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रिश्ता (संवादात्मक कथा)

"कैसी हो राधिका..?"
"ठीक हुँँ..?"
"खुश हो..?"
"शायद खुश भी..?"
"शायद नहींं, यकीन से बोलो...?"
"आज इतने दिनों बाद हम मिले है, क्या झगड़ने के लिए..?"
"अरे झगड़ा नहींं पर ..दोस्त हुंं न तुम्हारा...?"
"वो तो हो ही,रहोगे भी.."
"उस दिन 2 महीने पहले तुम्हारी फोन पर सुनी आवाज, तुम्हारे साथ तुम्हारे पति ने किया बर्ताव..मारपीट,..वो रोती कलपती आवाज ..
कैसे भूल सकता हुंं मैं..??
राधिका...?"
"..."
"पंख लगाकर आजाऊ ऐसी मेरी अवस्था थी..पर दुख ये था कि उस वक्त मैं तुम्हारे लिए कुछ भी नहींं कर सकता था...केवल तुमने डाली कसम की वजह से..."
"तो क्या करे सागर..घर की बात चौराहे पे तो नहींं लायी जाती...?"
"हाँँ, बिल्कुल सही मैं तो बाहरवाला हुंं न..?"
"अगर ऐसा होता तो ये बात सबसे पहले तुमसे नहींं कहती दोस्त..."
"अरे मेरा ये मतलब नहींं था, गलत न समझो.."
"तुम तो मेरा सहारा हो, जो बात अपने पति, भाई, बहन, माँँ-बाप से भी नहींं कह सकती वो लाखो बाते तुमसे बांटी है मैंने..."
"जानता हूँ, भरोसा भी है, तोडूंगा भी नहींं..."
"मुझे भी..."
"लेकिन तुम मुझे बताओ.. दुनिया को ज्ञान की बाते बताती हो एक पत्थर दिल इंसान के समान कोई इंसान कोई पति अपनी पत्नी जानवरो की तरह पीटै ये किस नैतिकता की डिक्शनरी में बैठता है..? वो अपनी पत्नी को कैसे मार सकता है..?? जिसके साथ 24 साल की जिंदगी गुजारे ...उसे.."
"..जाने दो सागर, मैं भूल चुकी हूं तुम भी भूलो..'
"कैसे कैसे..? राधिका..कैसे..? क्या 24 साल के जीवन मे उसे उस पत्नी के साथ कभी प्यार पैदा नहींं हुआ..? इतने सालों में उसके परिवार के लिए उसने किया समर्पण बेकार था..?"
"सागर..भगवान के लिए चुप हो जाओ.."
"राधिका, जहां प्यार होता है, वहां लाखो गलतियां भी माफ कर दी जाती है, फिर तुम..तुम तो बेकसूर थी.."
"तुम किसीको गलत भी नहींं बोल सकती, तुम किसीका दिल भी नहींं दुखा सकती, तुम किसीको दर्द देने की बात सोच भी नहींं सकती..."
"सागर, अब रुको, मैंंने उन्हें माफ कर दिया है, छोड़ दो.."
"तुम्हारे जैसे सात्त्विक इंसान को पिटनेवाला इंसान माफी के लायक भी है क्या...? बोलो...?"
"सागर, सब सच है, बिल्कुल सच है। पर दोस्त जब जुड़ जाते है न किसीसे तो वो व्यक्ति जैसा है वैसे उसे एक्सेप्ट कर लो..फिर जीवन आसान होता है.."
"पर तुम्हारा कहाँ हुआ है..?"
"जीवन हुआ तो है दोस्त, मेरी इतनी फिक्र करनेवाला दोस्त मिला है। मेरे आंसू पलको में उठानेवाला साथी मिला है, हर मुश्किल में मेरे साथ है। मुझ जैसी पागल को संभाल रहा है, यही दोस्ती है, है ना..?"
"......"
"सागर विवाह भी एक दोस्ती है। नेक बन्धन है।एक गलती कर दूसरा माफ करे यही सत्य है। आग हो कोई, तो कोई पानी बने तभी सब ठीक होगा..."
"राधिका फिलोसोफी सुरु हो गयी न तुम्हारी..?"
"सागर, तुम जानते हो मैं फिलॉसफर कैसे बनी इसी जीवन से, आध्यात्म में क्योंं रम गयी इसी जीवन से..,
इस जीवन ने खूब दर्द दिया है ,
.."बहोत पीड़ा दी है, अपनो ने ही..."
"पर तुम उन अपनो को आज भी अपना मानती हो..क्यो..?"
"रिश्ता कोई कांच के टुकड़ा नहींं है दोस्त इसलिए, जीना पड़ेगा..! आज जिस्मानी रिश्तो से ज्यादा मैं रूहानी रिश्तो में जुड़ी हुंं..क्योंं..? इसी पीड़ा से न...?"
"ये भी सच है.."
"तो इसी का नाम रिश्ता है सागर..., तुम पूछते थे न हमेशांं...कौन देता है तुम्हे ये शक्ति...?"
"हं!!...
"सागर मेरा खुदा.. मेरी रूह रोज़ मिलती है उससे..! सो पीड़ा नस्ट होती है, जो रिश्ता पीड़ा नष्ट करे वही तो सच्चा है न..!"
"....
""बोलो भी.."
"क्या बोलू दोस्त...! मुझे लगा था तुझे मेरी जरूरत होगी पर नहींं.. शायद मुझे तेरी जरूरत है..! तेरा रिश्ता तो उससे है, राधिका जिसने दुनिया बनाई...!
तेरा खयाल रखने से मुझे पूण्य मिलेगा, रिश्ता निभाने का धर्म पूरा होगा..!"
"...ऐसा नहींं रे.."
"तुम ग्रेट हो ..."

-- वृषाली सानप काले

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