"कैसी हो राधिका..?" "ठीक हुँँ..?" "खुश हो..?" "शायद खुश भी..?" "शायद नहींं, यकीन से बोलो...?" "आज इतने दिनों बाद हम मिले है, क्या झगड़ने के लिए..?" "अरे झगड़ा नहींं पर ..दोस्त हुंं न तुम्हारा...?" "वो तो हो ही,रहोगे भी.." "उस दिन 2 महीने पहले तुम्हारी फोन पर सुनी आवाज, तुम्हारे साथ तुम्हारे पति ने किया बर्ताव..मारपीट,..वो रोती कलपती आवाज .. कैसे भूल सकता हुंं मैं..?? राधिका...?" "..." "पंख लगाकर आजाऊ ऐसी मेरी अवस्था थी..पर दुख ये था कि उस वक्त मैं तुम्हारे लिए कुछ भी नहींं कर सकता था...केवल तुमने डाली कसम की वजह से..." "तो क्या करे सागर..घर की बात चौराहे पे तो नहींं लायी जाती...?" "हाँँ, बिल्कुल सही मैं तो बाहरवाला हुंं न..?" "अगर ऐसा होता तो ये बात सबसे पहले तुमसे नहींं कहती दोस्त..." "अरे मेरा ये मतलब नहींं था, गलत न समझो.." "तुम तो मेरा सहारा हो, जो बात अपने पति, भाई, बहन, माँँ-बाप से भी नहींं कह सकती वो लाखो बाते ...