लकीरे खुद लिखूंगी

दूसरे क्यों दे दे प्रमाणपत्र मुझे की मैं कौन हुं..??जब मैं बखूबी से जानू कि मैं कौन हुं...??
दुसरोने...हां दुसरोने ..दी हुई ये समस्त सीमा रेखायें.. क्यों इनमें बंदिस्त रहूं ..??
क्यों न मेरे ही पंखो की उड़ान का अनिवार आशिया मैं खुद बना दू..??
मैं जानू.. जीवन का राज, साज, ताज बज-बजकर बना पखवाज..!!
अतीत तथा भविष्य क्यों थामू..? क्यों न इच्छित भविष्य निर्माण की इच्छाशक्ति से वर्तमान को सवारु....??
काबिलियत के भरोसे ही जी लू क्यों किसीके सहारे ले लू..?? बादशाह नहीं पर क्यों भिखारी सा जी लू...??
है यकीन बुरी नहीं बन सकती। बनूंगी भी तो नहीं... पर परिणामों से भागूंगी नही.., सदैव लढुंगी..!! हां यदि.. सहने की शक्ति है तो लढने की भी है..!!
है स्वीकार भी.., पट तथा जित दोनों भी न होंगे मेरे कभी भी..!! पर पल निकलने के बाद अब पछतावा नहीं करुँगी...!!
हाथों की लकीरे अगर किस्मत है तो अपनी लकीरें मैं खुद लिखूंगी...!! लकीरे मैं खुद लिखूंगी..!!

- वृषाली सानप काळे

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