मिलन

पढ़ना जरा गौर से वेदना के वेद को
रखना जरा तौर से कामना के वेद को।।

मचल जाए भी आतंक खेलने को
फिर भी बहा देना बवंडर के लेद को।।

न करो प्रेम जिश्म भरे लाश को
जरा सा तो समझो मन के भेद को।।

जमाने है गुजरे पूजने विवेक को
खरा खरा ही रखो आत्मिक अभेद को।।

सुनो उस मिलन से मिलो मन मेल को
नहीं आस कोई अब शरीर संवेद को।।
🌲🌲🌲
- वृषाली सानप काळे

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