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क्या है आध्यात्म..?(भाग२) "आत्मा"

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    आत्मा
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   आत्मा व प्रकृति इन्ही से ये जगत है।इस जगत का अनोखा स्वरूप आत्मा से ही जीवित है।आत्मा वास्तव में है क्या..??
ये जो जीवन जी रहा शरीर है,ये जो शरीर जिसकी अन्न,वस्त्र,निवारा ,हवा पानी ,सुख,शांति,पैसा ये जरूरते पूरी करने के लिए मनुष्य सारा जीवन व्यतीत कर रहा है,उस शरीर का।   एक मालिक--अर्थात आत्मा..!!
  आत्मा एक चेतन शक्ति है।जो समस्त जगत में सर्व श्रेष्ठ है।आत्मा की अपनी कुछ शक्तियां है।वह जब शरीर रूपी वस्त्र में प्रवेश करता है तब उन शक्तियों को लेकर आता है,तथा जब इस वस्त्र का त्याग करता है ,तब उन समस्त शक्तियों को लेकर भी जाता है।
    मन ,बुद्धि,व संस्कार ये तीन आत्मा की प्रमुख शक्तियां है।ये शक्तियां आत्मा के साथ आती है ,तथा साथ ही जाती है।मन व बुद्धि की अनुभूतियां एवम ज्ञान से आत्मा पर संस्कार होते है।इन संस्कारों के प्रभाव में ही आत्मा हर कर्म करता है।ये कर्म संस्कार हर जन्म में आत्मा के संग संग चलते है।हर जन्म के क्रम संस्कारो के फल भी आत्मा लेती एवं देती है।
    आत्मा स्वयं सर्व गुण सम्पन्न होती है,परन्तु अपनी इस योग्यता से परे वह विस्मृति में जाती है।
   मनुष्य जीवन सम्पूर्ण केवल आत्मा की अच्छाई तथा बुराई का ही तो खेल है।मनुष्य के व्यवहार व कर्म के परिणाम ही तो जीवन है।ये कर्तव्य कर्म मनुष्य अपने गत जन्म के तमाम संस्कारो के परिणाम स्वरूप में करता है,तथा इस जन्म के ज्ञान व अनुभूति के संग्रह पर करता है।
    आत्मा अजेय,अमर तथा अविनाशी है।आत्मा न मर सकती है न मिट सकती है।उसे न कोई काट सकता है न कोई जला सकता है।उसकी योग्यता ईश्वर के पुत्र समान स्वयं को सिद्ध करने में है।
   आत्मा के कई स्वरूप उसके कर्म व संस्कार अनुरूप बनते है। दिव्य आत्मा, देव आत्मा, पुण्य आत्मा, महान आत्मा, श्रेष्ठ आत्मा, पापी आत्मा, क्रूर आत्मा, विकृत आत्मा, विकारी आत्मा आदि कई प्रकारों में उसका विभाजन होता है।उसी के अनुरूप वह वर्तन व व्यवहार करके अपना प्रारलब्ध बनाती है।
  उसके इन तमाम प्रकारों में ज्ञान व साधना से परिवर्तन करना ये भी आत्मा के ही हाथों में होता है।
   आत्मा यह एक अति सूक्ष्म शक्ति रूप में होती है।वह अनंत शक्ति युक्त होकर भी सूक्ष्म रूप में ही स्थित होती है।बिंदी रूप से भी वह सूक्ष्म होती है।वह निराकार होती है।अपने समस्त जन्मो के हिसाब से वह ज्ञात होती है,केवल विस्मृति के कारण वह भटक जाती है।इसी कारण केक अपरिचित लोग उसे परिचित अनुभूत होते है,क्योँकि वह पिछले जन्मों के अच्छे कर्मो के  रिश्ते होते है।अर्थात आत्मा के सम्बंध में आनेवाली कोई भी आत्मा बेकार में नही आती ।किसी न किसी जन्म के  अच्छे तथा बुरे कर्म का वह हिसाब नही तो प्रतिफल होता है।
   कहाँ जन्म लेना ,किस घर मे स्थित होना,किस माता-पिता को चुनना ,तथा कब मरना.. ये सभी निर्णय लेने की योग्यता भी आत्मा की ही होती है।आत्मा की कर्म शक्ति जितनी मजबूत तथा संस्कार जितने दृढ़ व स्वतः स्वस्थ होते है,वैसे ही आत्मा अपने जन्म व मृत्यु के फैसले कर पाती है।
   अजर,अमर अविनाशी आत्मा मनुष्य की दोनों भृकुटी के बीच मे सदैव स्थित होती है।वही उसका घर होता है।
   आत्मा आते वक्त बोलने की शक्ति,देखने की शक्ति,सुनने की शक्ति,धड़कनो की शक्ति,बुद्धि की शक्ति,स्वसन की शक्ति,संवेदना की शक्ति,आदि खुद के साथ लेकर आती है तथा जाते वक्त खुद ही सब कुछ लेकर जाती है।
   शरीर तो सिर्फ उसका साधन है।घर है।ताकत नही।इसीलिए जब किसी के भी मस्तक में आघात  होता है तो आत्मा का ये घर टूट जाता है ,वह तुरंत वह घर छोड़ देती है।
  जन्म व मृत्यु दोनों भी वक्त वह(आत्मा)आंखों,मुँह, व नाक के माध्यम से आती है तथा इन्ही के माध्यम से जाती भी है।
   किसी भी स्त्री के गर्भ की 3 महीनों तक निर्मिति होती है।इन तीन महीनों के पश्चात साढ़े तीन महीने का समय अर्थात आधे महीने तक कभी भी किसी तरीके से एवं जगह से उस स्त्री के गर्भ में आत्मा का प्रवेश हो जाता है।
  आत्मा उन माता व पिता को चुनती है सो वो उनको जानती है ।किसी न किसी हिसाब से ही वह उस घर मे प्रवेश करती है।अगर उस घर के लोगो द्वारा उस आत्मा के साथ सही बर्ताव,व्यवहार नही किया गया।वार्तालाप भी आत्मा सुनती ,समझती है सो ऐसी स्थिति में वह आत्मा उस घर मे नही रहती ।मतलब की उस देह को छोड़ देती है।जिसे हम मरण कहते है।


- वृषाली सानप काले

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