Skip to main content

रूहानी सेवा

 परमपिता परमात्मा एक निराकार शक्ति है। उसी निराकार ज्योतिर्मय स्वरूप का एक निराकार बिंदु स्वरूप अंश याने "आत्मा"....!!

    आत्मा भी उन सभी गुणों से युक्त होती है, जिन गुण रूपी शक्तियों से हम निराकार ईंश्वर की उपासना करते है। तथापि जब आत्मा पंचतत्व  रूपो से युक्त देह के सम्बंध में आती है, तब देह अर्थात पंचतत्त्व की प्रभावात्मकता से भटक जाती है अपनी वास्तविक पहचान से...!!

    आत्मा की अपनी कई शक्तियां होती है। आत्मा की विचार करने की शक्ति याने मन...,उसकी निर्णय करने की शक्ति याने बुद्धी.., उसकी देह के द्वारा कार्य करने की योग्यता याने कर्म...,तथा कर्म करने की पद्धति एवं गुणात्मकता के द्वारा होता कर्म का दृढ़ीकरण याने आत्मा के संस्कार...!!एक देह छोड़े दूसरे देह को धारण करने के पश्चात भी आत्मा की ये मन, बुद्धी एवं संस्कार सदैव उसके साथ रहते है, जिससे ही उसको कर्म भोग एवं प्रारब्ध को भुगतना पड़ता है।

   आत्मा का स्थान मनुष्य की दोनों भृकुटियों के बीच मे होता है। आत्मा जब भी नया देह धारण करती है तब अपने साथ में बोलना, देखना, सुनना, संवेदना, बुद्धि, मन की समस्त चेतना शक्तियोंँ को लेकर आती है। तथा जब किसी भी देह को छोड़ जाती है, तब ये सारी शक्तियां साथ ही लेकर जाती है। जैसे, कर्म आत्मा करती है वैसे ही परिणाम आत्मा को अपने स्थित तथा अगले जन्म में मिलते है। आत्मा अपनी काया (देह), वाचा (वाणी), मन (सोच) के द्वारा कर्म करती है, वो सारे कर्म अपना कर्म फल दिए बगैर नहींं रहते।

  आत्मा की ईंश्वर को याद करने की पद्धति ही ध्यान कहलाती है। जितनी अधिक ध्यान की तीव्रता एवं योग्यता होगी उतनी अधिक योग शक्ति उसे फल देती है। अगर ईंश्वर को सभी आत्मा याद के द्वारा प्राप्त करती है, तो आत्मा को ये भी नहींं भूलना चाहिए कि वही आत्मा केवल योग, याद के द्वारा किसीका भी कल्याण कर सकती है...!! ये कल्याण का भाव रखना तथा उसे करते रहना ही रूहानी सेवा कहलाती है...!!

   हम अगर अपने दिल से किसी भी आत्मा को प्रेम युक्त योग में, ध्यान में बैठ संकल्प के द्वारा शुभ सकाश देकर उसका भला चाहे लगातार कम से कम 7,11,21 दिन तथा महीने भी तो उस व्यक्ति की सारी आपदाएं, मुश्किलें, बीमारी तुरन्त दूर हो जाती है। आवश्यकता है कि ये विधि की कृति सातत्य युक्त हो एवं स्वार्थ रहित हो। इसी के साथ अगर ये सकाश भोर के 4 से 5 बजे के बीच हो तो अधिक तीव्रता से फल की प्राप्ति भी होगी। यही कर्म करते समय अगर भाव बुरा या पापयुक्त हो तो उसकी कठिन परिणति भी भुगतनी पड़ती है।

   मनुष्य विदेश में स्थित आत्मा को भी सकाश के द्वारा ठीक कर सकता है। इतना ही नहींं किसी मनुष्य के देह में एक आत्मा के अतिरिक्त अन्य कितनी भी आत्मो का वास हुवा हो तो उन आत्माओंं को भी सकाश की दवा दे देकर मुक्ति दिला सकती है।

   ये सब सत्य ज्ञान है। जो शास्वत है तथापि इसे अपनाकर करने के लिए मनुष्य प्रथम स्वयं को सिद्ध करना पड़ता है। धारणा के प्रति निष्ठा जरूरी होती है। फिर हर सकाश को पूर्ण होने में एक दिन का सकाश भी बेहद लाभदायक भी सिद्ध हुआ है।

   तो क्यो न् हम सब विश्व् की समस्त जीवों को सकाश द्वारा प्रेम बांटे...!!ईंश्वर के बच्चे होने का अपना कर्म पूरा करे एक अनोखी निष्ठा के साथ...!! आओ हाथ बढ़ाये...!!

- वृषाली सांनप काळे

Comments

Popular posts from this blog

हिंदी भाषा-शिक्षण में सह-पाठ्यक्रमीय गतिविधियाँ

🌷 हिंदी भाषा-शिक्षण में सह-पाठ्यक्रमीय गतिविधियाँ Hindi Language Teaching Methodology भाषा केवल पुस्तक पढ़कर या व्याकरण के नियम याद करके नहीं सीखी जाती। भाषा का वास्तविक विकास उसके प्रयोग और अभिव्यक्ति से होता है। इसलिए हिंदी भाषा-शिक्षण में ऐसी गतिविधियों का विशेष महत्व है, जिनमें विद्यार्थी स्वयं हिंदी का प्रयोग करते हुए सीखता है। 1. सह-पाठ्यक्रमीय गतिविधियों का अर्थ पाठ्यक्रम में निर्धारित विषयों के साथ विद्यार्थियों के ज्ञान, भाषा-कौशल, रचनात्मकता और व्यक्तित्व के विकास के लिए आयोजित की जाने वाली विभिन्न गतिविधियों को सह-पाठ्यक्रमीय गतिविधियाँ कहा जाता है। हिंदी भाषा के संदर्भ में इन गतिविधियों का मुख्य उद्देश्य विद्यार्थियों को भाषा के वास्तविक प्रयोग के अवसर प्रदान करना है। 2. हिंदी भाषा-शिक्षण में महत्व सह-पाठ्यक्रमीय गतिविधियों से— विद्यार्थियों में हिंदी के प्रति रुचि बढ़ती है। सुनने और बोलने का अभ्यास होता है। पठन एवं लेखन-कौशल विकसित होते हैं। शब्द-भंडार में वृद्धि होती है। उच्चारण और भाषा-प्रयोग में सुधार होता है। रचनात्मकता एवं कल्पनाशक्ति का विकास होता ...

Digital Security (डिजिटल सुरक्षा) की पहली सीढ़ी

प्रस्तावना आज का समय Digital Era (डिजिटल युग) है। तकनीक ने हमारे जीवन को सरल, तेज़ और सुविधाजनक बनाया है। बैंकिंग से लेकर शिक्षा, सरकारी सेवाओं से लेकर ऑनलाइन खरीदारी, ई-मेल से लेकर सामाजिक माध्यम (Social Media) तक—हमारे दैनिक जीवन का एक बड़ा भाग अब डिजिटल माध्यमों पर आधारित हो चुका है। इसी के साथ हमारी एक Digital Identity (डिजिटल पहचान) भी बन चुकी है। यह पहचान केवल किसी एक वेबसाइट तक सीमित नहीं रहती, बल्कि हमारे अनेक ऑनलाइन खातों, दस्तावेज़ों, व्यक्तिगत जानकारी और डिजिटल सेवाओं से जुड़ी होती है। जैसे-जैसे हमारी सुविधाएँ बढ़ी हैं, वैसे-वैसे हमारी जिम्मेदारियाँ भी बढ़ी हैं। जिस प्रकार हम अपने घर, तिजोरी और महत्वपूर्ण दस्तावेज़ों की सुरक्षा करते हैं, उसी प्रकार अपनी डिजिटल पहचान की सुरक्षा करना भी आज समय की आवश्यकता बन चुकी है। इसी सुरक्षा को हम Digital Security (डिजिटल सुरक्षा) कहते हैं। Digital Security (डिजिटल सुरक्षा) क्या है? Digital Security (डिजिटल सुरक्षा) का अर्थ है—अपने ऑनलाइन खातों, व्यक्तिगत जानकारी, महत्वपूर्ण दस्तावेज़ों और डिजिटल पहचान को अनधिकृत पहुँच (Unautho...

भाग -5 : हिंदी विषय पद्धतिशास्त्र

  TAT HS/S – हिंदी विषय पद्धतिशास्त्र महत्वपूर्ण प्रश्न–उत्तर (भाग–5) (प्रश्न 81 से 100) 81. भाषा-शिक्षण में मूल्यांकन का मुख्य उद्देश्य क्या है? उत्तर: विद्यार्थियों की उपलब्धि, प्रगति एवं शिक्षण उद्देश्यों की प्राप्ति का आकलन करना। 82. भाषा-शिक्षण में वर्तनी-शिक्षण का उद्देश्य क्या है? उत्तर: विद्यार्थियों में शुद्ध एवं मानक वर्तनी लिखने की आदत विकसित करना। 83. भाषा-शिक्षण में उच्चारण-शिक्षण का महत्व क्या है? उत्तर: शुद्ध, स्पष्ट एवं प्रभावी बोलने की क्षमता का विकास करना। 84. भाषा-दोष (Language Errors) क्या हैं? उत्तर: भाषा के प्रयोग में होने वाली अशुद्धियाँ, जैसे— उच्चारण दोष वर्तनी दोष व्याकरण दोष वाक्य-रचना दोष 85. भाषा-दोषों के कारण लिखिए। उत्तर: मातृभाषा का प्रभाव अभ्यास की कमी गलत उच्चारण शब्द-भंडार की कमी शिक्षक का अनुचित मार्गदर्शन 86. भाषा-दोषों के निवारण के उपाय लिखिए। उत्तर: नियमित अभ्यास शुद्ध उच्चारण पठन-पाठन शब्दकोश का उपयोग त्रुटि-सुधार एवं प्रतिपुष्टि 87. भाषा-शिक्षण में प्रश्नोत्तर विधि का महत्व क्या है? ...