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कालिदास – नागार्जुन

कालिदास! सच-सच बतलाना
इन्दुमती के मृत्युशोक से
अज रोया या तुम रोये थे?कालिदास! सच-सच बतलाना!
शिवजी की तीसरी आँख से
निकली हुई महाज्वाला में
घृत-मिश्रित सूखी समिधा-सम
कामदेव जब भस्म हो गया
रति का क्रंदन सुन आँसू से
तुमने ही तो दृग धोये थे
कालिदास! सच-सच बतलाना
रति रोयी या तुम रोये थे?वर्षा ऋतु की स्निग्ध भूमिका
प्रथम दिवस आषाढ़ मास का
देख गगन में श्याम घन-घटा
विधुर यक्ष का मन जब उचटा
खड़े-खड़े तब हाथ जोड़कर
चित्रकूट से सुभग शिखर पर
उस बेचारे ने भेजा था
जिनके ही द्वारा संदेशा
उन पुष्करावर्त मेघों का
साथी बनकर उड़ने वाले
कालिदास! सच-सच बतलाना
पर पीड़ा से पूर-पूर हो
थक-थककर औचूर-चूर हो
अमल-धवल गिरि के शिखरों पर
प्रियवर! तुम कब तक सोये थे?रोया यक्ष कि तुम रोये थे!
कालिदास! सच-सच बतलाना!

      नागार्जुन की यह कविता छोटी होते हुए भी शिल्प की द्रष्टि से महत्वपूर्ण है. इसमें कविने कविता की रचना प्रक्रिया पर प्रकाश डाला है. इस में नागार्जुन बताते है कि कवि अपनी रचनाओ में दुःख, व्यथा, पीड़ा आदि का चित्रण करते है. परन्तु उसके लिए उसे स्वयं वेदना और पीड़ा से गुजरना पड़ता है. कवि एक प्रकार से परकाय प्रवेश करता है. जब कोई विरहिणी नारी विलाप करती है, दूसरे शब्दों में कहे तो कवि उसके मनोभावो को धारण करता है. किसी ने ठीक ही कहा है कि – “वीर ही होगा पहेला कवि आह! से उपजा होगा काल उमडकर आँखों से चुपचाप, वही होगी कविता अंजान.”
“मित मेरे गीत आँसूं से बना है,
मित प्यार आँसूं से बना है.”
      यहां नागार्जुन जी संस्कृत के महाकवि कालिदास के माध्यम से कविता की रचना प्रक्रिया की बात करते है कि कवि जब अपने काव्य में किसी की विरह व्यथा का चित्रण करता है तो उस समय वह स्वयं इसी स्थिति से गुजरता है.
      प्रस्तुत कविता में नागार्जुन जी ने कालिदास के तीन कवयो का सन्दर्भ देते हुए यह बात समजाई है. ये तीन काव्य है, 1. रघुवंश, 2. कुमार संभव, 3. मेघदुत. कविता की शिल्पगत विशेषता यह है कि तीन कवयो के लिए कविने तीन छोटे-छोटे परिच्छेद लिखे है और यह परिच्छेद क्रमशः बड़े होते गये है. प्रथम परिच्छेद चार पंक्तियों का है, दूसरा परिच्छेद आठ पंक्तियों का है, और तीसरा परिच्छेद सतरह पंक्तियों का है.
      प्रथम परिच्छेद में कवि कहते है कि, हे कालिदास सच सच बतलाना कि जब रानी इन्दुमती का निधन हुआ था, तब उसके मृत्यु शोक से विह्वल होकर रघुकुल के राजा विलाप करते है. या यह विलाप राजा अज का है या तुम्हारा है. वहां अज नहीं रोया था, कालिदास तुम खुद रोये थे. तुम स्वयं रोये थे. (यह परिच्छेद ‘रघुवंश’ का है.)
      दूसरे परिच्छेद में कविने ‘कुमार संभव’ का लिया है. असुर का वध करने के लिए शिवजी के पुत्र की जरुरत थी और सटी के मृत्यु बाद शिवजी ने तो वैराग्य धारण कर लिया था. अतः शिव में पार्वती के प्रति काम भावना जाग्रत करने का कार्य कामदेव को सोंपा जाता है. शिवजी कि तपस्या भंग होती है वे पार्वती के प्रति अनुरक्त हो जाते है, परन्तु शिवजी समझ जाते है कि यह कार्य कामदेव का है. अतः उनकी तीसरी आँख से महा ज्वाला फूटती है और उसमे जिस प्रकार सुखी समिधा भड़ भड़ जल उठती है और कामदेव जलकर भष्म हो जाते है. तब कामदेव के विरह में कामदेव की पत्नी रति फुट-फुट कर रोती है. करुण क्रंदन करती है, रति का यह विलाप लोगों का लक्ष्य हिला देता है. हे कालिदास सच सच बतलाना तब क्या रति के साथ तुमने आँखों को नहीं भीगोया था.
      तीसरा परिच्छेद ‘मेघदुत’ का है. ‘मेघदुत’ कालिदास का एक विरह काव्य है. इस परिच्छेद में एक यक्ष अपनी प्रियतमा को बहुत चाहता था. प्रियतमा के प्रेम में वह इतना डूब जाता है कि अपने स्वामी धन के देवता कुबेर की सेवा में चूक हो जाती है. तब कुबेर यक्ष को एक वर्ष पृथ्वी पर रहने का अभिशाप देते है. यक्ष पृथ्वी पर आता है, परन्तु जब वर्षाॠतु का प्रारम्भ होता है तब वह अपने मन पर काबू नहीं रख पता है. अषाढ़ महीने के पहले दिन जब एक काला बादल उसे दिखाई पड़ता है, तब उसका ह्रदय विरह से व्याकुल हो जाता है. अपने दोनों हाथों को जोड़कर चित्रकूट पर्वत से वह मेघ अर्थात बादल को अपना दूत बनाने के लिए कहता है -- हे, मित्र तुम मेरा सन्देश मेरी प्रियतमा तक पहोंचा दो, उन पुष्करावर्त मेघों द्वारा यक्ष अपनी प्रियतमा को सन्देश भेजते है. उस समय यक्ष अपनी प्रियतमा के विरह में आठ आठ आँसूं रोता था. हे, कालिदास तुम सच बतलाना उस यक्ष की पीड़ा में पूर-पूर होकर थक-थक कर और चूर चूर हो कर उन अमल धवल गिरिशिखरों पर तुम नहीं रोये थे. हे कालिदास यह आँसूं यक्ष के नहीं तुम्हारे थे.
      इस प्रकार प्रस्तुत कविता में कवि यह बताना चाहता है कि कोई भी कवि जब तक दूसरे के भावो को अपने में धारण नहीं कर लेता तब तक वह किसी दूसरे की व्यथा और पीड़ा का काव्य नहीं लिख सकता.
गीतकार साहिर लुध्यानवी कि पंक्ति –
“जो तार से निकली है वो धुन सबने सुनी है
जो साज पे गुजरी है वो किस दिल को पता है 

**
- कौशल्या वाघेला

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