बाजी

लम्हा-लम्हा भी बीत चूका
तनहा तनहा सी लिख चूका...

अतित फिर न आ सका
इतिहास को दफना सका..

क्यों सपनो का रंग फीका
क्यों अपनों का संग बिता...

कथनी का सब खेल रुका
करनी का अब मेल जीता..

आ जीवन का रूप दिखा
ला प्रेम का प्रारूप सीखा...!!

जग को कदमों पे झुका
अब ना हो कोई भूखा...!!

नया ये इतिहास लिखा
लकीरों को तक़दीर सीखा....!!

- वृषाली सानप काळे

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