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कलियुग

आज इस कलियुग की दास्तान में.. अच्छाई व बुराई की धमासान लड़ाई में.. नेकी, ईमान के साथ की बदसलूकी में.. वफ़ा व बेवफ़ाई के लगते धब्बो में.. जात व धर्म के बेख़ौफ़ युद्ध की रक्तपात में.. प्यार, चाहत व नफरत की भड़कती आग में.. जलते हुवे देखा हमने सिर्फ एक इंसान को..!! तब सिर्फ़ एक सवाल तमाम संवेदना के साथ, उठा समूचे मन मस्तिष्क में.. वास्तविकता क्या है... आखिर ये... ये सब इंसान के लिए है ..?? या ये इंसान इनके लिए...?? कहाँ है इंसान इनसे सुखी...?? फिर क्यों भुगते ये सरदुःखी..?? किस स्वार्थ की प्यास में.. सहना ये जानलेवा, पीठ पे बोझा, ढोते रहना दुखी कलेवा...?? इस अनकही बेदाग पीड़ा से रोते तड़पते इंसान को आज हमने देखा..!! दो रोटी के चार टुकडे कमाके बच्चों का पेट भरना बस यही तो है मेरा जीवन...!! कभी कभी तो दवा नहीं, दुआओं पर ही, बच्चों का बुखार भी दांव लगाया है..!! घाव नहीं भूख से बिलखते जीवन गुजारा है। जात कहाँ अजी धर्म नहीं, हमारी तो भूख बला है। रोटी कपड़ा लड़ाई है। हमने तो जीते जी मुर्दों-सा, जीवन जिया है ! सारे कलियुग हमने तो इंसानों को हर पल सड़क पर, दम...

अतुकान्त काव्य

  हिंदी यह एक विश्व् भाषा है, तथापि हिंदी से अभ्यास तथा ज्ञान की दृष्टि से जिनका सम्बन्ध नही आता, वे हिंदी की महत्ता, गरिमा तथा वास्तव सत्य अस्तित्व को पहचान ही नही पाते।    अधिक तर राष्ट्रभाषा के रूप में प्रमुख संपर्क भाषा हिंदी को संविधान में महत्वपूर्ण स्थान मिला, तथा अन्य 22 भाषाओं को राष्ट्रीय भाषा के रूप में गौरवान्वित किया गया। इन भाषाओं में अंतर्गत मात्रा में यह संघर्ष सदैव किसी न किसी दुखती रग के समान कहि भी एवं कभी भी जो छिड़ जाता है।      कभी साहित्यिक संपदा, कभी भाषिक सौदर्य, कभी व्याकरणिक चोटिया, तो कभी अस्तित्व के निम्न एवं उच्च स्तर को लेकर। हर भाषा जो एक व्यक्ति के विचार दूसरे व्यक्ति तक पहुंचाती हैं, भावों की स्तरीयता को सिद्ध करती है, वह वास्तव में परिपकव एवं श्रेष्ठ भाषा हैं...!!बच्चे को जन्म देने वाली माँ की कभी योग्यता सिद्ध नहीं की जाती, वो जन्म देकर जो उपकार करती है उसको किसी भी परिमाण, स्तर, पुरस्कार तथा तुलना में बिठाकर स्थापित करने की चेष्ठा करना ही एक तुच्छ प्रयास होगा। उसी प्रकार भाषा भी ईंश्वर की मनुष्य को मिली हुई एक अ...

माझे...

जीवन भर आपण है माझे ते माझे करीत सर्व वस्तु गोला करीत बसतो परंतु जलताना ते सर्व तर एथेच सोडतो मग त्या कमावतो तरी का..?? त्याचा मोह तरी का..?? जर कफ़न पण आपले स्वताचे नसते...!! या भौतिक जगतात सर्व वस्तु मिलवित आणि त्या वस्तु साठीची विवादात्मक जीवन पद्धति अखेर काय देते..?? काहीच नाही...!! केवळ मानसिक व भावनिक संघर्ष...!!    अखेर मात्र माझे ऐसे कोणीच नसते आणि सोबत ही काहीच नसते..! आयुष्याच्या खड़तर प्रवासात खूप गोष्टी सदैव घडत असतात. काही शिकवून जातात तर काही विचारशील बनवितात. आत्मचिंतन आणि दर्शन यांची भेट घालूनदेतात. सूर्योदयापासून सुर्यास्तापर्यंत या जीवन प्रवाहित ऐसे अनेक जण भेटतात..,  जे जग आणि जीवन यांची परिभाषा उलगडवून सांगतात फक्त अनुभूतिच्या जीवावर...!! सगळेच जीवन भराचे सगे सोबती नाही बनत, काही अल्प तर काही दीर्घ हिशोब घेवून येतात, काही विनाकरण त्रास दायक ठरतात तर काही विनाकरण प्रेम दायक ही सिद्ध होतात, काही दिव्यतेच्या गाभार्यात स्थान प्राप्त करतात तर काही नैतिकतेच्या रासातळाला ही जावून बस्तात.. खूप जण आपल्या अगदी सहज जवळ येतात आणि अगदी सहज दुरावता...

हम भी धीरे धीरे

चाहने लगे उनको हम भी धीरे धीरे हाँ हो चुके उनके तो हम भी धीरे धीरे। नकारा भी जाए ना ये आशियाना दिल का..।। खो गए बाहो में उनके हम भी धीरे धीरे। फ़साना आशक़ी का न बनाना था हमको..।। बाजी इश्क़ की ही  हारे हम भी धीरे धीरे ।। नुरे मोहोब्बत कभी बनना था हमको..।। टूटे संजीदगी के द्वारे हम भी धीरे धीरे।। सबका होकर ही रहना था हमको..।। हाय कम्बख्त मेरा भी हुवा धीरे धीरे।। - वृषाली सानप काळे

नारी शक्ति

सभी प्यारी प्यारी सहेलियों को मेरा प्रेम युक्त नमस्ते...!! आज महिलादिन के शुभ अवसर पर ढेर सारी बधाईया...!! नारी शक्ति को सलाम🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹 नारी शक्ति *********************  तेरे हाथों जिंदगी की कहानी बनेगी नारी है नारी तू ही एक रवानी बनेगी...!! सांसे से ही लहरे रोक लो दुर्बलों के ही सहारे बन लो डूबती कश्तियाँ तू ही संवारेगी तेरे हाथों... तेरी शक्ति को दे परस्तिश तेरी मुक्ति पे नाही बंदिश खुद के संग जग की जंजीरे चुनवायेगी तेरे हाथो... तू ईश्वरीय शक्ति का है प्रतिरूप चन्दन सा जी कर बनी है धूप पवित्रता की अग्नि से आत्मा को परखेगी...!! तेरे हाथों.... - वृषाली सानप काले

हिंदी कविता

साजन क्यों तरसाये जिंदगी हमे क्या बतलाये साथिया तुम्हे... क्यों भर आये अश्क़ ये सुने क्यों हुवे तेज ये धड़कने.. ये खाती मर्यादा हमेशा हमे उलझन में ही डुबाये हमे.. जैसे भँवर में फँसी कश्ती उजाड़े ही भावना की बस्ती.. साँसे संग हर आह तुम्हारी दिखाऊ है कर्जदार तुम्हारी... चाहत इबादत इनायत भी संस्कारो की है इजाज़त भी... खुदा के साथ तुम्हारी भी ऋणी है सारी जिंदगी भी.. जग को हो अमान्य फिर भी तू मेरी इज्ज़त है मोहोब्बत भी...!! हक वफ़ा की चाहत तेरी पूजे हर आदत हम तेरी.. रिश्ते कर्मो से बंधे हमारे हम बंधे जज्बातों से तुम्हारे...!! बड़े कच्चे जग के सारे धागे हम न तेरी मोहोब्बत से भागे..!! निभाना अपनी वफ़ा के वादे पाकिज है साजन मेरे इरादे...!! 🙏 वृषाली सानप काळे

पहेली

एक अजीब पहेली हुं मैं जितना सुलझावोगे उतनी उलझुंगि मैं जितना भी खोलोगे। वो पहेली ही रहनी होगी वरना दुनिया टूटेगी पहेली गर ये सुलझेगी तो रिस्तो को बिखेरेगी। कुछ कड़वे सच खोलेगी तो गुलिस्तो को तोड़ेगी जब महकेंगे फूल सारे तो कांटे भी मुरझायेगी। 🤔 - वृषाली सानप काळे