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चरितार्थ

कितनी हैरत की बात है कि जिंदगी भर इंसान जीते तो जाता है,परन्तु ऐसी कई बातें कई शब्द होते है ,जिन्हें वह आजीवन समझ नही पाता...!!शायद इसी का नाम अज्ञान है..!!
व्यक्ति खुद को अज्ञान शब्द से जोड़ने से भी कतराता है।वह इस अज्ञान शब्द से भी अज्ञात है,क्योँकि अज्ञान है...!अज्ञान याने जिसका ज्ञान नही है।अज्ञात याने अपरिचित,अजनबी याने जिसे जानते नही है..!!
   तो ये मनुष्य की प्रवृत्ति है कि उसे ज्ञात नही जिसका उसे ज्ञान नही है वह उसे ज्ञात कर ले,वह उससे सही व योग्य ज्ञान से परिचित हो...!!
   ऐसा ही एक गहन शब्द है ,चरीतार्थ...!!
   जिस अलौकिक शब्द को भी हम लोगो के अज्ञान ने अत्यंत सामान्य बना रखा है।हम इस शब्द को जोड़ते है उदरनिर्वाह करना 'इस अर्थ से..!!उदर निर्वाह याने पेट भरना..!परन्तु चरितार्थ शब्द का अर्थ यह नही है...!!
  वास्तव में चरितार्थ यह शब्द एक आध्यात्मिक शब्द है ,तो जाहिर है इसका अर्थ भी आध्यात्मिक ही होगा।
  अपने चारु चरित से जग में प्राप्त करो फल चारो।ये चारों फल इस चरितार्थ पर निर्भर होते है।
चरितार्थ यह एक साधना की विधा की तमाम सीढ़ियों को गहनता से संजोए हुवे है।
   अर्थात मनुष्य अपना सम्पूर्ण जीवन उस आदि सत्य को पाना जानना चाहता है,जिसे अंतिम सत्य कहते है।वह शक्ति जो इस सृष्टि की नियंता है,अर्थात सर्व शक्तिशाली शक्ति,परम् पिता परमात्मा...!!
  उस शक्ति तक जाने के उस शक्ति को पाने की चार सोपान हासिल करने से जीवन को अर्थ प्राप्त होता है..याने चरितार्थ।चरित को अर्थ मिलता है..!!
भक्ति योग,कर्म योग,सन्यास योग तथा ज्ञान योग...!!ये चार सोपान हासिल हुवे बगैर चरितार्थ नही होगा व जीवन सफल भी नही बनेगा।
     मनुष्य भक्ति के कर्मकांड को तो करता ही रहता है।कभी भय के कारण तो कभी श्रद्धा के कारण
परन्तु भक्तियोग तो नविधा हो तभी सफल होती है,बावजूद इसके यही नजर आता है कि,लोग नविधा भक्ति की 5या6 सीढी के आगे जाना ही नही चाहते तो नॉवी सीढी तक क्या जाएंगे..!!यही कारण से भक्ति को अंध श्रद्धा से बदनाम किया जाता है।
  परन्तु नविधा भक्ति से ईश्वर की पहचान पाने में सहायता होती है,उसके अस्तित्व से आश्वस्त होते है परन्तु प्राप्ति नही होती।
भक्ति योग का परिणाम,असर मनुष्य के कर्म में न हुवा तो वो भक्ति किस का की..??इसलिए भक्तियोग के ज्ञान व अनुभूतियों के द्वारा मनुष्य का कर्मयोग बदलना जरूरी है..!!
  केवल कर्मयोग से भी सर्वस्व सही नही होता उसके लिए इस मायावी जगत से सन्यास की प्रवृत्ति का होना भी जरूरी है।भक्ति व कर्म को करते भी अगर व्यक्ति माया में आसक्त है,समस्त विकारों से ग्रस्त है..तो भक्त के साथ भगवान भी बदनाम हो जाता है..!!
   ऐसा होता है ,वह न होवे इसलिए सही व शास्वत ज्ञान योग का ज्ञान होना जरूरी है,तब मनुष्य ज्ञान योग,सन्यास योग,कर्म योग तथा भक्ति योग के द्वारा भी परमात्मा तक पहुंच पाते है,व जीवन को सार्थक कर सकते है...!!
  ये चार योग सम्पूर्ण साधक बनकर प्राप्ति करने के पश्चात ही मनुष्य अपने समस्त इंद्रियों व पंच भूतों पर राज्य कर पाता है...ईश्वरीय शक्ति की सहायता से...!!
यह ईश्वरीय सहायता प्राप्त कर अपने समस्त सेवा भावी क्रिया कलाप सेवाधारी बनकर करना इसका ही नाम राजयोग है...!!जो दृढ़ता,प्रेम,एकाग्रता,विश्वास से अवगुणों के संस्कार को परिवर्तित होता है,इसको परिवर्तित कर सबके स्नेहिल व सहकार्य को तत्पर रहना ही मनुष्य का सत्य धर्म है...!!श्रेष्ठ धर्म है...!!
   यह ऐसा इस पद्धति से जाने से ही मनुष्य का चरितार्थ सही होता है...!!


वृषाली सानप काले

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