विश्वास जब टूटता है
विश्वास जब टूटता है
विश्वास किसी भी रिश्ते की नींव होता है। यह केवल किसी के शब्दों पर भरोसा कर लेने का नाम नहीं, बल्कि उसके आचरण, नीयत और व्यवहार में सच्चाई की अपेक्षा भी है। जब कोई व्यक्ति हमारे विश्वास को अपना स्वार्थ सिद्ध करने का साधन बना लेता है, तब केवल एक वचन नहीं टूटता, बल्कि उस रिश्ते की विश्वसनीयता भी डगमगा जाती है।
दो मित्र और विश्वास की कसौटी
दो घनिष्ठ मित्र थे। एक दिन उनमें से एक मित्र को आर्थिक आवश्यकता पड़ी। उसने दूसरे मित्र से कुछ धन उधार लिया और शीघ्र लौटाने का वचन दिया। मित्र ने उसकी परिस्थिति समझकर बिना किसी संकोच के सहायता कर दी।
समय बीतता गया। उधार लेने वाले मित्र की आर्थिक स्थिति सुधर गई, लेकिन उसने धन लौटाने की बात टालनी शुरू कर दी। जब दूसरे मित्र ने विनम्रता से अपना धन माँगा, तो वह कभी परिस्थितियों का बहाना बनाने लगा, तो कभी मित्रता का हवाला देकर उसे चुप कराने लगा।
जिस मित्र ने विश्वास करके सहायता की थी, उसे धन से अधिक अपने विश्वास के टूटने का दुःख हुआ। उसे समझ आ गया कि सामने वाले ने उसकी मित्रता को अपनी सुविधा के अनुसार इस्तेमाल किया था।
विश्वास का दुरुपयोग और उसका परिणाम
कभी-कभी व्यक्ति अपना उद्देश्य पूरा करने के लिए वचन देता है, विश्वास दिलाता है और परिस्थिति बदलते ही अपने शब्दों से पीछे हट जाता है। वह उस समय यह नहीं सोचता कि उसके व्यवहार से सामने वाले के मन पर क्या प्रभाव पड़ेगा। उसे लगता है कि उसका काम बन गया, इसलिए वह सफल हो गया।
लेकिन क्या किसी का विश्वास तोड़कर अपना स्वार्थ सिद्ध कर लेना वास्तव में सफलता है?
यदि ऐसे व्यवहार का कोई प्रतिरोध न हो, कोई सीमा निर्धारित न की जाए और व्यक्ति को उसके अनुचित आचरण का परिणाम ही न समझ आए, तो संभव है कि वह बार-बार ऐसा करता रहे। इसलिए विश्वास करने वाले का यह भी दायित्व है कि वह अपनी उदारता को किसी की स्वार्थपूर्ति का साधन न बनने दे।
विश्वास टूटने पर प्रतिशोध लेना आवश्यक नहीं, लेकिन चुपचाप सब सहते रहना भी उचित नहीं। अपनी बात स्पष्ट रखना, अनुचित व्यवहार का विरोध करना और भविष्य में विश्वास देने से पहले व्यक्ति के आचरण को परखना आवश्यक है।
शब्दों से अधिक महत्त्व आचरण का
हर व्यक्ति कभी न कभी परिस्थितियों के कारण अपना वचन पूरा करने में असमर्थ हो सकता है। ऐसी स्थिति में ईमानदारी से अपनी विवशता बताना और अपनी जिम्मेदारी स्वीकार करना भी विश्वास की रक्षा करना है। लेकिन जानबूझकर किसी को भ्रम में रखकर अपना उद्देश्य पूरा करना विश्वासघात है।
हर व्यक्ति अपनी गलती स्वीकार करे, यह आवश्यक नहीं; लेकिन उसके व्यवहार के परिणाम अवश्य सामने आते हैं। धीरे-धीरे उसकी बातों का प्रभाव कम होने लगता है और लोग उसके वचनों से अधिक उसके कर्मों को महत्त्व देने लगते हैं।
उपसंहार
विश्वास एक अमूल्य पूँजी है। इसे अर्जित करने में समय लगता है, लेकिन खोने में एक क्षण भी पर्याप्त हो सकता है।
किसी के विश्वास को तोड़कर अपना स्वार्थ सिद्ध कर लेना बुद्धिमानी नहीं, बल्कि अपनी विश्वसनीयता को दाँव पर लगाना है। सच्ची सफलता दूसरों को अपनी बातों में बाँध लेने में नहीं, बल्कि अपने आचरण से उनके विश्वास के योग्य बने रहने में है।
क्योंकि विश्वास माँगने से नहीं, निभाने से मिलता है।

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