नमस्ते मैं एक छोटी सी बच्ची हुं। आखिर मेरा क्या होगा लक्ष्य ..?? सब यही सोचते होंगे...??
लेकिन ऐसा नहीं छोटी उम्र में ही तो जीवन के धेय्य निश्चित होते है। उन्हें सही तरीके से सवारना तथा तराशना जरूरी होता है।
मैं भी सोचने लगी कि सचमुच अगर मैं कुछ बनूँगी जीवन मे तो क्या बनूँगी...?? कुछ निश्चित करूँगी तो क्या करूँगी...??
मैन मेरी आँखों के सामने ऐसे कई लोग देखे है, जो जीवन में कुछ भी बनने के बारे में कभी कोई भी निश्चित दिशा नही लेते, बस चलते चले जाते है। चलना है इसलिए। तो क्या मुझे ऐसा बनना है..??
मैन ऐसे भी लोग देखे है जीवन में जो जीवन को इसलिए जीना चाहते है, क्योँकि कोई उनपर आश्रित है। जो जीवन में उस पथ को अपनाना ही धेय्य मानते है, जिसके द्वारा, जिस पर चलने से उन्हें पैसो की प्राप्ति हो सके...!! तो क्या मुझे भी ऐसा बनना है...??
मैंने ऐसे भी लोग देखे है, जो पहले से सोचते है कि किस मार्ग पर इज्जत, पैसा तथा ताकत मिलती है, वही मेरी मंजिल होगी। फिर उस इज्जत, ताकत एवं पैसे का इश्तेमाल वे किसी भी तरीके के कामो के लिए करते है। क्या मैं ये चाहती हु..??
मैंने ऐसे भी लोग देखे है, जो डॉकटर, वकील, इंजीनियर, अध्यापक आदि कई बड़े पद से है।बेहद पैसा भी कमाते है, परन्तु जिनमें से कई जैसे समाज में है वैसे वास्तव में नहीं है। जो अपने परिवार के लोग, समाज के दुर्बल, दुखी, पीड़ित, व्यथित, वेदना से ग्रस्त लोगों के साथ प्रेम युक्त, संवेदना युक्त व्यवहार नहीं करते।
अगर ऐसा है तो वो बड़ा पद, पैसा, इज्ज़त किस काम की...?? क्या मुझे ऐसा चाहिए....??
नहीं, नहीं मुझे ऐसा नहीं बनना है, जो कुछ भी बनाने से मेरे अपने लोगों से मुझे दूर होना पड़े। मुझे खुद ही नैतिकता की पहचान न मिले।मुझे पैसो की ताकत के आगे सब झूठे लगे, ऐसा नहीं बनना है।
नहीं बनना, प्रभु नहीं बनना।
मुझे कुछ भी नहीं, कुछ नहीं बनना बस एक अच्छा इंसान बनना है।
गोपाल दास सक्सेना के अनुसार...
स्वर्ग लोक में देव बहोत है।
पृथ्वी पर दानव रहते है,
भूल गया जग बहोत समय से,
कौन किसे मानव कहते है।
इसीलिए मैं देव न दानव,
मानव की पहचान बनूँगा।
मैं, मैं तो इंसान बनूँगा...!!
मुझे सिर्फ सही काम करना है। ऐसा काम जिससे मेरा, मेरे परिवार का अच्छी रीति से नाम लिया जाए। खानदान का नाम हो। मुझे ऐसा काम करना है, जिससे मेरे ऊपर की समस्त जिम्मेदारियां मैं पूरी कर सकू, बस कोई भूखा न रहे। मुझे ऐसा काम करना है जिससे मैं आईने से नज़र मिलाते समय शर्मिंदा न रहू। मेरे हाथ न काँपे। जिसे मुझे किसीसे छुपाना न पड़े।
मुझे मेरी पहचान किसीको देनी न पड़े। लोग मेरे अच्छे कर्म, व्यवहार से मुझे जाने। मेरे परिवार को मुझसे स्नेह तथा गर्व हो।
मैं नही चाहूंगी कि मेरे किसी भी कर्म से मेरे अपनो का सिर समाज के सामने झुक जाए।ऐसा कुछ बनूँगी की ईश्वर भी मेरे काम से खुश हो जाये।
मेरी तकदीर का फैसला करने से पहले वो मेरी मर्जी मेरे मन की इच्छा जाने।
मिर्जा गालिब ने भी तो कहा है,
खुद ही को कर बुलन्द इतना
की हर तहरीर से पहले,
खुदा बन्दे से पूछे,
बोल तेरी रज़ा क्या है....!!
इसलिए अंत में मैं यही कहना चाहूंगी कि,
मन चंगा तो कठौता में गंगा। दुसरो की नज़रों में गिरना दूर की बात है दोस्तों, पहले खुद की नज़र में न गिरे इसके बारे में सोचो। अच्छा पद, अच्छी इज्ज़त से ज्यादा अच्छा इंसान का स्तर प्राप्त करु यही मेरे जीवन का लक्ष्य हैं...!!
🤗
- वृषाली सानप काले
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