कृष्ण

भारत एक महान देश के साथ साथ अद्वितीय इतिहास की संपदा से युक्त अलौकिक राष्ट्र है। सोने की चिड़िया है..!! ईश्वर का प्रिय देश है..!! अनुपम, महत्तम, श्रेष्ठतम, उच्चतम है..!!

  भारत की साहित्यिक संपदा ही भारत की सही परिचायक है..!! भारत को विश्व के सामने चिरस्थापित करने में जिसका अविभाज्य भूमिका है..!!
  
लेकिन ऐसा होते हुवे भी, बावजूद इस गरिमा के, यह भी एक कटु सत्य है कि, भारत की अत्यंत गरिमायुक्त सत्य ज्ञान को मिथक ने नष्ट कर दिया है..!!

 जी हाँ, मिथक ही वह है जो हमे सत्य से बहोत दूर तक ले गया है। हमने कभी भी मिथक की जड़े ढूंढने व जानने की कोशिश नही की, बस आंख बंद कर उसे सत्य के रूप में स्वीकार किया, बिना किसी शिकायत व आशंका को उठाये...!! क्यों..?? क्योँकि उन बातों का सम्बंध केवल लोगो की धार्मिक व भावनिक जज्बातों से होने के कारण कोई भी व्यक्ति सत्य को प्रत्यक्ष रखने व जानने की कोशिश से दूर होते ही रहे.. कभी भी नजदीक नही आये...!!
 
मिथक की सुरुवात उन दो महान व श्रेष्ठ महाकाव्यों से ही हो जाती है,जिनके ऊपर ही समूची साहित्यिक संस्कृति, सामाजिक, धार्मिक, नैतिक, पारिवारिक, राजनीतिक संस्कृति आश्रित है... या यूं कहिए कि इसीके इर्द गिर्द घूमकर फिर इसी के पास आकर रुक जाती है...!! हर भाषा हर प्रांत में हर संस्कृति के यही मूलाधार रहे है...!!
 ऐसा होने के बावजूद भी इन महाकाव्यों की सत्यता को परखने व ढूंढने की आवश्यकता किसी ने भी नही महसूस की...!!
 
इन महाकाव्यों के  प्रमुख पात्र राधा-कृष्ण, व सीता-राम...!! इन महानायकों के जन्म से लेकर कर्म तक इतना ही नही तो समय से लेकर जीवन तक व हर छोटी सी छोटी बात को नाटकीय व महानायकीय दृष्टि से अलग व अद्वितीय बनाने के प्रयास में इतना गलत रखा गया व हम सबने उसे सराहा भी...!!

 आज एक आद्ध्यत्मिक साधक होने के नाते व साधना व तत्व से आत्यंतिक रिश्ता जोड़ने के कारण तथा निराकार की साधना में एकनिष्ठ भाव से कुछ तथ्य व कुछ सत्य कृष्ण जन्मास्टमी के अवसर पर सारांश रूप में सामने रख रही हूं...!!

महाभारत यह भारत का एक श्रेष्ठ महाकाव्य है। इस महाकाव्य का प्रमुख नायक कृष्ण को बताया जाता है। इस काव्य में महाभारत का विशाल युद्ध भी मशहूर है, जिसमे कौरव व पांडव इनके लड़ाई की बात है। जिसमें कृष्ण ने अर्जुन के रथ का सारथ्य किया था। इतना ही नहीं तो, कृष्ण ने उस युद्ध के मैदान में अर्जुन को युद्ध के लिए तैयार करने के लिए एक महान काव्य का गायन किया था, जिसे भगवदगीता कहा जाता है..!! जो समस्त ज्ञान संसार की बुनियाद है..!!

कृष्ण की गहन प्रेम कथा भी जग की जुबान पर मशहूर है, वो है राधा के प्रेम की..!!परन्तु जग कहता है कि राधा व कृष्ण का विवाह नही हुवा, व राधा कृष्ण से उम्र में बेहद बड़ी भी थी। कृष्ण का जन्म बंदी गृह में हुवा था। कृष्ण को दो माताएं थी। कृष्ण ने उसके मामा कंस को मारा था। कृष्ण ने द्रौपदी के वस्त्रहरण को रोका था। कृष्ण ने जरासंध, पूतना आदि कई राक्षस गणों का वध किया था। कृष्ण ने कई बार कूट नीति का प्रयोग खुद भी किया व दुसरो को भी करना सिखाया था। कृष्ण ने बचपन में ही ढेर सारा माखन खुद भी चुराया व अपने मित्रों को भी खिलाया था। कृष्ण ने खुद का राजपाट छोड़कर हस्तिनापुर में पांडवों के साथ ही जीवन बिताया था।

दुश्शासन, दुर्योधन, द्रोणाचार्य, अश्वत्थामा, कर्ण, धृतराष्ट्र, शकुनी, सात्यकि आदियों के साथ युद्ध अथवा लड़ाई के वक्त कृष्ण के आदेश अनुसार गलत रास्तो का इस्तेमाल किया गया था। कृष्ण की 16108 पत्नियां थी। कृष्ण की कई नीतियां झूठ के आधार पर रखी हुई है, जो कलियुग में मिलती है। ...आदि बहोत बहोत बहोत बाते हमने अपने पुरखों, इतिहासकारों के द्वारा रचित साहित्य, संत, महाकाव्य व धर्म के ठेकेदारों से सुनी है। इसी के साथ साथ यह भी सुना है कि,**"श्रीकृष्ण साक्षात परमेश्वर है...!!
श्रीकृष्ण भगवान विष्णु के 8वें अवतार और हिन्दू धर्म के ईश्वर माने जाते हैं। कन्हैया, श्याम, गोपाल, केशव, द्वारकेश या द्वारकाधीश, वासुदेव आदि नामों से भी उनको जाना जाता हैं। कृष्ण निष्काम कर्मयोगी, एक आदर्श दार्शनिक, स्थितप्रज्ञ एवं दैवी संपदाओं से सुसज्ज महान पुरुष थे। उनका जन्म द्वापरयुग में हुआ था। उनको इस युग के सर्वश्रेष्ठ पुरुष युगपुरुष या युगावतार का स्थान दिया गया है। 
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सत्य...आइए अब सत्य को परखे सम्पूर्ण ज्ञान व तर्क की बुनियाद पर स्थित होकर...!!
परमेश्वर यानी वो शक्ति जो सर्वशक्तिवान होती है। जिसके आगे दुनियॉ की कोई नीति, युक्ति व शक्ति चल ही नहीं सकती।परमेश्वर यानी सम्पूर्ण सत्य, ज्ञान, सादगी, सुंदरता, प्रेम, व शक्ति की ही परिचायक होती है। परमेश्वर यानी वो अलौकिक शक्ति जो कल्पना में भी किसीको भी दुख दर्द पीड़ा यातना भय हिंसा कुटिलता व कठोरता को महसूस नहीं होने देती या यह सब उस शक्ति की परिभाषा में ही स्थित नही हो सकता। परमेश्वर यह सबसे श्रेष्ठ अति श्रेष्ठ जीवन की परिचायक होगी।परमेश्वर जो सृष्टि की, चराचर की निर्मिति करता है। जिसके आदेश से सब कुछ घटता है...!!

सही है ना...

तो कृष्ण कुटिलता निर्ममता, दर्द, पीड़ा का भी दाता बना है। सृष्टि का निर्माता यदि कृष्ण तो खुद का जन्म बन्दीगृह में क्यो...?? खुद की प्रेमिका उससे विरही क्यो...?? परमेश्वर सर्वशक्तिमान होता है तो कृष्ण की यह बेबस अवस्था क्यो ...?? **
क्योंकि कृष्ण सर्वशक्तिमान नहीं थे। कृष्ण परमपिता परमात्मा नहीं थे। कृष्ण सृष्टि रचयिता नहीं थे।

कारण....परमपिता जो होता है वह परम आत्मा होता है...सर्वश्रेष्ठ होता है...!! जो निराकार, अलौकिक होता है। जिसे कोई न जन्म दे पाता है, न कोई मार सकता है, न वह मर सकता है..न जल सकता है..!!क्योँकि वह जन्म मृत्यु से परे होता है...!!कोई भी स्त्री की गोद वा गर्भयोनि इतनी शक्तिशाली आजतक बनी ही नहीं की वो उस निराकार शक्ति को जन्म दे सके...!!
अर्थात कृष्ण की जन्म भी हुई व मृत्यु भी हुई..!! एक आत्मा के समान...!!
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फिर कृष्ण कौन...??
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-----कृष्ण... एक दिव्य आत्मा...!! एक फरिश्ता..!! खुदा का सच्चा बन्दा..!! खुदाई खिदमतगार...!! एक देवता स्वरूप आत्मा...!! परमात्मा का अति प्रिय बच्चा...!! असामान्य बच्चा...!!

परमात्माने बनाई हुई इस सृष्टि का एक चक्र 5000 वर्ष का होता है। जिसके 4 प्रमुख हिस्से होते है।सत्ययुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग, एवं कलियुग...!! ये सभी युगों का एक चक्र (5000वर्ष) जब पूरा होता है, तब उसे एक कल्प कहते है। ऐसे लाखों हजारों कल्प सृष्टि ने पूरे किए है।

 इस सृष्टि रूपी रंगमंच के उस सत्ययुग में जो अति पवित्र, पावन व सत्य आत्माये जन्म लेती है, उनमें सबसे पहली आत्मा जो होती है वो सत्ययुग का पहला राजकुमार.. श्रीकृष्ण..!! सत्ययुग की पहली राजकुमारी राधा..!! सत्ययुग में वही आत्माये जा सकती है जो अपने समस्त विकारों से मुक्त हो चुकी होती है। सत्ययुग का ही नाम स्वर्ग है..!! सत्ययुग को ही वैकुंठ, तथा शिवालय भी कहा जाता है। सत्ययुग के महाराजा व महारानी कृष्ण व राधा इन्ही का दूसरा नाम लक्ष्मी व नारायण मशहूर है। ये दोनों परमात्मा के अति प्रिय बच्चे पूरे 1250 वर्ष अर्थात 8 जन्म एकदूसरे के जीवनसाथी बन जीते है...!!
 
श्रीकृष्ण, गोविंद, हरि, मुरारी, श्रीनाथ, नारायण, वासुदेव, श्रीकृष्ण ये आठ जन्म श्रीकृष्ण के सत्ययुग में व श्रीराधा केवल 2 नामो से पूरे युग मे विचरती है.. राधा व श्री लक्ष्मी...!!

सत्ययुग में आत्माओं के पास 16 शक्तियां होती है। इसीलिए तो सोला श्रृंगार यह शब्द जन्मा पर अर्थ गलत लिया। सजावट आत्मा की होती है, पर हम लोगों ने देह की ली। तो ऐसे सत्ययुग में खान का युद्ध, कहाँ का वस्त्रहरण, कूटनीति व छल ...? सत्ययुग के बाद जैसे जैसे प्रकृति के संपर्क में आत्मा आती जाती है, वह प्रकृति के वश में जाने से अपनी सारी शक्तियां धीरे धीरे खोने लगती है। त्रेतायुग में आत्माये अपनी 14 शक्तियां लेकर आती है.. व त्रेतायुग के अंत तक केवल 8 शक्तियां बचा पाती है।त्रेतायुग के अंत तक आत्माये माया अर्थात प्रकृति के पूरे वश में जा चुकी होती है, जाहिर है बुराई के चंगुल में फंस रही होती है। पावनता, प्रेम गलत रूप में परिवर्तित होते है। इसी कारण से द्वापरयुग में नैतिकता नष्ट हो रही होती है। 8 शक्तिधारी आत्मायें लोगो को बचाने के लिए पवित्रता की रक्षा के लिए गलत धारणा छोड़ो कहते रहते है। उनके जैसे बनो, जो श्रेष्ठ आत्मायें सत्ययुग व त्रेतायुग में होकर गयी। वो श्रेष्ठ थी तो कैसी थी..?? तो कोई 16, कोई 12, कोई 10, कोई 8, कोई 4 शक्तिधारी थी।उन्हें दिखाए कैसे..?? तो उनके मूर्ती रूप चित्र रूप बनाये गए, शक्तियां दिखाने के लिए उन्हें उतने हाथ दिखाए गए। उनकी पवित्रता की ताकत एवम उन्होंने शक्तिशाली बनाने के लिए कलियुग के अंत मे बुराई के साथ कि हुई बौद्धिक व भावनिक वमांनसिक लड़ाई बताई, लिखवाई गयी...!! इसके पीछे का उद्दीस्त दूर रहा परन्तु इंसानी फितरत के अनुसार उन सत्ययुग व त्रेतायुग के लोगो की ही तबसे ईश्वर के नाम से पूजा होने लगी..!! सत्ययुग व त्रेतायुग की आत्माओ की सम्पूर्ण संख्या 33 करोड़ होती है, इसीलिए तो हम जानते है, कि हिन्दू धर्म में 33 करोड़ देवी देवता है...!! परन्तु वे सब वास्तव में दिव्य आत्मायें है। जिन लोगो को ये सब गलत लगा उन्होंने फिर निराकार ईश्वर की स्थापना की बात जोरो से उठाई, येशु ने ईश्वर को लाइट कहा, पैगम्बर ने निराकार कहा, बुद्ध ने सर्व शक्तिमान प्रकाश कहा, नानक ने आसमान का ही एक गुरु कहा... परन्तु लोगों ने उन्हें ही देव बनाया व उनकी कहि बात के नाम से अलग अलग धर्म बना दिये।
द्वापर युग मे मूर्तिपूजा, धर्मपूजा, जात पूजा सुरु हुई।

इनके कारण से झगड़े बढ़ते गए। द्वापर युग के अंत मे फिर अति संघर्ष पनपा.. उसी की बुनियाद ने कलियुग को नोच डाला। कलियुग में जो आत्माये आई वो केवल अधिक से अधिक 2 शक्तियों वाली थी। वो सभी संत आत्माये लोगो को प्रबोधन कर ताउम्र ईश्वर के प्रेम की महती सुनाती रही। व कर्म की दुहाई देती रही। इनमें कुछ निर्गुण उपासक रहे तो कुछ सगुन उपासक बने।पर लोग नही बदले।लोग कर्मकांड में फंस गए पर आत्मा के आचरण से न बदले..!! अब तो केवल मूर्ती, धर्म, जात नहीं तो भाषा, प्रांत, रंग, व स्तर, ऊंच-नीच ये सारे विवाद उठ खड़े रहे..!! प्रेम, विश्वास, नैतिकता, सत्कर्म, सत्य, पवित्रता किस कोने में चले गए कोई न जान सका। इसी युग में बलात्कार, वस्त्रहरण, हत्या, कूटनीति, हिंसा, छल, कपट सारे के सारे उमड़ पड़े... यहां कहाँ कृष्ण था..?? है..?? सत्ययुग में वस्त्रहरण कौन करेगा..?? जहां विकारों का साम्राज्य ही नहीं था।

ऐसे ही ये सम्पूर्ण एक चक्र जब चक्र पूर्ण होता है, तब इस सृष्टिरूपी रंगमंच का विनाश होता है। अर्थात कलियुग के अंत में जब एक तरफ सृष्टि का विनाश हो रहा होता है, तभी दूसरी तरफ इस सृष्टि की आत्माओं का प्यूरिफिकेशन भी सुरु रहता है। अर्थात आत्माओं को दिव्य, पवित्र, पावन, सात्विक बनाने का काम भी चलता है..!! इसीलिए इस युग को पूर्ण पुरुषोत्तम युग के नाम से भी जाना जाता है..!! एक कल्प के बाद दूसरा सुरु होना होता है.. इस स्थिति को कहते है.. संगमयुग..!! इसीलिए इस समय को संगम युग के नाम से भी जाना जाता है। यह कार्य स्वयं निराकार परमपिता परमात्मा किसी अत्यंत पवित्र आत्मा के देह (यह देह उसी कृष्ण का होता है)को उधार लेकर करते है, परन्तु उस वक्त उड़ देह का नाम कृष्ण नहीं होता। परमात्मा उसे ब्रम्हांड का ज्ञान देते है, सृष्टि के ड्रामा का ज्ञान देते है.. इसीलिए वे उस देह को **ब्रम्हा... का नाम देते है..!! यही ब्रम्हा उस पावन दुनिया की रचना करते है..!! यह जो कार्य होता है वह इतना सहज नहीं होता।

   *भगवदगीता...** बुराई व झूठ के बीच रहकर सत्य, प्रेम, व पवित्रता की स्थापना करना अति दुश्वार कार्य होता है। पल पल सच्चई, वफाई, पवित्रता अहिंसा व प्रेम, सत्य की लड़ाई चलती है झूठ, बेदर्द, मक्कारी, हिंसा, अन्याय, बुराई के साथ, इस वक्त आत्मायें अत्यंत कठिन अवस्था से गुजरती है। उन्हें ज्ञान, कर्म, भक्ति, सन्यास, व परमात्मा तथा आत्मा का सम्पूर्ण परिचय व अभ्यास करने का काम परमात्मा करते है। इस अभ्यास की पढ़ाई सिखाई जाती है, परमात्मा के द्वारा... वही तो है भगवदगीता...!! युद्ध की भूमि पर ही सिखाई  **अर्जुन... को ही.. परन्तु अर्जुन याने अर्जन करनेवाला... व तत्पश्चात उसकी धारणा करनेवाला...!! पांडवों के ही साथ रहे ईश्वर... परन्तु इसका अर्थ अलग है... **परमात्मा निराकार है, अर्थात सूक्ष्म अति सूक्ष्म से लेकर अनंत रूप तक ..!! तो सूक्ष्म का एक कण याने रेणु तो रेणु का वर्गीकरण याने बिंदु... बिंदु का विस्तार याने अंडा...!!परमात्मा रेणु तो आत्मा भी अणु..!! दोनों का सूक्ष्म रूप का विस्तार याने अंडा..!! परमात्मारूपी अंडे का अंडा याने आत्मा...!! इसीलिए आत्मा रूपी अंडा कहलाया पंडा...!! परन्तु वह पंडा तो कोई एक नही न... वो तो 9 लाख सोला हजार 108 है...!! यह कार्य स्त्री शक्ति अधिक करती है। तो वो हो गयी कृष्ण की 16108 पत्नियां..!! तथा ये सभी तो कहलाये पांडव...!! उनकी युद्ध बुराई के साथ तो बुराई याने कुकर्म, क्रूर कर्म, कुविचार, कुनीति, कुटिलता तो सब हुवे कई कुकर्मो के रेणु सो कहलाये कौरव...!! कोई भी स्त्री 100 बच्चों को जन्म तो दे ही नहीं सकती।इसीका तो चित्रण है महाभारत महा काव्य में..!

जो द्वापरयुग में नही होता बल्कि कलियुग के अंत मे होता है..!! परन्तु जिसकी लिखित स्वरूप रचना वेद व्यास ने द्वापरयुग में की थी।

सारांश यही की कृष्ण, राधा, राम, सीता, गणपति, येशु, पैगम्बर, जगदम्बा, सरस्वती, शंकर, ब्रम्हा, लक्ष्मी, नारायण आदि सब परमपिता परमात्मा के बच्चे है.. परमेश्वर नही है..!! क्योँकि परमेश्वर कभी जन्म व मृत्यु नही लेता..!! विकारयुक्त नही होता..!!

संदर्भ:--
1ब्रम्हकुमारी साहित्य संपदा भंडार,मॉन्ट आबू
2 मेरी खुद की कई स्व अनुभूतियां...!!

- वृषाली सानप काले

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