निरंकारी

कितना गहरा है हर एक रंग...!! शब्द का भी तथा उसके रंग का भी...!! वैसे तो मनुष्य के जीवन का हर पहलू ही गहरा है, परंतु उसकी गहराई को समझने की योग्यता तथा ज्ञान बढाने की मनुष्य कभी भी कोशिश नही करता।

    कई सारे शब्द, भाव अदा मनुष्य इतनी सहजता से कर तथा कर जाता है, कि जीवन के अंतिम पड़ाव तक आकर भी उनके अर्थ कभी नही समझ पाता तभी तो उसके जीवन की सार्थकता उसे आसानी से प्राप्त नही हो पाती।

  कुछ ऐसे ही शब्द जो सागर तथा आकाश की गहराई से भी परे है, कुछ उन्हें जानने की कोशिश करे...!!

   ऐसा ही एक सहज सुलभ परिचित होते हुवे भी अर्थ की दृष्टि से अपरिचित शब्द…. निरंकारी...!! या फिर नीर हंकारी...!!

      निरंकारी अर्थात क्या...?? हम सदा से सुनते है कि, निराकारी, निर्विकारी निरंकारी बनो। पर  इसका मतलब वास्तव में कितने लोग समझते हैं ..? इसका मतलब यह है कि, एक निर्विकार स्वरूप अर्थात एक ऐसा रूप जिसका आकार नही हो...!! अर्थात एक अनाहत स्वर जो न नष्ट होता हो, न टकराता हो, न कटता हो... जो चिरन्तन एवं शाश्वत हो... अर्थात ओंकार...!! जो निराकारी और निर्विकारी का कंबाइंड रूप  है, जिसकी प्राप्ति की अनुभूति अतींद्रियों से परे है। जिसका स्नेह इंद्रियों से हटकर मिलन कराता है। तभी तो उसे हम अतींद्रिय शब्द कहते हैं। तथा उससे ही हम अतींद्रिय सुख की अनुभूति भी करते हैं ..!! उसी अनुभूति से यह सुंदर सा शब्द प्रकट हुवा है। निराकारी का मतलब है, जो किसी भी निश्चित आकार में न हो, जिसकी कोई आकृति नहीं, जिसे व्यावहारिक जगत की दृष्टि से देखना, जानना असंभव हो, जो दृश्य रूप से फ़ोटो, रंग, चित्र में नहीं आता  है, जिसकी मर्यादित रूप में कोई भी  सीमा नहीं है ..!! जो मर्यादा, सीमा, चौखट, बन्धन से मुक्त, सुप्त, लुप्त एवं शास्वत तथा केवल अनुभूत सत्य है..!!

   जिस  बाहर की दुनिया को हम आंखो द्वारा, कान के द्वारा महसूस करते है, वैसे ही इस अनुभूति के अलौक के द्वारा देखते और सुनते हैं, यही तो वो वास्तविक ज्ञान का तीसरा नेत्र है ...!! यह वही ज्ञान का तीसरा नेत्र है जिसको जानने समझने की प्रक्रिया भक्ति के कर्मकांड से शुरू होती है। 

हमारे अंदर अंतरात्मा में ओंकार की ये ध्वनि सुनाई देती है जैसे बाहर  वैसे ही अंदर भी एक सूक्ष्म लोक है, जहां ये ओम की ध्वनि सुने बगैर, बोल बगैर या कंठ के द्वारा पैदा किये बगैर या किसी को बताये बगैर ही ये अंदर की यात्रा होती जाती है। अनिवार्य रूप से अविरत चलती रहती है, जो केवल, केवल अनुभूत होती है, यही तो वो अतीन्द्रिय अनुभूति है...!! 

    जिसकी अनुभूति प्राप्ति, सुख तृप्ति व्यक्त कर पाना भी एक अतिन्द्रीयता है...!! निरंकारी बनो का मतलब भी तो यही है कि, उस अंदर के लोग की यात्रा करो उसअनुभूति  को समझो, जिसकी कोई सीमा नहीं है, जो बेहद है...!!अमर्याद, अतीन्द्रिय है, जिसमे अलौकिक सुख की प्राप्ति है...!! असीम मिलन की अनुभूति है..!! उससे इतना अतींद्रिय सुख मिलता है जिसे कोई भी  सुख को हम शब्दों में पिरो नहीं सकते बता नहीं सकते यही वो निरंकारी अवस्था है... जो अहम, वहम, स्व हम के समस्त भावो से परे होती है ...!! जो दो शब्दों के मेल से बनी है...!  निरंकारी का मतलब है निराकारी निर्विकारी सेही निरंकारी बना है, जब हम खुद हर भाव जगत से पूर्णता निस्वार्थी, विदेही, आत्मिक भाव युक्त  निर्विकारी होते हैं तब ही उसको महसूस कर सकते हैं... अर्थात अतींद्रिय यात्रा कर सकते हैं ...!!

  तभी हमें सुख, शांति, समाधान प्राप्त होते है, जिन्हें सदियो से युगों से इंसान इस बाहरी दुनिया मे खोजने की कोशिश करता भी रहा पर, अंत तक प्राप्त न कर सका...!! सब कुछ तो अपने ही अंदर है बाहर कुछ भी नहीं है ...!!अब आंख खोल ले जीवन सुधार ले मनुष्य...!!देह का न कर कोई भी अहम अब छोड़ दे तो सारे वहम..!!

 बन निरंकारी, निर्विकारी, विदेही भाव से जी ले जरा...!! जन्म सार्थक होगा फिर ये खरा...!!
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- वृषाली सानप काले

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