तेरी कहानी

शाखों के पत्ते कहते है
मुझसे तेरी कहानी...
दूर चली आती हूँ
उनसे मैं...
मुझे आज भी
तुझसे पुरानी
शिकायत है...

गिरनेे लगते है पत्ते
फिर शाखों से...
हवा के झोंको से
इर्द गिर्द घूमते घूमते
टकराते है...
पैरोंसे...

विरान हो जाती
है, वो डालियाँ
मगर वो पत्ते
मेरा रुख करते है..
कहते है डलियों से
रुको...उसे..
मनाकर आते है...

मेरा गुस्सा
बन बैठता है
मेरा ग़ुरूर...
पत्तों से छलकता है
तेरी चाहत का नूर...

रुक  जाती हूँ मैं
इक पेड़ की छायातले
टप टप करती बारिश की
बूँदो को, हाथों में
समेटने के लिए
लेकिन...
फिर इक पत्ता
आता है हथेली पर
तेरा जिक्र करने के लिए...

याद आते है वो लफ्ज ,
जो तूने कहे थे
इकरार-ए-मोहब्बत में
रखा है...
वो बेशकीमती तोहफा ...
सहेजकर...
इक सुखा पत्ता
ले रहा है साँसे..
बंद किताब में...

©स्नेहा कोळगे

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