उसका जीना मुझे अच्छा लगा

नए विश्वास से वो घर से निकली थी
सुने वीरान पथ से चल रही थी
रास्ता बड़ा कठिन था
सगा सम्बन्धी कोई न था
पर फिर भी उसको चलना था...
हर मोड़ पर भूखे भेड़िए थे
उन सबसे उसको लड़ना था
आंखों का अंगार निगलना था
अडिग बन वो तो चलती रही...चलती रही...
उसका चलना मुझे अच्छा लगा...!!
गहरा जुनून सच्चा लगा..!!

कोई भा जाए ऐसा तो उसका सौंदर्य न था
पहली नजर का तो संदर्भ न था
सारी भावनाये गर्भजल में सोई थी
शायद वो पत्थर बन गयी थी
पत्थर सा दिल पर वफ़ा का आँचल था
सहयोग का ही पाक मिसाल था
न जाने वो क्या क्या सहती थी
फिर भी न शिकवा किये वो सहती रही..सहती रही
उसका सहते जाना मुझे अच्छा लगा...!!

तूफानों ने बवंडर लाये थे
सागर के लाव्हा भी छाए थे
चक्रव्यूह में वो फंस गई थी
चालसाजो में वो घिर गई थी
मसीहा न था, किनारा न था
उस वक्त तो कोई सहारा न था
उन सबसे वो तो लड़ती ही रही, लड़ती ही रही..
उसका लढना मुझे अच्छा लगा...!!

जिंदा न रहे वो मर ही जाये
आंख से हमारी हट ही जाए
कितनो ने ये इरादे भी लाये
काले जादू के जहर भी पिलाये
उसके सब अपने अपने न रहे
उसके सब सपने सपने न रहे
फिर भी उम्मीद में वो जीती रही..जीती रही..
उसका जीना मुझे अच्छा लगा..!!

सारी युद्ध उसकी हिम्मत देखी
हर जंग में उसकी नियत देखी
नैतिक राहों में ही कगार ढूंढी
उसने बांध ही ली अपनी गढ़ी
जग हो गया उल्टा सुल्टा
पर सिद्धांतो को ही जिलाती रही...जिलाती रही...
उसका वी जिलाना मुझे अच्छा लगा..!!

वो नारी थी पर फिर भी न थी
सज-धज श्रृंगार करती न थी
यौवन से किसीको लुभाती न थी
मौका, सहूलियत भी चाहती न थी
अपने बलबूते वो चलती थी
वो सिद्धांत, मूल्य की मूरत थी
वो झुकती न थी, झुकाती न थी
नफरत न थी, चाहत न थी
दुनिया से अलग वो जीती थी
बस अस्तित्व का मूल्य चाहती थी..!!
वजूद का मूल्य धारती रही, धारती रही...
उसका मूल्य धारणा मुझे अच्छा लगा...!!
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- वृषाली सानप काले

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