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स्नेह वही है

सुप्त से मन को, अडिग प्रीत से,       अविरत भर दे, वही पल सही है।      जलते भाव को, आस्था से छू ले,        फिर बहला दे, साथ वही है।      पथरीली डगर पे, हाथ थाम ले      भवर से पार ले, आप्त वही है।      आंख न  बही, कुछ बात न कही,      पर जो जान ले, सख्य वही है।     जान भी न गयी, पर निकल रही     मिलन को तड़पे, स्नेह वही है। ❤️❤️❤️ - वृषाली सानप काले

ए ज़िंदगी बता

ऐ जिंदगी बता तू बदल गयी कैसे ऐ जिंदगी बता तू सवर गयी कैसे...?? जमी भी न थी तूने आसमा बनाया इम्तहानों की डगर तर गयी कैसे...?? कफ़न दफन दुश्मनी की बस्ती में जीना था बागबानी सा गुलशन नजर कर गयी कैसे..?? गुनहगारों के आंचल में बेदाग हँसना था नापाक जहाँ में पाक मुक्कदर कर गयी कैसे...?? तेरे मुक्कदर का बता वो कौन मसिहा  जो तेरे तस्सवुर का जहर हर गयी कैसे...?? 🌹🌹🌹 - वृषाली सानप काले

स्पस्टीकरण

रिश्तो में गाँठ पड़ने से कई बार नाराजगी पैदा होती है। फिर कोशिशें शुरू होती है। अंदाजा लगाया जाता है। क्यों..? कैसे..? कब..? काहे..? किस लिए..? क्या वजह..? आदि कई बातें आ जाती है। फिर सफाई दी जाती है। कभी विवाद छिड़कता है। कभी स्पस्टीकरण भी जगह लेता है। स्पस्टीकरण... क्यों देना पड़ता है..? भरोसा कम पड़ता है इसलिए..?? लेकिन वो तो रिश्ता है ना..?? रिश्ते में अनबन क्यों..? सफाई क्यों..?? हम कभी ईश्वर को सफाई देते है क्या..? उसके साथ तो सबसे बड़ा रिश्ता होता है। क्योँकि उसे अपने बच्चो पर एवं हमे उस पर उसकी शक्ति व ताकत्वपर पूर्ण भरोसा होता है। जहां भरोसा होता है वहां सफाई की जरूरत नही होती। जहां भरोसा होता है वहां शिकायत पैदा ही नही होती। जहां भरोसा होता है वहां बिन कहे कई सारी बाते अपने आप ज्ञात हो जाती है। क्योँकि वो रिश्ता दिल से जुड़ा हुवा होता है। व्यक्ति को व्यक्ति जैसा है वैसा ही स्वीकारा जाता है। उसके गुण एवं अवगुणों के साथ। व्यक्ति के स्वीकार के बाद, उसके अस्तित्व के स्वीकार के बाद जब उसे प्रेम दिया जाता है, तब शिकायत काहे की..!! अनबन काहे की..!! अविश्वास काहे का..!! ये ...

ईद मुबारक हो (रूहानी सेवा)

ईद मुबारक हो सभी को...!! ईद के दिन मेरी ईदी ..!! कबूल हो...!! रूहानी सेवा **********************    परमपिता परमात्मा एक निराकार शक्ति है।उसी निराकार ज्योतिर्मय स्वरूप का एक निराकार बिंदु स्वरूप अंश याने "आत्मा" ....!!     आत्मा भी उन सभी गुणों से युक्त होती है, जिन गुण रूपी शक्तियों से हम निराकार ईंश्वर की उपासना करते है। तथापि जब आत्मा पंचतत्त्व रूपो से युक्त देह के सम्बंध में आती है, तब देह अर्थात पंचतत्त्व की प्रभावात्मकता से भटक जाती है अपनी वास्तविक पहचान से...!!     आत्मा की अपनी कई शक्तियां होती है।आत्मा की विचार करने की शक्ति याने मन ..., उसकी निर्णय करने की शक्ति याने बुद्धी .., उसकी देह के द्वारा कार्य करने की योग्यता याने कर्म ..., तथा कर्म करने की पद्धति एवं गुणात्मकता के द्वारा होता कर्म का दृढ़ीकरण याने आत्मा के संस्कार ...!! एक देह छोड़े दूसरे देह को धारण करने के पश्चात भी आत्मा की ये मन, बुद्धी एवं संस्कार सदैव उसके साथ रहते है, जिससे ही उसको कर्म भोग एवं प्रारब्ध को भुगतना पड़ता है।    आत्मा का स्थान मनुष्य ...

निरंकारी

कितना गहरा है हर एक रंग...!! शब्द का भी तथा उसके रंग का भी...!! वैसे तो मनुष्य के जीवन का हर पहलू ही गहरा है, परंतु उसकी गहराई को समझने की योग्यता तथा ज्ञान बढाने की मनुष्य कभी भी कोशिश नही करता।     कई सारे शब्द, भाव अदा मनुष्य इतनी सहजता से कर तथा कर जाता है, कि जीवन के अंतिम पड़ाव तक आकर भी उनके अर्थ कभी नही समझ पाता तभी तो उसके जीवन की सार्थकता उसे आसानी से प्राप्त नही हो पाती।   कुछ ऐसे ही शब्द जो सागर तथा आकाश की गहराई से भी परे है, कुछ उन्हें जानने की कोशिश करे...!!    ऐसा ही एक सहज सुलभ परिचित होते हुवे भी अर्थ की दृष्टि से अपरिचित शब्द…. निरंकारी...!! या फिर नीर हंकारी...!!       निरंकारी अर्थात क्या...?? हम सदा से सुनते है कि, निराकारी, निर्विकारी निरंकारी बनो। पर  इसका मतलब वास्तव में कितने लोग समझते हैं ..? इसका मतलब यह है कि, एक निर्विकार स्वरूप अर्थात एक ऐसा रूप जिसका आकार नही हो...!! अर्थात एक अनाहत स्वर जो न नष्ट होता हो, न टकराता हो, न कटता हो... जो चिरन्तन एवं शाश्वत हो... अर्थात ओंकार...!! जो निराकारी और नि...

लकीरे

बड़े संभालकर रखा था कभी से हाथ की लकीरों को जोरो की जो वर्षा आई देखो वो फिसल गई। सदा सारी बस लड़ती थी सो बाते भी बढ़ गई देखो वो फिसल गई। बस कम ज्यादा देखती थी अनायास दीवार बढ़ गई देखो वो फिसल गई। संजाल रचाती ही गयी जिद पर खुद अड़ गई देखो वो फिसल गई जग से भी उलझ गई तकदीर से भी लड़ गई देखो वो फिसल गई। ********** - वृषाली सानप काले

उसका जीना मुझे अच्छा लगा

नए विश्वास से वो घर से निकली थी सुने वीरान पथ से चल रही थी रास्ता बड़ा कठिन था सगा सम्बन्धी कोई न था पर फिर भी उसको चलना था... हर मोड़ पर भूखे भेड़िए थे उन सबसे उसको लड़ना था आंखों का अंगार निगलना था अडिग बन वो तो चलती रही...चलती रही... उसका चलना मुझे अच्छा लगा...!! गहरा जुनून सच्चा लगा..!! कोई भा जाए ऐसा तो उसका सौंदर्य न था पहली नजर का तो संदर्भ न था सारी भावनाये गर्भजल में सोई थी शायद वो पत्थर बन गयी थी पत्थर सा दिल पर वफ़ा का आँचल था सहयोग का ही पाक मिसाल था न जाने वो क्या क्या सहती थी फिर भी न शिकवा किये वो सहती रही..सहती रही उसका सहते जाना मुझे अच्छा लगा...!! तूफानों ने बवंडर लाये थे सागर के लाव्हा भी छाए थे चक्रव्यूह में वो फंस गई थी चालसाजो में वो घिर गई थी मसीहा न था, किनारा न था उस वक्त तो कोई सहारा न था उन सबसे वो तो लड़ती ही रही, लड़ती ही रही.. उसका लढना मुझे अच्छा लगा...!! जिंदा न रहे वो मर ही जाये आंख से हमारी हट ही जाए कितनो ने ये इरादे भी लाये काले जादू के जहर भी पिलाये उसके सब अपने अपने न रहे उसके सब सप...