान है न.." "..." " गूंगी है क्या..?" "सर,.... सच बताऊ...?" "तो क्या झूठ बताएगी..मेरी अम्मा...?" "...." "..बता जल्दी..." "सर..सर..मेरा बाप दारू पिता है।" "मुझे लगा ही था, पर पढ़ई तो तुझे करनी है न.." "जी, पर सर ... वो घर आकर मां को रोज पिटता है। हमेशा..." "अच्छा, तो..." "सर ,परसो भी उसने माँ को खूब पीटा। मेरी माँ पेट से थी सर..." "....." "उसने मां की पेट में दो चार लात मारी थी..!" "....." "उसका पेट दर्द कर रहा था। मैं दवाई ले आयी थी पर नही रुका दर्द। ..मै उसके 5 घर का काम करने जाती थी महीने से...!" "क्या...?" "जी सर....

नयी सोच ... नयी कहानी

" नयी सोच ... नयी कहानी " - Kailash Vaghela              हम जब अपने आस पास होने वाली घटनाओ को देखते है तो हम उसे समजने के लिए सोचना शुरू करते है  ,  की ये क्यों हुआ  ?  कैसे हुआ  ?  किसने किया  ?  ये सब सोचने लगते है .... इसके पीछे क्या कारण है ?  क्या हो सकता है  ?  ये सब हम सोचते है और सोचते सोचते हम इसके नतीजे तक पहुचने की कोशिश करते है और उसका समाधान क्या हो सकता है ये बात भी हम सोच लेते है .... ये ही तो ... यही हमारी कहानी बन जाती है .. इसे ही कहते है क्या सोचा और क्या किया जिसको जोड़ते-जोड़ते हम एक कहानी ही बना दिए । " नयी द्रष्टि... नयी सोच... नए तरीके और नयी कहानी ।"

रिश्ता (संवादात्मक कथा)

"कैसी हो राधिका..?" "ठीक हुँँ..?" "खुश हो..?" "शायद खुश भी..?" "शायद नहींं, यकीन से बोलो...?" "आज इतने दिनों बाद हम मिले है, क्या झगड़ने के लिए..?" "अरे झगड़ा नहींं पर ..दोस्त हुंं न तुम्हारा...?" "वो तो हो ही,रहोगे भी.." "उस दिन 2 महीने पहले तुम्हारी फोन पर सुनी आवाज, तुम्हारे साथ तुम्हारे पति ने किया बर्ताव..मारपीट,..वो रोती कलपती आवाज .. कैसे भूल सकता हुंं मैं..?? राधिका...?" "..." "पंख लगाकर आजाऊ ऐसी मेरी अवस्था थी..पर दुख ये था कि उस वक्त मैं तुम्हारे लिए कुछ भी नहींं कर सकता था...केवल तुमने डाली कसम की वजह से..." "तो क्या करे सागर..घर की बात चौराहे पे तो नहींं लायी जाती...?" "हाँँ, बिल्कुल सही मैं तो बाहरवाला हुंं न..?" "अगर ऐसा होता तो ये बात सबसे पहले तुमसे नहींं कहती दोस्त..." "अरे मेरा ये मतलब नहींं था, गलत न समझो.." "तुम तो मेरा सहारा हो, जो बात अपने पति, भाई, बहन, माँँ-बाप से भी नहींं कह सकती वो लाखो बाते ...

मिसाल बने

इंसान पूरी जिंदगी बस दुसरो का अनुकरण व भाव ही पढ़ने का प्रयास करता रहता है।क्यो उसकी अपनी जिन्धी दुसरो की सलाह व विचार पर आश्रत हो जाती है..??    दूसरा व दूसरे ...इस परिभाषा से बाहर आने की बहोत जरूरत है...!!क्योँकि किसी भी चीज के लिए किसी का उदाहरण देना बहुत सरल है लेकिन किसी के लिए खुद उदाहरण बनना बहुत ही मुश्किल है..!!इसीलिए जीवन मे उदाहरण नाही दो खुद उदाहरण बन जाओ..!!      दुसरो की तस्बीरों के आगे तो सब झुकते भी है व पूजते भी है,आओ कुछ ऐसा करे कि लोग हमारी तसबीर को भी महान मानने लगे..!!     लोगो को सब टालते है,जब उनकी मौजूदगी उन्हें तकलीफ देने लगे।हम ऐसे बने की लोगो को हमारी मौजूदगी से शक्ति महसूस हो...!!    सदियों से यही तो चाह हम रखते आये की हमे ये मील हमे वो मील,हमारी किस्मत ऐसी हो,हमारे भाग्य में वो हो ।हम भाग्यशाली बने..!!अपने भाग्य में किसीसे कुछ उम्मीद रखने के बजाय अगर हम ही दूसरों का भाग्य बना  देंगे तो...!!क्योँकि भाग्यशाली वे लोग कभी  नही होते है जिन्हें सबकुछ अच्छा मिलता है बल्कि भाग्यशाली तो वो होते ह...

संवादात्मक कथा - "मूल्य"

   "कई बार इस नम्बर से कॉल आ रहा है..? आखिर किसका हो सकता है...? गलत व्यक्ति का तो नही होगा...? चलो उठा ही लेती हूं...!" "हैलो.. कौन..?" "दीपक श्रीवास्तव...बोल रहा हूं, पूजा...जानती हो मुझे...?" "....जी..." "शुक्र है पहचान तो लिया..." "कैसे हो आप सब...?" "..खुश तो सब है री, पर ये बता तू फोन क्योंं नहींं करती...?" "आप लोग भी कहाँ करते हो भाई...?" "पर तु क्योंं नहींं करती..? जो भी कुछ भड़ास हो तुम्हारे मन मे वो बोल दो मुझसे, कुछ भी मन मेंं न रख खुल के बोल, इसके बाद तुमने बात भी नहींं की तो भी मैं तुमसे नाराज नही रहूंगा। तुम्हारी खामोशी दिल को चीर जाती है..लाखो ख़ंजर ख़ौप देती है।" "..कुछ नही भाई, सब ठीक है यहां..." "कुछ ठीक नहींं है, तू तड़प रही है मैंने भाई होकर महसूस नहींं किया पर तुम्हारी भाभी ने महसूस किया है। तुम दर्द पीती रही हो आजतक आज तुम्हे बताना होगा मुझे, बोल भी दो बहना..." "भाई दिल दुखेगा आपका .." "दुख जाने दो, मुझे सम्भालनेवाला ...

रूहानी सेवा

 परमपिता परमात्मा एक निराकार शक्ति है। उसी निराकार ज्योतिर्मय स्वरूप का एक निराकार बिंदु स्वरूप अंश याने "आत्मा"....!!     आत्मा भी उन सभी गुणों से युक्त होती है, जिन गुण रूपी शक्तियों से हम निराकार ईंश्वर की उपासना करते है। तथापि जब आत्मा पंचतत्व  रूपो से युक्त देह के सम्बंध में आती है, तब देह अर्थात पंचतत्त्व की प्रभावात्मकता से भटक जाती है अपनी वास्तविक पहचान से...!!     आत्मा की अपनी कई शक्तियां होती है। आत्मा की विचार करने की शक्ति याने मन. ..,उसकी निर्णय करने की शक्ति याने बुद्धी .., उसकी देह के द्वारा कार्य करने की योग्यता याने कर्म ...,तथा कर्म करने की पद्धति एवं गुणात्मकता के द्वारा होता कर्म का दृढ़ीकरण याने आत्मा के संस्कार ...!!एक देह छोड़े दूसरे देह को धारण करने के पश्चात भी आत्मा की ये मन, बुद्धी एवं संस्कार सदैव उसके साथ रहते है, जिससे ही उसको कर्म भोग एवं प्रारब्ध को भुगतना पड़ता है।    आत्मा का स्थान मनुष्य की दोनों भृकुटियों के बीच मे होता है। आत्मा जब भी नया देह धारण करती है तब अपने साथ में बोलना, देखना, सुनना, संवेदना...

रूहानी रिश्ते

रिश्ते जो जीवन को महक देते है। भले वो खून के हो या प्रेम के, भाव के हो या सद्भाव के, आह! से भरे हो या चाह से, स्नेह से पूरे हो या गेह से, वृत्ति से जुड़े हो या कृति से, नीति से भरे हो या गीति से, लेकिन कुछ रिश्ते....कैसे भी हो वो दिल के गहराई में घुले होते है। जग की समस्त शब्दकोशों से वो न्यारे होते है। भाव भंगिमा की ताकत के लहजे से परिपूर्ण होते है, जज्बात उनकी पहचान एवं ताकत होती है लेंन देंन जहां गौण होता है।  व्यवहार की डिक्शनरी को वो कभी महत्व नही देते। फायदे से ज्यादा वो घाटे के सौदे को पसंद करते है। उन्हें सांतवां आसमान को पाने की चाह नही होती उन्हें बस दिलो के राजमहल की संपत्ति की चाह होती है। उन्हें वस्तुओं की कीमत नही तो रूहानी जज्बातों की कदर होती है।   ये जज्बात ही उनकी ताकत, हिम्मत, वजूद होती है। जिनके लिए मिटना एवं बिकना भी उन्हें मंजूर होता है। ऐसे ही रिश्ते जीवन को अनोखा बना देते है। जीवन को अनमोलत्व प्राप्त करता देते है। ऐसे ही चंद रिश्ते...जो मेरे जिंदगी भर  की  पूँजी  है...जिंदगी की संपत्ति है...तथा सदैव रहेगी। जिन में हर कोई साशामि हो...

चरितार्थ

कितनी हैरत की बात है कि जिंदगी भर इंसान जीते तो जाता है,परन्तु ऐसी कई बातें कई शब्द होते है ,जिन्हें वह आजीवन समझ नही पाता...!!शायद इसी का नाम अज्ञान है..!! व्यक्ति खुद को अज्ञान शब्द से जोड़ने से भी कतराता है।वह इस अज्ञान शब्द से भी अज्ञात है,क्योँकि अज्ञान है...!अज्ञान याने जिसका ज्ञान नही है।अज्ञात याने अपरिचित,अजनबी याने जिसे जानते नही है..!!    तो ये मनुष्य की प्रवृत्ति है कि उसे ज्ञात नही जिसका उसे ज्ञान नही है वह उसे ज्ञात कर ले,वह उससे सही व योग्य ज्ञान से परिचित हो...!!    ऐसा ही एक गहन शब्द है ,चरीतार्थ...!!    जिस अलौकिक शब्द को भी हम लोगो के अज्ञान ने अत्यंत सामान्य बना रखा है।हम इस शब्द को जोड़ते है उदरनिर्वाह करना 'इस अर्थ से..!!उदर निर्वाह याने पेट भरना..!परन्तु चरितार्थ शब्द का अर्थ यह नही है...!!   वास्तव में चरितार्थ यह शब्द एक आध्यात्मिक शब्द है ,तो जाहिर है इसका अर्थ भी आध्यात्मिक ही होगा।   अपने चारु चरित से जग में प्राप्त करो फल चारो।ये चारों फल इस चरितार्थ पर निर्भर होते है। चरितार्थ यह एक साधना की विधा की तमाम सीढ़ियों...