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बाँसुरी

क्या करूँ के बनू मैं बांसुरी तुमरी
प्रियतम प्यारी बनूँ अनूठी तुमरी..

पायल बनकर अब हूँ थक गयी
घायल बनकर अब हुं पीस गयी
जन्म जन्म से हुं मैं तेरी कजरी..।

दर्दे दिल का बस तू सच्चा साकी
सर्द जग का क्या हिसाब बाकी
काहे ना सुने तू फिरयाद हमरी...!

रोम रोम बस तोहे ही तो गाये
सोहं सोहं बस मोहे तो भाये
अद्वैत रिश्ते में क्यों आये बदरी..!

प्यास मिलन की कर दो पूरी
कब बतला दूर होगी ये दूरी
बनना मुझे अब तेरी मुरली...!!
प्रियतम प्यारी बनुं अनूठी तुमरी।।

मीरा नहीं, ना हु मैं राधा तेरी
अधूरी हुं, तुझ बिन अँधेरी
भक्ति की भर दो मेरी गगरी..!
प्रियतम प्यारी बनुं अनूठी तुमरी।

- वृषाली सानप काले

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