शब्दों में संवेदना रहे,
विचारों में प्रकाश रहे।
कलम केवल लिखे नहीं,
जन-मन में विश्वास रहे।
पीड़ा को स्वर मिल जाए,
मौन हृदय की बात कहे।
अंधकार के घने क्षणों में,
सत्य की ज्योति साथ रहे।
लेखनी का ध्येय यही हो,
जागृत हर एहसास रहे।
भटके हुए पथिक के मन में,
आशा का आकाश रहे।
निंदा, द्वेष, छल की भाषा,
मेरे शब्दों का वास न हो।
मानवता की कोमल धारा,
कभी हृदय से दूर न हो।
मेरी लेखनी का उद्देश्य,
यश या केवल मान न हो।
शब्दों का सृजन भर नहीं,
विचारों का जागरण हो।
जब तक साँसें साथ चलें,
सत्य का दीपक जलता हो।
मेरे हर अक्षर में सखी,
श्रीराम का स्मरण पलता हो।
— कौशल्या वाघेला “कुंदन”

Comments
Post a Comment