बेहद

हर बीते नाज़ुक पल में
सदा रहे शेष कोई मन में 

हल्के से जो आये मन में 
छू ले छुपाए हमे सीने में

हक जताये दिल के घर में 
खेले, कूदे, लड़े पल पल में

न मैं न वो मालिक घर में 
दोनों भी मेहमा खुद के घर में 

न कोई स्वार्थ की आशा में
न शिकायत कोई निराशा में

नाजुक भाषा समझे पल में
बस ये दो दिल, दिल ही दिल में ...!!

यही तो इश्क के रंग में
अद्वैत बनाये पल ही पल में..!!

बेहद को बेहद की अदा में
बेहद से बेहद गन्ध दे पल में..!!

अनमोल क़ीमत भर दे मन में 
कस्तूरी सा पावन महके मन में ..!

शायद अमिट जाने मन में 
एकांग, अद्वैत प्राण हम है हम में..!!
***
- वृषाली सानप काले

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