कलियुग

आज इस कलियुग की दास्तान में..
अच्छाई व बुराई की धमासान लड़ाई में..
नेकी, ईमान के साथ की बदसलूकी में..
वफ़ा व बेवफ़ाई के लगते धब्बो में..
जात व धर्म के बेख़ौफ़ युद्ध की रक्तपात में..
प्यार, चाहत व नफरत की भड़कती आग में..
जलते हुवे देखा हमने
सिर्फ एक इंसान को..!!

तब सिर्फ़ एक सवाल
तमाम संवेदना के साथ,
उठा समूचे मन मस्तिष्क में..
वास्तविकता क्या है... आखिर
ये... ये सब इंसान के लिए है ..??
या ये इंसान इनके लिए...??
कहाँ है इंसान
इनसे सुखी...??
फिर क्यों भुगते ये सरदुःखी..??

किस स्वार्थ की प्यास में..
सहना ये जानलेवा,
पीठ पे बोझा, ढोते रहना दुखी कलेवा...??

इस अनकही बेदाग पीड़ा से
रोते तड़पते इंसान को
आज हमने देखा..!!


दो रोटी के
चार टुकडे कमाके
बच्चों का पेट भरना
बस यही तो है मेरा जीवन...!!

कभी कभी तो दवा नहीं,
दुआओं पर ही, बच्चों का बुखार
भी दांव लगाया है..!!

घाव नहीं भूख से
बिलखते जीवन गुजारा है।
जात कहाँ अजी धर्म नहीं,
हमारी तो भूख बला है।
रोटी कपड़ा लड़ाई है।
हमने तो जीते जी
मुर्दों-सा, जीवन जिया है !

सारे कलियुग हमने तो
इंसानों को हर पल
सड़क पर, दम तोड़ते देखा है !!

कलियुग है नहीं सुखासिन
यह तो सिर्फ दुख दर्द के अधीन..!!

आज कह ही दु खुले आम
ये कलियुग ही तो नरक है..!!
ये कलियुग ही नर्क है..!!

- वृषाली सानप काले

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