सजा (संवादात्मक कथा)

"बोल होमवर्क पूरा क्यों नही किया..?"
"सर नहीं हुवा..?"
"नही हुवा तभी तो खड़ी हो..?"
"जी..जी सर.."
"जी जी... क्या कारण बताओ..?"
"सर नही कर पाई.."
"पर क्यों..?"
"सर कैसे बताऊ..."
"अपनी ज़ुबान से..ज़ुबान है न.."
"..."
" गूंगी है क्या..?"
"सर,.... सच बताऊ...?"
"तो क्या झूठ बताएगी..मेरी अम्मा...?"
"...."
"..बता जल्दी..."
"सर..सर..मेरा बाप दारू पिता है।"
"मुझे लगा ही था, पर पढ़ई तो तुझे करनी है न.."
"जी, पर सर ...
वो घर आकर मां को रोज पिटता है। हमेशा..."
"अच्छा, तो..."
"सर ,परसो भी उसने माँ को खूब पीटा। मेरी माँ पेट से थी सर..."
"....."
"उसने मां की पेट में दो चार लात मारी थी..!"
"....."
"उसका पेट दर्द कर रहा था। मैं दवाई ले आयी थी पर नही रुका दर्द।
..मै उसके 5 घर का काम करने जाती थी महीने से...!"
"क्या...?"
"जी सर..."
"पर अब 4 दिन से 10 घर जाना पड़ता है ..!"
"तुम...?"
"हां, जी सर, कल माँ को सरकारी दवाईखाना ले गयी थी मैं। उसका दर्द नही रुक रहा था।.."
"तेरे पिता..."
"वो तो उसी दिन से कहाँ गए नही पता..."
"माँ का बच्चा पेट में ही मर गया सर..."
"...."
"अब वो दवाखाने में है। मुझे रोज रात वहीं रुकना पड़ता है। दिन भर काम, स्कूल, फिर वहाँ...!"
"फिर खाती क्या हो..?"
"सर, वड़ा पाव ..."
"..."
"अभी दो दिन रखेंगे उसे फिर छोड़ेंगे सर..., इस कारण नहीं लिखा जी निबन्ध सर..."
"..."
"लिखती भी तो क्या सर...? मेरी माँ ...देखी न आपने...?"
"..."
"फिर भी मैं लिखूंगी सर, आप दे दो सजा..."
"क्या दुं..?"
"सजा.."
"नहीं बेटा, तेरी ग़रीबी को क्या सजा दुं..? सजा तो समाज को देनी पड़ेगी..!"

- वृषाली सानप काले

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