Skip to main content

प्राचीन भारतीय आर्य भाषाओँ का विकास

प्राचीन भारतीय आर्य भाषाओँ का विकास :
      भारतीय आर्य भाषाओ का विकास लगभग साढ़े तिन हजार वर्षो का है। ‌‍भारतीय आर्य भाषाओ का इतिहास ईसासे लगभग 1500 ई.पूर्व आरंभ होता है। विद्वानों का मानना है कि अपने मूल स्थान से चलकर भारत ईरानी लोग ओकसस घाटी के पास आए। वहाँ से फिर उनका एक वर्ग ईरान  चला गया, दूसरा कश्मीर  तथा उसके आस-पास, तीसरा भारत
      भारत में अर्यो के आने के बाद से उनकी भारतीय आर्य भाषा का इतिहास शुरू होता है। भाषा शास्त्रीयों का मानना है कि आर्यों के भारत आगमन से पूर्व यहाँ नेग्रोटी, ऑस्ट्रिक, किरात, द्रविड़ जातियां रहा कराती थी।
      आर्य जातियों की भाषा को ‘आर्य भाषा’ कहते है। गुजरात, बिहार, बंगला, आसाम, उत्तर भारत, मध्य भारत में आर्यों की प्रधानता थी। दक्षिण में कर्णाटक, आंध्र प्रदेशकेरल में द्रविड़ो का प्रभुत्व था। इसी आर्य भाषा से भारत की अन्य आधुनिक आर्य भाषाओँ का विकास हुआ है।
      भाषागत विशेताओं और विभिन्नताओं के कारण आर्य भाषा की लम्बी आयु को तीन काल खंडो में बांटा गया है ---
       [1]    प्राचीन कालीन भारतीय आर्य भाषाएँ (1500 ई.पूर्व से 500 ई. पूर्व)
       [2]    मध्यकालीन भारतीय आर्य भाषाएँ (500 ई.पूर्व से 1000 ई. तक)
       [3]    आधुनिक भारतीय आर्य भाषाएँ (1000 ई. से अब तक)

[1]          प्राचीन कालीन भारतीय आर्य भाषाएँ (1500 ई.पूर्व से 500 ई. पूर्व)
इस काल का समय 1500 ई.पूर्व से 500 ई.पूर्व तक मन गया है। इस काल को ‘वैदिक संस्कृत’ अथवा ‘केवल संस्कृत काल’ भी कहा जाता है। विकास की द्रष्टि से इस काल की भाषा के दो रूप है ---
[क]     वैदिक भाषा अथवा वैदिक संस्कृत
[ख]     संस्कृत अथवा लौकिक संस्कृत

[क]     वैदिक भाषा अथवा वैदिक संस्कृत :
वैदिक संस्कृत वेदों  की भाषा का नाम है। जिनका प्राचीनतम रूप ‘ॠगवेद’ में है। ‘ॠगवेद’ संभवतः संसार की प्राचीनतम प्रमाणिक रचना है।
हार्नले (1880) के विचारो के अनुसार आर्य दो भिन्न समयों एवं दो भिन्न स्थानों  से भारत आए। प्रथम बार आनेवाले आर्य पश्चिमोत्तरी दर्रे से भारत में प्रविष्ट हुए, जब कि बाद में आनेवाले आर्य उत्तरों के पर्वतो को लांघकर भारत में प्रविष्ट हुए। दूसरी बार आनेवाले आर्यों के दबाव के कारण पहले आए हुए आर्य मध्यदेश से हटकर मध्यदेश के पूर्व, पश्चिम एवं दक्षिण में फ़ैल गए। नवागंतुक आर्य मध्यदेश में बस गए। इस कारण मध्यदेश अथवा केन्द्रीय एवं बाहरी क्षेत्रो के आर्यों की भाषा में भिन्नता उत्पन्न हो गई। हार्नले का यह विचार था की बाद में आए हुए आर्य ही वैदिक संस्कृत के निर्माता थे।
डॉ. भोलानाथ तिवारी का कहना है कि – आर्य जब भारत आए, उस समय उनकी भाषा तत्कालीन ईरानी भाषा से कदाचित अलग नहीं है, किन्तु जैसे-जैसे इस स्थान के प्रत्यक्ष या परोक्ष प्रभाव, विषेशतर आर्योत्तर लोगों के मिश्रण के कारण प्रभाव पड़ने लगा और  भाषा परिवर्तित होने लगी। इस प्रकार वह अपनी भगिनी भाषा ईरानी से कई बातों में अलग हो गए।
भारतीय आर्य भाषाओ का प्राचीनतम रूप वैदिक संहिताओं में मिलता है। बहुत से प्राचीन शब्द इसमें इसे है, जो बाद में नहीं मिलते। वैदिक संहिताओं का काल मोटे रूप में 1200 ई. पूर्व से 900 ई. पूर्व के लगभग है। यूँ वैदिक संहिताओं की भाषा में भी एकरूपता मिलती है। कुछ की परवर्ती (बाद की) उदहारण : ऋग्वेद में ही प्रथम और दशवें मंडलों की भाषा तो बाद की है और शेष की यही पुराणी भाषा अवेस्ता से अपेक्षाकृत पुराणी है।
अन्य संहिताएँ [यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद] और बाद की है वैदिक संहिताओं की भाषा तत्कालीन (उस समय की) भाषा से कुछ भिन्न है, क्योंकि यह काव्य भाषा है। ब्राह्मणों (ब्राह्मण ग्रन्थ) उपनिषदों की भाषा कुछ अपवादों को छोड़कर संहिताओं के बाद की है। इनमें इतनी जटिलता एवं रूपों का आधिक्य नहीं है। इनके गद्य भाग की भाषा तत्कालीन बोल-चाल की भाषा के निकट है। इस समय आर्यों का केंद्र सप्तसिंधु या आधुनिक पंजाब था। लेकिन आगे चलकर आर्यों का केंद्र मध्यप्रदेश हो चूका था। यद्यपि इधर की भाषा उत्तरी जितनी शुद्ध नहीं थी। इस भाषा का काल 900 ई. पूर्व के बाद का है।
भाषा का और विकसित रूप ‘सूक्तों’ में मिलता है। इसका काल 700 ई. पूर्व के बाद का है। यह संस्कृत पाणिनीय संस्कृत के काफी पास पहुँच गई है। यद्यपि उसमें पाणिनीय संस्कृत की एकरूपता नहीं है।
वेदों की भाषा साहित्यिक एवं लोकभाषा का मिश्रित रूप है। प्रदेशगत या स्थान भिन्नता के बावजूद यह सारे हिंदुस्तान में जनभाषा के रूप में प्रचलित थी।
वैदिक संस्कृत का साहित्य भंडार भी बहुत समृद्ध था। चारों वेद इस भाषा के प्रमुख ग्रन्थ है। वैदिक भाषा में नैसर्गिक प्रयोग की स्वच्छंदता थी। आगे चलकर ब्राह्मण ग्रंथों एवं उपनिषदों की रचनाएँ हुईं। इन रचनाओं की भाषा वैदिक भाषा से परिवर्तित लगाती है। उपनिषद काल तक आते-आते वैदिक भाषा रूढ़ हो गई थी। उसी से फिर क्लासिकल संस्कृत का विकास हुआ। पाणिनि का समय ई. पूर्व 5 वीं सदी माना जाता है। पाणिनि से पूर्व भाषा के दो रूप वैदिक और लौकिक मिलते है। पर पाणिनि ने इस भेद को दूर करने के लिए एक ही रूप सर्व मानी किया। इसी लिए आगे चलकर देश को जन समुदाय की बोल के नमूने अप्राप्य है। वैसे संस्कृत साहित्यिक भाषा से भिन्न कुछ बोलियाँ अवश्य थी। पाणिनि ने अपने व्याकरण ‘अष्टाध्यायी’ में संस्कृत का एक रूप स्थिर किया इसलिए संस्कार युक्त होकर ‘संस्कृत’ कहलाई।
आर्य पश्चिमोत्तर से पूर्व और दक्षिण की ओर बढे थे। अतः आर्य भाषा के पूर्वी एवं दक्षिणी रूप की स्थानीय भाषाओँ के प्रभाव से अधिक प्रभावित थे। इसलिए पाणिनि ने संस्कृत के उत्तरी रूप को आदर्श रूप स्वीकार किया एवं अन्य रूपों को शिष्ट प्रयोग ने बाहर कर दिया। इस प्रकार पाणिनि ने आर्य भाषा को ईएसआई स्थिरता दी कि वह जनभाषा न बनकर देव भाषा बन गई।

[ख]   संस्कृत अथवा लौकिक संस्कृत :
भाषा के अर्थ में ‘संस्कृत’ [संस्कार की गई, शिष्ट या अवभृत] शब्द का प्रथम प्रयोग ‘वाल्मीकि रामायण’ में मिलता है। वैदिक काल में भाषा के तीन भौगोलिक रूप उत्तरी, मध्य्देशी, पूर्वी विकसित हो चुके थे। लौकिक संस्कृत का मूलाधार इनमें उत्तरी बोली थी। क्योंकि वही प्राथमिक मानी जाती थी। यों पाणिनि ने अन्यो के भी कुछ रूप आदि लिए है और उन्हें वैकल्पिक कहा है। इस प्रकार मध्देशी एवं पूर्वी का भी संस्कृत पर कुछ प्रभाव है। लौकिक या क्लासिकल संस्क्रत साहित्यिक भाषा है। जिस प्रकार जयशंकर प्रसाद की गद्य भषा या पद्य भाषा को बोल-चाल की भाषा नहीं कह सकते। प्रसाद जी की भाषा का आधार मानक खड़ी बोली हिंदी है, जो बोल-चाल की भाषा है। उसी प्रकार पाणिनीय संस्कृत भी तत्कालीन पंडित समाज की बोल-चाल की भाषा पर आधारित है।  
      “संस्कृत भाषा जिसे अमरभाषा या देववाणी भी कहते है, भारत ही नहीं विश्व की प्राचीन और परिष्कृत भाषा है। इस एक भाषा ने मानव की सभ्यता और संस्कृति निर्माण और उत्थान में सर्वाधिक सहयोग प्रदान किया है। विश्व की सभी आर्य भाषाएँ संस्कृत से ही उत्पन्न हुयी है।” – डॉ. रामेश्वर मिश्र
अनुसंधानों एवं गणवेषणाओं ने यह सिद्ध कर दिया है कि पाश्चात्य देशो कि ग्रीक, लेटिन, जर्मन, इंग्लिश, रुसी आदि भाषाएँ भी संस्कृत अनुप्राणित है। यद्यपि भारत की द्रविड़ भाषाएँ जिनका मूल और पद्धति संस्कृत से भिन्न है। इनमे भी अत्याधिक शब्द संस्कृत भाषा के ही है। अफ़घानिस्थान की ‘पश्तों’ भाषा संस्कृत से उत्पन्न है। शिलौन की सिंहली भषा साक्षात् संस्कृत प्रसूत है। कम्बोडिया, जावा, सुमषा आदि की भाषाएँ संस्कृत से ही अनुप्राणित और भारतीय देवनागरी लिपि में लिखीं गई है। आज भी उन द्वीपों में मठो में, मंदिरों, नाटकों, लोक-नृत्यों एवं लोक-कथाओं में यहाँ तक कि नामों में भी रामायण और महाभारत का पूर्ण प्रभाव पाया जाता है। ग्रीक, रोमन, हिब्रू आदि पाश्चात्य भाषाएँ तथा पाली, प्राकृत आदि संस्कृत भषा ऋग्वेद से आज तक अधिकृत रूप में सम्पूर्ण भारत में एक रूप से व्यवहृत हो रही है


- कौशल्या वाघेला

________******_________******________******____________

Comments

Popular posts from this blog

हिंदी भाषा-शिक्षण में सह-पाठ्यक्रमीय गतिविधियाँ

🌷 हिंदी भाषा-शिक्षण में सह-पाठ्यक्रमीय गतिविधियाँ Hindi Language Teaching Methodology भाषा केवल पुस्तक पढ़कर या व्याकरण के नियम याद करके नहीं सीखी जाती। भाषा का वास्तविक विकास उसके प्रयोग और अभिव्यक्ति से होता है। इसलिए हिंदी भाषा-शिक्षण में ऐसी गतिविधियों का विशेष महत्व है, जिनमें विद्यार्थी स्वयं हिंदी का प्रयोग करते हुए सीखता है। 1. सह-पाठ्यक्रमीय गतिविधियों का अर्थ पाठ्यक्रम में निर्धारित विषयों के साथ विद्यार्थियों के ज्ञान, भाषा-कौशल, रचनात्मकता और व्यक्तित्व के विकास के लिए आयोजित की जाने वाली विभिन्न गतिविधियों को सह-पाठ्यक्रमीय गतिविधियाँ कहा जाता है। हिंदी भाषा के संदर्भ में इन गतिविधियों का मुख्य उद्देश्य विद्यार्थियों को भाषा के वास्तविक प्रयोग के अवसर प्रदान करना है। 2. हिंदी भाषा-शिक्षण में महत्व सह-पाठ्यक्रमीय गतिविधियों से— विद्यार्थियों में हिंदी के प्रति रुचि बढ़ती है। सुनने और बोलने का अभ्यास होता है। पठन एवं लेखन-कौशल विकसित होते हैं। शब्द-भंडार में वृद्धि होती है। उच्चारण और भाषा-प्रयोग में सुधार होता है। रचनात्मकता एवं कल्पनाशक्ति का विकास होता ...

Digital Security (डिजिटल सुरक्षा) की पहली सीढ़ी

प्रस्तावना आज का समय Digital Era (डिजिटल युग) है। तकनीक ने हमारे जीवन को सरल, तेज़ और सुविधाजनक बनाया है। बैंकिंग से लेकर शिक्षा, सरकारी सेवाओं से लेकर ऑनलाइन खरीदारी, ई-मेल से लेकर सामाजिक माध्यम (Social Media) तक—हमारे दैनिक जीवन का एक बड़ा भाग अब डिजिटल माध्यमों पर आधारित हो चुका है। इसी के साथ हमारी एक Digital Identity (डिजिटल पहचान) भी बन चुकी है। यह पहचान केवल किसी एक वेबसाइट तक सीमित नहीं रहती, बल्कि हमारे अनेक ऑनलाइन खातों, दस्तावेज़ों, व्यक्तिगत जानकारी और डिजिटल सेवाओं से जुड़ी होती है। जैसे-जैसे हमारी सुविधाएँ बढ़ी हैं, वैसे-वैसे हमारी जिम्मेदारियाँ भी बढ़ी हैं। जिस प्रकार हम अपने घर, तिजोरी और महत्वपूर्ण दस्तावेज़ों की सुरक्षा करते हैं, उसी प्रकार अपनी डिजिटल पहचान की सुरक्षा करना भी आज समय की आवश्यकता बन चुकी है। इसी सुरक्षा को हम Digital Security (डिजिटल सुरक्षा) कहते हैं। Digital Security (डिजिटल सुरक्षा) क्या है? Digital Security (डिजिटल सुरक्षा) का अर्थ है—अपने ऑनलाइन खातों, व्यक्तिगत जानकारी, महत्वपूर्ण दस्तावेज़ों और डिजिटल पहचान को अनधिकृत पहुँच (Unautho...

भाग -5 : हिंदी विषय पद्धतिशास्त्र

  TAT HS/S – हिंदी विषय पद्धतिशास्त्र महत्वपूर्ण प्रश्न–उत्तर (भाग–5) (प्रश्न 81 से 100) 81. भाषा-शिक्षण में मूल्यांकन का मुख्य उद्देश्य क्या है? उत्तर: विद्यार्थियों की उपलब्धि, प्रगति एवं शिक्षण उद्देश्यों की प्राप्ति का आकलन करना। 82. भाषा-शिक्षण में वर्तनी-शिक्षण का उद्देश्य क्या है? उत्तर: विद्यार्थियों में शुद्ध एवं मानक वर्तनी लिखने की आदत विकसित करना। 83. भाषा-शिक्षण में उच्चारण-शिक्षण का महत्व क्या है? उत्तर: शुद्ध, स्पष्ट एवं प्रभावी बोलने की क्षमता का विकास करना। 84. भाषा-दोष (Language Errors) क्या हैं? उत्तर: भाषा के प्रयोग में होने वाली अशुद्धियाँ, जैसे— उच्चारण दोष वर्तनी दोष व्याकरण दोष वाक्य-रचना दोष 85. भाषा-दोषों के कारण लिखिए। उत्तर: मातृभाषा का प्रभाव अभ्यास की कमी गलत उच्चारण शब्द-भंडार की कमी शिक्षक का अनुचित मार्गदर्शन 86. भाषा-दोषों के निवारण के उपाय लिखिए। उत्तर: नियमित अभ्यास शुद्ध उच्चारण पठन-पाठन शब्दकोश का उपयोग त्रुटि-सुधार एवं प्रतिपुष्टि 87. भाषा-शिक्षण में प्रश्नोत्तर विधि का महत्व क्या है? ...