न जाने क्यों आज रो रही हुं मैं
क्या तुम्हें फिर से खो रही हुं मैं...!!
बार बार उसी संघर्ष की तह में
हर हार की सहर्ष की गह में
क्यों फिर से आजमा रही हुं मैं...
क्या तुम्हें फिर से खो रही हुं मैं...!!
क्या चाहना है जिंदगी से न जानु मैं
क्या मांगती हुं जिंदगी से न जानु मैं
क्यो कश म कश में ढो रही हुं मैं...!!
क्या तुम्हें फिर से खो रही हुं मैं...
विरक्त विभक्त सी जी ही रही हुं मैं
पर तुम्हारे बिना न जी पा रही हुं मैं
क्या हर बार खुद को ही आजमा रही हुं मैं
क्या तुम्हें फिर से खो रही हुं मैं...!!
🌲
- वृषाली सानप काले
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