घर अपने जा तू आत्मा

इस तन ने तुमको क्या दिया
अब घर अपने जा तू आत्मा..!!

कभी धागा टुटा रे रिश्ता टुटा
हर परिक्षा में रे तेरा सब्र लूटा
अब कर भी दे तू इसका खात्मा।
अब घर अपने जा तू आत्मा।।

तन के कर्म में ये मन था सर्द
क्या झाड़ता तू रे उसकी गर्द
अब न बन तू उसका रे बालमा ।
अब घर अपने जा तू आत्मा।।

सिद्धान्त तथा व्यवहार के बिच
आदर्श में था आचार भी सच
पर होता ही गया तेरा खात्मा।।
अब घर अपने जा तू आत्मा।।

तेरी सादगी से तो ये तन बचे
तेरी बंदगी से ही ये मन बचे
पर तनमन न गाये तेरा चालीसा
अब घर अपने जा तू आत्मा।।
- वृषाली सानप काळे

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