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सम्मोहन

सम्मोहन एक शक्ति है..!! एक अद्वितीय कला है, जिसकी सहायता से हम हर असम्भव कार्य को संभव कर सकते है।

   लेकिन ये सम्मोहन आखिर है क्या..?? मनुष्य तथा अन्य सृष्टि के बीच का लगाव एक सम्मोहन ही तो है। एक दूसरे से प्रेम भी सम्मोहन ही तो है। किसी भी बात की नशा भी तो एक सम्मोहन ही है।

 जब भी हमारा मन, हमारी आँखे किसी सुंदर चित्र या वस्तु को देखता है तो स्वतः अपने आप एकाग्र होता चला जाता है, तथा अनायास उस चीज के प्रति खींचते चले जाते है, यही तो है सम्मोहन..!!

    कई बार ये भी तो होता है कि हम जीवन मे कोई एक ऐसा पाते है कि केवल उसकी बात हम स्नायास सुनते जाते है। जो हमें निरन्तर सुझाव देता चला जाता है, जिसके हम प्रभाव में आ कर अपने आप उसका कहना मानते चले जाते है बिना किसी दबाव के..!! ये सम्मोहन ही है।

    सम्मोहन जीवन के लिए जिंदगी के लिए आवश्यक भी है, परन्तु ये भी आवश्यक है कि हम किस बात के प्रति सम्मोहित हो रहे है...??अगर हम ज़रा भी किसी व्यक्ति, वस्तु, पदार्थ वा वैभव, प्रणय कि तरफ़ आकर्षित हो रहे है। तो यह उनकी सम्मोहन शक्ति के कारण ही हो रहा है, बिल्कुल। तब ये सोचना एवं जानना भी जरूरी है कि इस प्राप्ति से हांसिल क्या होगा..?? ये सम्मोहन की शक्ति की प्राप्ति से अगर नीति नष्ट हो रही है तो ये सम्मोहन रोकना पड़ेगा..!!

  ये जो भी वस्तु तथा वासना एवं इच्छा के सम्मोहन से वशीभूत हो, जो हो रहा है ये सब किसी न किसी पूर्व जन्म के संस्कार के वश के प्रभाव से हो रहा है जो विकारों का सम्मोहन है।विकारों के सम्मोहन से बचने के लिए सही ज्ञान तथा बुद्धि का सही उपयोग का कौशल्य जरूरी है।

    यदि हम अपने  मन वा बुद्धि को परमात्मा की याद में एकाग्र करते है तो हमे कोई भी सम्मोहित नहीं कर सकता। अगर परमात्मा से एकाग्र नहीं कर पा रहे है तो ज़रूर कोई शक्ति हमे  खींच रही है। हमे विचलित कर रही है। जो पूर्व जन्म संस्कार भी हो सकते है। हमारे कर्म के फल भी हो सकते है। किसी की हमारे प्रति बददुवा भी हो सकती है। हमारा अल्प ज्ञान भी होगा या अज्ञान भी होगा। हमारी नफ़रत भी होंगी या हमारा मोह भी होंगा। जिसे हम आमतौर पर माया कहते है।

सम्मोहन की शक्ति किसी भी चुम्बकीय शक्ति से भी गजब की ताकत लिए हुवे होती है। रिश्तों में सम्मोहन की ताकत से क्या कुछ नहीं होता...? फिर वो सही हो या गलत हो ...!! सब सम्मोहन का ही प्रताप है। अपवित्रता की कशिश भी सम्मोहन ही तो है। अपवित्र कर्म एवं विचार तथा भाव निर्माण की वृत्ति भी तो सम्मोहन है...!!

      अकर्मण्यता, आलस्य तथा अनेकानेक सूक्ष्म विकार भी सम्मोहन ही तो है। हर नकारात्मक विचार व वृत्ति भी सम्मोहन ही है।
सौंदर्य सुंदरता भी सम्मोहन ही तो है। जिसके सम्मोहन में मनुष्य न जाने क्या क्या कर जाता है।

धन प्राप्ति की लालसा भी तो सम्मोहन ही है।धन के सम्मोहन में आकर आज का इंसान किस हद तक गिरा हुवा है। उस मोह में आकर वह क्या क्या कर रहा है।

  हर नशा, नशे की आदत, नशे का प्रभाव, आकर्षण भी तो सम्मोहन ही है। बीडी, शराब तथा जुआ आदि सब सम्मोहन के ही रुप है। सम्मोहन का गलत प्रभाव विनाश की तरफ ही ले जाता है।

मनुष्य जीवन के हर पीड़ा, दर्द, गम, वेदना, दुख की वजह भी एक सम्मोहन ही है। हर व्यक्ति किसी ना किसी सम्बन्ध की चाह व अकथनीय सम्पर्क, लगाव, उम्मीद की माँग के कारण ही तो दुखी है। ये सब सम्मोहन ही तो है। अर्थात सभी सम्मोहन के कारण दुखी है।

 हम दूसरों के सम्मोह में क्यों आये..?? तन व मन जब हमारा है। ज्ञान व कर्म जब हमारा है।भाव व स्पर्श जब हमारा है। तो हमें अपने को दूसरो के गलत सम्मोहन से छुड़ाना है। दुसरों का सम्मोहन जहां जहाँ आएगा वहां वहां दर्द, पीड़ा, त्रासदी, संघर्ष एवं विनाश निश्चित है..! अतः अपने को खुद से सम्मोहित कर के ज्ञान व नीति तथा ईश्वरीय सेवा कार्य से सम्मोहित हो आगे बढना है, तथा सबको भी आगे बढ़ाना है...!!

अगर सम्मोहन की शक्ति इतनी मजबूत है तो क्यों न हम इसका सही तरीके से उपयोग कर समाज परिवर्तन का कार्य करे...!! सम्मोहन का प्रयोग जितनी बार एवं जितनी तीव्रता से करेंगे उतनी उसकी फलश्रुति भी हमें सही अर्थ में मिलेगी। किसी एक विचार को बार बार दोहराए तो हम खुद से खुद को सम्मोहित कर सकते है..!! क्योँकि मनुष्य के ब्रेन की यह वृत्ति है कि अगर कोई भी विचार मनुष्य के मस्तिष्क में 68 सेकंड से ज्यादा देर तक स्थित हो जाये तो वह उस आत्मा का अनंत युग तक चिर संस्कार बन जाता है..!!

    यदि कभी सुबह चार बजे उठना हो तो बार बार हम सोचते है सुबह उठना है बस पकडनी है तो हम सुबह उठ जाते है। यही स्वयं सम्मोहन है। इसी तरह से हमे हर गलत संस्कार को सम्मोहन की प्रक्रिया से दूर करना सीखना है...!!

परमात्मा को याद करना उसके गुणों का सिमरन करना, उसे प्रेम करना, उसे पिता के समान रूहरिहान करना, उसकी सलाह लेना, उसे अपना प्रियतम बनाना, उसे दोस्त बनाना ये सब कर सकते है। स्व परिवर्तन कर सकते है। किसी स्वमान में स्थित होना, मनन चिंतन करना, ये सब स्वयं को सम्मोहित करना है एवं स्व परिवर्तन की प्रक्रिया है..!!

जब जब हम अपने को परमात्मा की याद में सम्मोहित कर लेते है तो हम कल्याणकारी बन जाते है। हमारी बुरी आदतें छूट जाती है। हम निराकारी के समान विदेही रूप में स्थित होते है।

हमारे सारे भय, विषाद ख़त्म हो जाते है। सारी की सारी बीमारियाँ, रोग ठीक हो जातीं है। इस जीव तथा अन्य सभी के जीव की मुक्ति और जीवन मुक्ति के मार्ग को प्राप्त होते है। अगर सम्मोहन को जानकर भी हम अपने आप को कल्याण की और लगा नहीं लेंगे तो संसार हमे अपनी और सम्मोहित कर लेगा तथा हम सबको कठपुतली की तरह नाच नचाऐगा। विनाश की पाप की गहरी खाई में ले जाएगा।

आत्मा को सदैव ज्ञान, योग और मनसा सेवा में जुड़कर पर्फेक्ट बनने का लक्ष्य बना लेंगे तो दुनिया के सारे सम्मोहन ख़त्म हो जायेगे। हमे कभी भी सम्मोहित नहीं कर सकेंगे...!!

ओम शांति😊

वृषाली सानप काले

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