कैसे कहूँ

भावनाओ के खेल में
हर बाज़ी हमने है हारी
कश म कश के खेल में
कैसे कहुँ  के हुं तुम्हारी...

रिश्ता जो मांगे उम्मीदें
क्या होंगे पूरे वो वादे
चाहत जो चाहे इरादे
क्या वो मिलेंगे काँधे..
कैसे हो पूरी जिम्मेदारी...?
कैसे कहूँ के हुं तुम्हारी

पाक पाकिज तो है ही
क्या दिलाएगा वो माही
साद सादगी का राही
क्या दिलाएगा जिंदगी..
जिंदगी है तुमपे ही वारी
कैसे कहूँ की हुं तुम्हारी..

व्यवहार संसार निसार
कैसे होंगे मिलनसार...
कैसे जुड़ेगा इनका तार
कौन वादा निभावु यार..?
हुं मैं तो मर्यादि देहधारी..
कैसे कहूँ की हुं तुम्हारी

- वृषाली सानप काले

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