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अतुकान्त काव्य

  हिंदी यह एक विश्व् भाषा है, तथापि हिंदी से अभ्यास तथा ज्ञान की दृष्टि से जिनका सम्बन्ध नही आता, वे हिंदी की महत्ता, गरिमा तथा वास्तव सत्य अस्तित्व को पहचान ही नही पाते।

   अधिक तर राष्ट्रभाषा के रूप में प्रमुख संपर्क भाषा हिंदी को संविधान में महत्वपूर्ण स्थान मिला, तथा अन्य 22 भाषाओं को राष्ट्रीय भाषा के रूप में गौरवान्वित किया गया। इन भाषाओं में अंतर्गत मात्रा में यह संघर्ष सदैव किसी न किसी दुखती रग के समान कहि भी एवं कभी भी जो छिड़ जाता है।

     कभी साहित्यिक संपदा, कभी भाषिक सौदर्य, कभी व्याकरणिक चोटिया, तो कभी अस्तित्व के निम्न एवं उच्च स्तर को लेकर। हर भाषा जो एक व्यक्ति के विचार दूसरे व्यक्ति तक पहुंचाती हैं, भावों की स्तरीयता को सिद्ध करती है, वह वास्तव में परिपकव एवं श्रेष्ठ भाषा हैं...!!बच्चे को जन्म देने वाली माँ की कभी योग्यता सिद्ध नहीं की जाती, वो जन्म देकर जो उपकार करती है उसको किसी भी परिमाण, स्तर, पुरस्कार तथा तुलना में बिठाकर स्थापित करने की चेष्ठा करना ही एक तुच्छ प्रयास होगा। उसी प्रकार भाषा भी ईंश्वर की मनुष्य को मिली हुई एक अनोखी अमूल्य शक्ति है, जिसके बगैर विचार तथा विचारो के साथ वाणी एवं वाणी के साथ ज्ञान भी अधुरा है।

   भाषा वाद, विवाद कि विधा हो ही नहीं सकती। माँ बंटवारे की मूल हो ही नहीं सकती वो निर्माती होती है। निर्माता विध्वंसक कैसे होगा..?? रचनाकार रचनात्मक होता है।रचनाकार रोशनी देता है, अंधेरा नही दिखाता, उसे मिटाता है, वैसे ही भाषा अंधेरे से उजाले की तरफ ले जाती है दिशा हैं को दिशा दिखाती है।

  हिंदी आमिर खुसरो, तुलसीदास, मीरा बाई, सूरदास, कबीर की धरो हर है। प्राचीन काल से लेकर भारतेन्द युग मे जनजागरण का कार्यु  द्विवेदी युग में हिंदी को सम्पन्न भाषा में स्थापन करने की समर्पित कार्य प्रणाली के हजारी प्रसाद द्विवेदी का योगदान तथा रामचंद्र शुक्ल युग मे हिंदी के पाठ्य साहित्य निर्माण में कटिबद्ध तुकान्त रचना भंडार  तक कि हिंदी भी केवल प्रचलित व्याकरणिक तुक बन्दी मार्ग से होकर तुकान्त अर्थात तुकबन्दी से जुड़े काव्य की मजबूती को ही अडिगता से थामी रही। तथापि  छायावाद के प्रणेता जयशंकर प्रसाद के दौर के साथ-साथ हिंदी की  अपनी अन्वेषणात्मक गतिविधियां किसी अन्य भाषा की तुलना में अधिक प्रखर रूप से तीव्रता के साथ बढ़ने लगी।

   छायावाद के बाद से हिंदी के साहित्यकारों की क्रियात्मकता ने प्रचलित पद्धति  को दूर कर कुछ नए तरीकों को अपनाकर काव्य, कथा, खंडकाव्य, नाटक, कथा सभी विधाओं में मनुष्य जीवन की वास्तविक जीवन वृत्ती को प्रकाशित करने की साहित्यकार की अपनी भूमिका की जिम्मेवारी को समझ लिया था।संघर्ष एवं निम्न उच्च स्तर को लेकर वैचारीक, बौद्धिक विवाद कई समय तक चलते भी रहे, परन्तु समय सभी को झुकाता भी है तथा सिखाता भी है।

    जयशंकर प्रसाद, सुमित्रानंदन पन्त, निराला, महादेवी वर्मा जी के साहित्य की नवीनता को नया आयाम तथा उच्चस्तर का पेहराव भी प्राप्त हुवा।तुकान्त काव्य के बिल्कुल अलग यह अतुकान्त काव्य साहित्य में आया। एक अनूठा साहस भी था तथा अन्वेषण भी। परन्तु तमाम संघर्षो को झेले यह काव्य विधा का स्वरूप आज भी लगातार बना रहा है। जिस काव्य विधा ने हिंदी साहित्य को एक नई पहचान एवं युग दिया.."छायावादी युग"..!!

    यह एक अनोखा अन्वेषण जो अन्य भाषाओं में इतनी अधिक मात्रा में विकसित नही हुवा है।अतुकान्त काव्य अर्थात जिसमे काव्य की मात्रा को अनिवार्यता नही होती, बन्धन नही होता। इसी के साथ साथ काव्य में सुर, लय, ताल के आधार पर रचना बनती है। तुक बन्दी का बंधन मुक्त होता है। यह काव्य पद्धति पूर्णता मुक्तछंद भी नही होती तथा पूर्णता तुकान्त भी नही होती। इसलिए छायावाद के बाद से हिंदी साहित्य जगत में यह अतुकान्त काव्य संसार अधिक रूप से विकसित होता गया भी तथा आज भी हो रहा है। ये विभिन्नता अन्य भाषा रचना में न होने के कारण अनेक भाषा ज्ञानी हिंदी की ऐसी अतुकान्त रचना को स्वीकार नही करते है। जिसके पीछे हिंदी भाषा के प्रति उनका अज्ञान होता है।

    हिंदी में नवीनता का दौर न् कभी रुका बस आगे ही बढ़ता गया। छायावाद के बाद हिंदी में मार्क्स वाद, शोषकवर्ग की नींदा एवं शोषितों की पीड़ा, त्रासदी की विभीषिका का विद्रोह, तथा गुलामी की भयानकता को अतुकान्त काव्य ने विश्व् के सामने प्रगतिवाद के अंतर्गत रखा। जनजागृति का अनुपम कार्य इस अतुकान्त काव्य ने किया।

    इसके बाद आये प्रयोगवाद ने जिसमे गजानन माधव मुक्तिबोध एवं अज्ञेय जी ने तार सप्तक जैसी विशाल काव्य पीठिका में गदय काव्य रचनाओं का आविष्कार कर साहित्य जगत में अद्वितीय कार्य किया।जो तारसप्तक आज विश्व् का एक अनुपम काव्य है।

   प्रयोगवाद में ही नई कविता का युग तथा समकालीन कविताओं के अन्वेषणात्मक रचनाओं का स्थापत्य हुवा।नव नवीन प्रयोग होते ज्ञे साहित्य में, काव्य में इसी साठोत्तरी युग मे जिस वजह से इसे प्रयोगवाद कहा गया। इसी प्रयोग वाद के युग मे विषयो को नया आयाम दिया गया। मनुष्य जीवन की शहरी जीवन विभीषिका के विषयों को काव्य में संजोने के अनुपम कृतियों के निर्माण हुवे गीत रूप में सो ये नवगीत युग से भी जाना जाने लगा।

   इसी अलग अलग आयामो से गुजरता हिदी काव्य जगत जो सदैव नवीनता की खोज में रहा। आधुनिक युग मे हो रही आधुनिकता की परिभाषा में लिखी जाने लगी रचनाओं की विशेषता को नवीन रूपायित करते करते नवकाव्य जनगीत के नाम से प्रख्यात है।

  ये अनोखा हिंदी काव्य जगत जो सदैव सत्य, नव, तथा आविष्कारिय दृष्टि को अपनाकर अतुकान्त रचना भंडार को विकसित कर रही है। जिससे काव्य से समाज में प्रेम पैदा हो। काव्य किसी विशिष्ट वर्ग की मकतेदारी न् बने। काव्य की गरिमा के साथ ही काव्य की निर्माण प्रक्रिया सदा नवीनता की आमूलाग्र अवलम्ब करती पथ प्रदर्शिका हो। नव निर्मिती की इस प्रक्रिया में सीमारेखा नही सिमोलाँघन विशेष रहे, जो तुकबन्दी नही तो अतुकान्त विधि से बस मन भाव व प्रेम से बढ़े। तुलना एवं निम्न तुच्छ के भेद से नही।

   कुछ कुछ ये तो वजह नही जिसके कारण हिंदी सबके दिलों पर राज करने में सक्षम सिद्ध हुई है...!!

    सलाम तुझे हिंदी ...!!

- वृषाली सांनप काळे

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