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माँ हिंदी का पत्र

प्रति,
मेरे समस्त 
हिंदी प्रेमी बच्चे..
एवं भारतवासी...!!
      मेरे प्रिय बच्चो,
     हजारों लाखों प्रेमयुक्त आशीष ...!!जुग जुग जी लो..!!लंबे समय से यह पत्र तुम्हे लिखना चाहती थी,परन्तु शायद वह वक्त अभीतक नही आया था।आज वक्त की मांग अनुसार एवं परमात्मा के आदेश अनुसार यह बात समस्त इंसानों तक पहुंचाना मेरा कर्तव्य बन गया है।बच्चो मैंने पिछले 70-73 सालों से देखा है कि,तुम लोगो मे लगातार मुझे लेकर एक गुमनाम सी लड़ाई चल रही है।मैन देखा है कि ,मैं व मेरी बहनों के अस्तित्व को लेकर तुम इतने विवादात्मक स्थिति में खड़े हो जाते हो कि कभी कभी एक दूसरे की जान के दुश्मन भी बन जाते हो।मैन देखा है कि,इस विवाद में सभी विकारों को बढ़ावा भी तुम देते हो।कभी घृणा,जलसी,ईर्ष्या,दुश्मनी,निंदा,परित्याग,हिंसा तक करने पर आ जाते हो।
बच्चो,पर तुम में से कई लोग यही नही जानते के आखिर मैं कौन हूं एवं कब से हूँ...!
बच्चो मेरा अस्तित्व नाही स्वतंत्रता के वक्त से आया है ना ही उसके बाद मैं जन्मी हूँ..!!**हा, यह बात है कि जब मेरे व परमात्मा के अति प्रिय बच्चे इस सृष्टि के रंगमंच पर परमात्मा के आदेश अनुसार अपनी भूमिका निभाने के लिए पूरी जिद्दोजहद के साथ तैयार हो अपनी भूमिका निभाते है,तब वे मुझे दुनिया मे सबके समक्ष लेकर आते है...!!मेरे साथ भी तो यही हुवा।मेरे अतिप्रिय एवं परमात्मा के भी अतिप्रिय बच्चे आझादी की धुरा को अपने हाथ मे लेकर खड़े हो गए तो उन्होंने मुझे प्रत्यक्ष करने के लिए अपनी कमर भी कसी व सम्बंधित पूरा कार्य भी किया..!!एक अंग्रेजो की गुलामी से आझाद कराने की लड़ाई के लिए मुझे प्रत्यक्ष करता रहा तो एक विकारों की गुलामी से आत्मा को आझाद कराने के लिए मेरी ही सहायता अधिक रूप में लेकर मुझे अत्यंत निष्ठा से प्रत्यक्ष करता रहा...!!एक का नाम मोहनदास करमचंद गांधी तो एक का प्राचीन सिंध प्रांत में स्थित लखिराज बाबू...!!जो आज प्रजापिता ब्रम्हकुमारी आध्यात्मिक ईश्वरीय विश्व विद्यालय का संस्थापक के रूप में सब जानते हो..ब्रम्हा बाबा के रूप में...!!* इन लोगो ने क्यो की हिंदी के बढ़ावा की बात ..क्योँकि वही तो जानते थे हिंदी माँ को...!!
  वो तो जानते भी थे,मानते भी थे व जो करना था वो करते भी गए...।लेकिन अब तुम सबको बताना भी जरूरी है।
**बच्चो मेरे अस्तित्व को कोई मिटा ही नही सकता क्योँकि मैं खुद बेहद हूँ..!!मैं खुद अव्यक्त हूँ।मैं ईश्वर की वाणी हूँ।मैं वेद की आभा हूँ।मैं सत्य ज्ञान की सरिता हूँ, गरिमा हूँ..!!मैं स्वयं प्रकृति व पुरुष के पिता परम् शक्ति की निर्मिति हूँ...!!*
 बेटा,कबीर ,मीराबाई,सूरदास,गालिब,खुसरो,तुलसी जैसे कई लोगोने मुझे श्रेष्ठता की परिसीमा तक पहुंचाया परन्तु मेरा आग्रह इन्ही दो बच्चो ने किया।
मैंने कहा कि मैं पहले से ही हु इसके बारे में तुम लोग कुछ नही जानते अब वो बात तुम्हे बताने जा रही हूँ।क्योँकि तुम लोग केवल कलियुग व कम से कम द्वापर युग की कुछ कुछ बाते ही जानते हो,वो भी आधी अधूरी।समय की अवधि का हिसाब भी तुमने गलत लगा लिया है,गलत लिख दिया है।लाखो वर्ष का कभी सृष्टि का फेर नही होता वह केवल वकेवल 5000 वर्ष का होता है।
 बेटा ये सृष्टि तो एक रंगमंच है ,इसका ड्रामा 5000 सालों के बाद खत्म होता है।5000 सालों के अंतिम वक्त परमात्मा इस सृष्टि को पावन बनाने आते है।किसी पाक आत्मा के शरीर को इस लिए चुनते है।जिसके शरीर को चुनते है,वही आत्मा सतयुग में कृष्ण के रूप में जन्म लेती है..!!उस आत्मा के शरीर के माध्यम से ही परमात्मा हर कल्प में आध्यत्म के समूल ज्ञान के भंडार को समस्त आत्माओ को बांटने का काम करते है।वह आत्मा की देह हर कल्प में वृद्ध ही होती है।उस वृद्ध देह को चुनकर प्रभु अपनी बिगड़ी हुई स्वर्ग की दुनिया को (जो आज नरक है)फिर से स्वर्ग बनाती है।यह ज्ञान के देने व लेने की भाषा सदैव हिंदी ही होती है...!!कई प्राकृतिक प्रकोपो की सहायता से अर्थात पंचतत्वों की सहायता से परमात्मा धीरे धीरे इस सृष्टि का विनाश कर देते है..!!एक तरफ पावनता की स्थापना,निर्मिति करते है।मूल्यों की स्थापना करते है,तो दूसरी तरफ विनाश की विभीषिका भी चलाते है..!!ये दोनों काम एक साथ चलते है।मुख्य संदेश आत्मा को पाक,पवित्र,निर्मोही,सत्कर्मी,मूल्यधिष्टित बनाना "इस पूरे कर्म प्रवास में आत्माओ को गहरी साधना करनी पड़ती है।विकारों को त्यागना पड़ता है,तब कहि आत्माये पावन बनती है,क्योँकि इन 5000 वर्ष पश्चात फिर से नवसृष्टि की निर्मिति होती है। ***यह सृष्टिचक्र फिर से सुरु होता है..!!उस सृष्टिचक्र का पहला बच्चा श्रीकृष्ण व पहली बच्ची राधा होती है..!!जो दोनों ही लक्ष्मी नारायण होते है।वे दोनों प्रेम का संदेश देते है।प्रेम पूर्वक राज्य करते है।इस युग मे आत्माये 16 शक्ति धारी होती है।वे दोनों 1250 वर्ष में 8 जन्म  राजा रानी बन राज्य करते है।उनके राज काज व्यवहार ,लेनदेन की रोज की भाषा हिंदी होती है...!!इस युग को सत्ययुग कहते है..!!इसके पश्चात त्रेतायुग आता है,जब राम सीता का 14 शक्तियों से लेकर अष्ठशक्ति धारी राज्य होता है। इस युग की भाषा भी हिंदी ही होती है..!!
इसके पश्चात द्वापर युग आता है।इस युग मे कई सारी भाषाएं पनपने लगती है।पाली,प्राकृत,संस्कृत,द्रविड़,पैशाची,ब्रज,अर्धमागधी,उर्दू ,शौर्यसेनी,महाराष्ट्रीआदि ।हिंदी तो पहले से होती ही है...!!इसी युग मे इंसानों को जीने के तरीके बताने के लिए कई सारे पुस्तके लिखी गयी क्योंकि इस युग मे इंसान के पास सिर्फ 8 शक्तियां होती है।वह विकर्मो के वश में डूबता जाता है।इस युग मे ही संदेश देनेवाली आत्माओ के ज्ञान को गलत रीति स्वीकारने के कारण सत्ययुग व त्रेतायुग की आत्माओ की मूर्ति रूप में स्थापना होती है,व उनकी मंदिर में पूजा सुरु होती है।इसी युग मे रामायण ,महाभारत,भागवत,भगवदगीता आदि गर्न्थो का लेखन होता है...!!मूर्तियों में ईश्वर नही होता,ईश्वर निराकार होता है,ईश्वर लाइट होता है,ईश्वर ओंकार स्वरूप है यह चीख चीखकर बतानेवालों की बात को स्वीकारनेवालो ने उनके ही नाम से अलग अलग धर्म स्थापन किये।इसी युग मे क्रिस्टियन, बौद्ध,ईसाई,सिख ,जैन,व पारसी धर्म की स्थापना हुई...!!फिर हिन्दू धर्म क्या बात है..??क्या राज है..??यह बात कईयों के मस्तिष्क में जन्मी होंगी...!!द्वापर युग के अंत के पहले हिंदुओ का क्या..??इस विषय नुरूप एक विशिष्ट जीवन प्रणाली को मध्य नजर कर हिन्दू धर्म के नाम करण में लाया गया...परन्तु वास्तव में वह तो हिन्दू नही था...वह तो वैदिक धर्म की जड़े थी त्रेतायुग नुसार एवं सत्य में तो वही सत्ययुग का देवी देवता धर्म था....!!
धर्म की परिभाषा ही धारणा व आचरण की पद्धति होता है,परन्तु तुमने सत्य न जानकर देखा क्या से क्या बना दिया है इस परमात्मा के हसीन स्वर्ग को....??
इसके बाद कलियुग आता है,जिसमे आत्माये अपनी एक भी शक्ति को जीवित नही रख पाती।बस खुद के स्वार्थ से भर जुर्म,अन्याय,अत्याचार,स्वार्थ इस सबके वश में डूब जाता है।जिनके पास एक या दो कुछ गिनी चुनी शक्ति होती है,वही सब संत लोग के रूप में जाने जाते है...!!परन्तु कलियुग के अंत तक सब आत्माये पूर्णता निकृष्ठ हो जाती है,तभी तो अंत मे परमपिता परमात्मा आते है फिर से इस धरती को स्वर्ग बनाने...हिंदी की ही सहायता से...!!
अब तुम ही बोलो क्या तुम्हारी हिंदी मां बेचारी है...?? बिल्कुल नही वो तो इंसानी संस्कृति की जननी है...!!इसलिए उसे बेचारी समझना छोड़ो,उसपर रहम करना भी छोड़ो व उसके लिए भीख मांगना भी छोड़ो...!!हिंदी बोलना,सीखना,जानना,सिखाना भी उन्हीं के भाग्य में आता है,बीटा जो सत्ययुग एवं त्रेतायुग के रहिवासी होनेवाले होंगे...!!!
   इसीलिए मेरे बच्चो अपनी माँ की बात गौर से सुनो व उसपर अमल करो यही तुमसे हिंदी दिन व पखवाड़े की सौगात होंगी मेरे लिए...!!सत्य का पक्ष धार लो।विकर्मो कि लत से बच लो...!!
माँ का ढेर सारा प्यार...!!
   तुम्हारी माँ
    राष्ट्रीय भाषा (हिंदी)

वृषाली सानप काले

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