रूहानी मोहब्बत

वो माँगे हमसे बस प्यार जिस्मानी
हम माँगे सदा इख़्ति हार रूहानी ।

वो सुनाये किस्से वादे पैमानी
हम दिखाए उन्हें राहे दीवानी।

हम कहते ही रहे रूह रूह को चाहे
रूह के मिलन से परम आत्मा बने।

जिस्मानी मोह से इनको बचाये
रूहानी चाहत सबकी बढाए।

वो जिस्म तक क्यों रुके ऐ खुदा
हम कैसे समझाए ये होये बूढ़ा।

वो जिस्म को ही माने के आत्मा
हम बताये के ये बस घर बालमा।

वो आलंबन वफ़ा ओर देहिक वास्ते
हम गर्दिशों में जताए रूहानी फ़रिश्ते।

वो जिस्मानी मिलन में ढूंढे तादात्म्य
हम रूहानी वफ़ा में चाहे अध्यात्म।
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- वृषाली सानप काले
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