Skip to main content

Posts

Showing posts with the label Hindi Sahitya

सच्ची मुक्ति

कभी-कभी जीवन में ऐसे लोग मिलते हैं जिनके लिए हम अपने हृदय में एक विशेष स्थान बना लेते हैं। उनके सुख-दुःख, उनकी बातें, उनकी उपस्थिति—सब हमारे लिए महत्व रखने लगते हैं। हम बिना किसी गणना और बिना किसी शर्त के अपना समय, अपना स्नेह और अपनी शुभेच्छाएँ उन्हें अर्पित कर देते हैं। किन्तु हर संबंध एक-सा नहीं होता। कुछ लोग हमारे भावों को समझते हैं, तो कुछ उन्हें सहज उपलब्ध मान लेते हैं। वे कभी निकट आते हैं, कभी दूर चले जाते हैं, फिर लौटते हैं और फिर वही दूरी बना लेते हैं। उनके इस व्यवहार से मन थकने लगता है। तब प्रश्न उठता है—क्या हमें उनसे शिकायत करनी चाहिए, या स्वयं को समझना चाहिए? समय के साथ समझ में आता है कि मनुष्य का स्वभाव उसके अपने संस्कारों, अनुभवों और दृष्टिकोण से निर्मित होता है। हम किसी के व्यवहार को बदलने का प्रयास कर सकते हैं, पर उसे नियंत्रित नहीं कर सकते। जो हमारे वश में है, वह केवल हमारा दृष्टिकोण और हमारी प्रतिक्रिया है। जब अपेक्षाएँ बढ़ती हैं, तब उपेक्षा अधिक चुभती है। और जब हम अपने सुख का आधार दूसरों की प्रतिक्रिया को बना लेते हैं, तब मन बार-बार आहत होता है। परंतु जिस दिन हम ...

प्रतीक्षा के वर्ष (एक आत्मकथात्मक संस्मरण)

“कुछ प्रतीक्षाएँ हमें मंज़िल तक नहीं पहुँचातीं, बल्कि हमें हमारे वास्तविक स्वरूप तक पहुँचा देती हैं।” मेरे कमरे की खिड़की से आकाश का एक छोटा-सा टुकड़ा दिखाई देता है। वर्षों से वह आकाश मेरे सुख-दुःख, आशा-निराशा और प्रतीक्षा का मौन साक्षी रहा है। जब भी मन उलझ जाता है, मैं कुछ देर उसी खिड़की के पास बैठ जाती हूँ और दूर तक फैले आकाश को निहारती रहती हूँ। कभी-कभी मुझे लगता है कि मेरे सपने भी बादलों की तरह हैं। वे आते हैं, कुछ देर ठहरते हैं और फिर किसी नई दिशा में आगे बढ़ जाते हैं। जीवन के इस पड़ाव पर बैठकर जब मैं पीछे मुड़कर देखती हूँ, तो मुझे अपने जीवन का एक लंबा अध्याय दिखाई देता है—प्रतीक्षा का अध्याय। लेकिन आज मैं उसे केवल प्रतीक्षा का अध्याय नहीं कहती, क्योंकि उसी ने मुझे मेरे वास्तविक स्वरूप से परिचित कराया। बचपन से ही हिंदी भाषा मेरे मन के बहुत निकट रही है। शब्दों से मेरा रिश्ता केवल पढ़ने-लिखने का नहीं था, बल्कि भावनाओं का था। किताबों के पन्नों में मुझे अपना संसार मिलता था। यही कारण था कि मैंने अपनी शिक्षा का मार्ग भी हिंदी के साथ चुना। पढ़ाई पूरी की, शिक्षण से जुड़ी योग्यताएँ प्...

प्राचीन भारतीय आर्य भाषा की विशेषताएं

प्राचीन भारतीय आर्य भाषा की विशेषताएं : *        प्राचीन आर्य भाषा में 13 स्वर ध्वनियाँ थी। जिसमे 9 स्वर थे – अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ऋ, ॠ, लृ *        चार संध्य स्वर थे – ए, ऐ, ओ, औ *        ‘ऐ’ और ‘औ’ का उच्चारण क्रमशः ‘आई’ एवं ‘आउ’ होता था। *        व्यंजनों के पांच वर्ग बन चुके थे – 1)      क वर्ग 2)      च वर्ग 3)      ट वर्ग 4)      त वर्ग 5)      प वर्ग *        इसके अतिरिक्त चार अर्ध स्वर – [ य, र, ल, व ] एवं तीन उष्म – श, ष, स तथा एक महाप्राण ‘ह’ ध्वनियाँ थी। *        एक अनुनासिक (ं) एवं एक विसर्ग (ः) भी था। शब्दों के रूप, लिंग (तीन), वचन (तीन) एवं कारक (आठ) के आधार पर बनते थे। *        विशेषण संज्ञा के समान ही परिवर्तित होते थे। सर्वनामों के रूप मे...

संस्कृत भाषा के शब्द भंडार से सम्बंधित बातें

संस्कृत भाषा के शब्द भंडार से सम्बंधित बातें : संस्कृत भाषा का शब्द भंडार अक्षय और अनंत है। इस भाषा का शब्द निर्माण कितना वैज्ञानिक है कि आवश्यकता अनुसार प्रत्येक विषय के नविन शब्दों का निर्माण सरलता से उत्पन्न हो जाता है। हिंदी में डॉ. रघुवीर ने संस्कृत के आधार पर ही एक बृहत् कोष तैयार किया है। जिसमें  विज्ञानं, अर्थशास्त्र, चिकित्सा, अभियंत्रणा, तकनीकी प्राविधि की और प्रशासन  के अंग्रेजी शब्दों का हिंदी में अनुवाद मौजूद है। विक्रमकालिन महाकवि कालिदास से पूर्व संस्कृत साहित्य का पूर्ण विकास हो चूका था. कालिदास के प्रादुर्भाव से (आगमन से) संस्कृत साहित्य और भाषा में एक नूतन आभा और प्रतिभा छिटकी। जिस की चमक आज भी विद्यमान है।  ‘अभिज्ञानशाकुंतलम्’, ‘मेघदूत’, कुमारसंभव’  आदि उनके अद्वितीय ग्रन्थ है। कालिदास की रचनाएँ  ‘न भूतो न भविष्यति’  का वास्तविक उदहारण है।  अश्वघोष ,  भारवी ,  माघ ,  श्री हर्ष  आदि महा महाकवियों ने कालिदास की शैली का अनुशरण किया। हिन्दी के रीतिकालीन और ब्रजभाषा के अनेक कवियों ने कालिदास को अपना आदर्श माना है...

प्राचीन भारतीय आर्य भाषाओँ का विकास

प्राचीन भारतीय आर्य भाषाओँ का विकास :       भारतीय आर्य भाषाओ का विकास लगभग साढ़े तिन हजार वर्षो का है। ‌‍ भारतीय आर्य भाषाओ का इतिहास ईसासे लगभग  1500 ई.पूर्व  आरंभ होता है। विद्वानों का मानना है कि अपने मूल स्थान से चलकर भारत ईरानी लोग  ओकसस घाटी  के पास आए। वहाँ से फिर उनका एक वर्ग  ईरान   चला गया, दूसरा  कश्मीर   तथा उसके आस-पास, तीसरा  भारत ।       भारत में अर्यो के आने के बाद से उनकी भारतीय आर्य भाषा का इतिहास शुरू होता है। भाषा शास्त्रीयों का मानना है कि आर्यों के भारत आगमन से पूर्व यहाँ  नेग्रोटी, ऑस्ट्रिक, किरात, द्रविड़  जातियां रहा कराती थी।       आर्य जातियों की भाषा को ‘आर्य भाषा’ कहते है।  गुजरात, बिहार, बंगला, आसाम, उत्तर भारत, मध्य भारत  में आर्यों की प्रधानता थी। दक्षिण में  कर्णाटक, आंध्र प्रदेश ,  केरल  में  द्रविड़ो  का प्रभुत्व था। इसी आर्य भाषा से भारत की अन्य आधुनिक आर्य भाषाओँ का विकास ...