लकीरे

बड़े संभालकर रखा था
कभी से हाथ की लकीरों को
जोरो की जो वर्षा आई
देखो वो फिसल गई।

सदा सारी बस लड़ती थी
सो बाते भी बढ़ गई
देखो वो फिसल गई।

बस कम ज्यादा देखती थी
अनायास दीवार बढ़ गई
देखो वो फिसल गई।

संजाल रचाती ही गयी
जिद पर खुद अड़ गई
देखो वो फिसल गई

जग से भी उलझ गई
तकदीर से भी लड़ गई
देखो वो फिसल गई।
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- वृषाली सानप काले

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