सुख-दुःख के उस पार : साक्षीभाव की यात्रा “मनुष्य का विकास सुख की अधिकता से नहीं, बल्कि चेतना की गहराई से मापा जाता है।” “मनुष्य जीवन का सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं है कि सुख कैसे मिले या दुःख कैसे मिटे; सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या कोई ऐसी अवस्था भी है, जहाँ सुख और दुःख दोनों अपनी सत्ता खो दें?” हमारा संपूर्ण जीवन मानो दो ध्रुवों के बीच झूलता रहता है—सुख और दुःख। जब परिस्थितियाँ अनुकूल होती हैं, तो हम उसे सुख कहते हैं; और जब वे हमारे मन के अनुरूप नहीं होतीं, तो वही दुःख कहलाती हैं। धीरे-धीरे हम यह मान बैठते हैं कि जीवन का अर्थ ही सुख को पाना और दुःख से बचना है। किन्तु क्या वास्तव में जीवन केवल इतना ही है? भारतीय चिंतन का उत्तर है— नहीं। जीवन केवल सुख और दुःख का नाम नहीं है। वे तो यात्रा के पड़ाव हैं, मंज़िल नहीं। मनुष्य का वास्तविक विकास तब आरम्भ होता है, जब वह इन दोनों अनुभवों के पार स्थित उस चेतना को पहचानने लगता है, जो हर परिवर्तन की साक्षी है। सूत्र – १ “जन्म और मृत्यु जीवन की दो सीमाएँ हैं। इनके बीच जीवन पकता है। सुख और दुःख उसकी परीक्षाएँ नहीं, उसकी परिपक्वता के स...
“मेरी लेखनी का उद्देश्य केवल शब्दों का सृजन नहीं, बल्कि विचारों का जागरण है।”