दिनभर की चंचलता थमने लगी,
नभ ने ओढ़ी स्वर्णिम चादर।
चंदन-सी शीतल आभा बिखरी,
मंद हुआ दिन का कोलाहल।
धीरे-धीरे रंग गहराए,
केसर-सी रेखा मुस्काई।
बादलों के कोमल आँचल पर,
प्रकृति ने अनुपम छवि सजाई।
न कोई शोर, न कोई जल्दबाज़ी,
सब कुछ मौन कथा कहता है।
जो ठहरकर पल भर देखे,
वह जीवन का संगीत सुनता है।
वृक्ष बने निस्तब्ध साधक,
पवन हुई मृदु प्रार्थना-सी।
संध्या की स्वर्णिम मुस्कान में,
झलके शांति चंदन-सी।
डूबता सूरज कह जाता है—
“हर अंत में आरंभ छिपा है।”
रात्रि का अंधकार भी देखो,
नई प्रभात का स्वप्न लिए खड़ा है।
आओ, कुछ पल मौन रहें हम,
प्रकृति का यह उपहार निहारें।
स्वर्णिम संध्या के इस क्षण में,
अपने अंतर्मन को भी सँवारें।
प्रकृति का सौंदर्य आँखों को आकर्षित अवश्य करता है,
पर उसकी शांति केवल वही अनुभव करता है,
जो कुछ क्षण ठहरकर उसे हृदय से निहारता है।

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