हे ईश्वर तू ज्ञान सीखा दे...

मंदिर बांटा मस्जिद बांटा
बाँट भी चुके भगवान को..
हे ईश्वर तू ज्ञान सीखा दो
इस नादान बने इंसान को...।।

आचार विचार व्यवहार
से ही ये पहचाने धर्म को..
ये बँटवाये साक्षात सभी
जीवन के भी हर कर्म को..
अरे धर्म बांटा, कर्म बांटा
बांट चूका है कर्म काण्ड को..
हे ईश्वर तू...... ।।1।।

प्रांत-प्रांत के विभेद से तो
इसने बँटवाई जमीन भी...
बाँट चुके सारा अमन भी
दुनिया भी बनी सारी अंधी..
अरे जमीन बाँटी, अम्बर भी
बाँटा, बाँट चुके इंसान को..
हे ईश्वर तू... ।।2।

पूजा से पहचाने प्रथा को,
सब बंटवाए भूले ये इंसान..
तन का कपडा, पोशाख ये
आज बनी इनकी पहचान..
अरे पूजा बाँटी, प्रथा बाँटी
अरे बाँट चुके पोशाख को...
हे ईश्वर तू.. ।।3।।

बस जाँत, भाषा, धर्म, प्रांत
के बिच पीसे सारे साहित्य..
विधा के बँटवारे से जन्मे
प्रांतीयता का हर आदित्य..
अरे विधा बांटी, कथा बाँटी
बाँट चुके है हर भाषा को..
हे ईश्वर तू.. ।।4।

पूजन से ही जन्मे कारण
यहाँ सबने है तन भी बांटा..
भक्ति का साधन है जो मन
पर अंधेपन में मन भी बांटा...
अरे तन भी बांटा, मन भी
बांटा, बाँट चुके है ईमान को..
हे ईश्वर तू ज्ञान सीखा दो
इस नादान इंसान को...।।

वृषाली सानप काळे

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