सृजन की साधना
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विचार पवित्र हों,
वाणी मधुर हो,
कर्म श्रेष्ठ हों,
और हृदय करुणा से भरा हो।
ऐसा जीवन मिले कि
हमारे कारण किसी के चेहरे पर मुस्कान आए,
और किसी का विश्वास दृढ़ हो।
भाव जहाँ निर्मल होते हैं,
वहाँ शब्द अपने नहीं रहते।
वे उस सत्य के हो जाते हैं,
जो हर हृदय में मौन होकर भी बोलता रहता है।
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— कौशल्या वाघेला ‘कुंदन’
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