ठहरा हुआ समय

 


समय की सबसे बड़ी तासीर ही यही है कि वह कभी रुकता नहीं। नदियाँ बहती रहती हैं, दिन ढलता है, रात होती है और घड़ी की सूइयाँ बिना थके अपनी गति से टिक-टिक करती रहती हैं। लेकिन क्या समय वाकई हमेशा चलता रहता है?

बाहरी दुनिया में भले ही कैलेंडर के पन्ने बदलते रहें, पर जब परिवार का कोई प्रिय सदस्य हमेशा के लिए अलविदा कह जाता है, तो भीतर का समय अचानक स्तब्ध होकर ठहर जाता है। उस बिछोह का प्रभाव घर के हर कोने पर पड़ता है, पर हर सदस्य के मन की स्थिति अलग होती है—और जिसका लगाव व प्रेम जितना गहरा होता है, उसके भीतर का ठहराव भी उतना ही गहरा और नीरव होता है।

एक ही छत के नीचे दुख की अलग-अलग परतें दिखाई देती हैं। परिवार का कोई सदस्य खुद को व्यावहारिक बातों और व्यवस्थाओं के नियोजन में झोंक देता है—"अब आगे क्या करना है और घर कैसे संभालना है?" असल में उसने दर्द छुपाया नहीं है, बल्कि उसके पास रोने या अपने हिस्से का दुख व्यक्त करने का अवसर और समय ही नहीं होता। वहीं दूसरी ओर, जिससे उस जाने वाले इंसान का आत्मीय लगाव सबसे गहरा था, वह बिल्कुल चुप हो जाता है।

संतान के चले जाने पर माता-पिता के सामने जीवन का अर्थ ही समाप्त सा लगता है; तो दूसरी ओर, माता-पिता के अचानक चले जाने पर संतान के कंधों पर अचानक से ज़िम्मेदारियों का पहाड़ आ टूटता है, जो उसे रातों-रात बड़ा और गंभीर बना देता है। जब पति या पत्नी में से कोई एक हमेशा के लिए साथ छोड़ जाता है, तो पीछे छूटे जीवनसाथी का जीवन एक कठिन परीक्षा और तपस्या बन जाता है; तो पिता या भाई-बहन के जाने से सुरक्षा और स्नेह का वह मजबूत आंचल छिन जाता है जो अब तक हर तूफ़ान से बचाता था।

शुरुआत के कुछ दिनों तक घर में नाते-संबंधियों, रिश्तेदारों और आस-पड़ोस के लोगों का ताँता लगा रहता है। सांत्वना देने वालों की भीड़ होती है, हिम्मत बंधाई जाती है और सामाजिक रीति-रिवाजों का दौर चलता है। लोग जाते-जाते तरह-तरह की व्यावहारिक बातें कह जाते हैं:

“अब जो होना था वो हो गया...”

“परिवार के लिए खुद को संभालो...”

“समय सब घाव भर देता है, आगे बढ़ना ही पड़ता है...”

ये खोखली सांत्वनाएँ उस मन को छू ही नहीं पातीं जहाँ घाव गहरा होता है। असली शून्यता और भीतर का सन्नाटा तो तभी शुरू होता है जब सब चले जाते हैं और इंसान उस खाली कमरे में उस प्रिय व्यक्ति की अनुपस्थिति के साथ बिल्कुल अकेला रह जाता है।

इसके बाद जीवन में प्रवेश करता है वह गहरा 'श्मशान वैराग्य'। अक्सर लोग श्मशान वैराग्य को केवल कुछ घंटों का छलावा मान लेते हैं—कि श्मशान घाट से लौटते ही इंसान वापस दुनियादारी में रम जाता है। लेकिन गहरे प्रेम और लगाव से उपजा यह वैराग्य ऐसा नहीं होता; यह कुछ हफ़्तों या महीनों तक व्यक्ति के प्राणों में गहराई से छाया रहता है। इन महीनों में जिन चीज़ों, पद, पैसे और दुनियावी आपाधापी के पीछे इंसान भाग रहा था, वे सब अचानक निरर्थक लगने लगती हैं। वह व्यक्ति बाहर से रोज़मर्रा के सारे काम करता है, दफ़्तर जाता है, लेकिन मन ही मन वह महीनों तक उसी एक बिंदु पर अटका रहता है। उसके भीतर एक ही मौन प्रश्न गूँजता है कि जब सब यहीं छूट जाना है, तो इस आपाधापी का क्या अर्थ?

फिर समय बीतने के साथ, इंसान धीरे-धीरे इस गहरे वैराग्य के प्रभाव से बाहर आने लगता है और पुनः अपने सामान्य सांसारिक जीवन की पटरी पर लौटता है। लेकिन कंधों पर आ गिरी नई ज़िम्मेदारियों का बोझ और इस ठहरे हुए समय का दौर उसे भीतर से पूरी तरह बदल देता है। अब वह केवल सामान्य जीवन नहीं जी रहा होता, बल्कि समय ने उसे एक बेहद परिपक्व और ज़िम्मेदार इंसान बना दिया होता है। वह समझ जाता है कि जाने वाले भले ही सशरीर दूर चले गए हों, पर उनका दिया प्रेम, उनके संस्कार और उनकी यादें जीवन के इस सफर में हमेशा एक अदृश्य पतवार बनकर साथ चलती रहेंगी

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