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श्रद्धा की अनुभूति

श्रद्धा से किया गया हर जप सबसे पहले साधक के अंतर्मन को स्पर्श करता है। फिर वही भाव मौन प्रार्थना बनकर ईश्वर के श्रीचरणों में पहुँच जाता है। और वहाँ से लौटता है— शांति, धैर्य, विश्वास और एक नई जीवन-ज्योति बनकर। — कौशल्या वाघेला ‘कुंदन’

प्रार्थना का स्वर

प्रार्थना केवल होंठों से निकले शब्द नहीं, वह तो हृदय की मौन पुकार है। जब भाव निर्मल हों और उद्देश्य लोकमंगल का हो, तब हर श्वास स्वयं एक प्रार्थना बन जाती है। — कौशल्या वाघेला ‘कुंदन’

सृजन की साधना

  सृजन की साधना ** विचार पवित्र हों,  वाणी मधुर हो,  कर्म श्रेष्ठ हों,  और हृदय करुणा से भरा हो।  ऐसा जीवन मिले कि  हमारे कारण किसी के चेहरे पर मुस्कान आए,  और किसी का विश्वास दृढ़ हो। भाव जहाँ निर्मल होते हैं,  वहाँ शब्द अपने नहीं रहते।  वे उस सत्य के हो जाते हैं,  जो हर हृदय में मौन होकर भी बोलता रहता है। ** — कौशल्या वाघेला ‘कुंदन’