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क्या है अध्यात्म?? राजयोग ..."मैं "?? (भाग - 8)

आज समस्त सृष्टि में यही जीवन धारणा चिरन्तन हो चुकी है कि शरीर ही जीवन है, शरीर ही पहचान है, शरीर ही चेतन सत्ता है, शरीर ही सब कुछ है...!! परन्तु वास्तव में शरीर केवल साधन है, सृष्टि के जीवन की अनुभूति का। शरीर एक ऐसा साधन है, जिसके माध्यम से चेतन सत्ता कार्य करती है। जिसे हम "मैं" के रूप में जानते है।

   यह मैं हर दृष्टि से परे है। जिसे कोई भी देख नहींं सकता। जिसे किसी भी तरीके से दृश्य प्रमाण में नहींं लाया जाता।

  जैसे - सुख, आनंद, शांति, प्रेम, ईश्वर ये अनुभूति की शक्तियां है, किसी भी प्रमाण एवं दृश्यता की नहींं, उसी तरह से यह "मैं" भी उस चेतन सत्ता का नाम व रूप है, जो दृश्य नही लेकिन अलौकिक एवं शाश्वत सत्य है, जिसे "आत्मा" कहते है...!!

वास्तव में यह ‘मैं’ शब्द शरीर से भिन्न चेतन सत्ता ‘आत्मा’ है। मनुष्य अर्थात देह रूपी (जीवात्मा) आत्मा और शरीर को मिलाकर बनता है। शरीर पाँच तत्वों से (जल, वायु, अग्नि, आकाश, और पृथ्वी) से बना हुआ होता है। आत्मा मन, बुद्धि और संस्कारमय तथा युक्त होती है। आत्मा में ही विचार करने और निर्णय करने की शक्ति होती है तथा वह जैसा कर्म करती है उसी के अनुसार उसके संस्कार बनते है। 

जब स्त्री व पुरुष इनके जिस्मानी सम्बन्धो होते है। उसके कुछ अनुकूल समय के उपरांत स्त्री के गर्भाशय में सबसे पहले स्त्री बीज व पुरुष शुक्राणु के मिलाप से एक अति सूक्ष्म मांस का गोला तैयार होता है। जिसमें सर्व प्रथम वलयाकार नाभी की निर्मिति होती है। जिसमेंं से निकली नलिका जब माता की अन्न नलिका से जुड़ती है तत्पश्चात उस गर्भ का सम्पूर्ण ढांचा तैयार हो जाता है। परन्तु जिसमेंं आत्मा नाम की चेतन सत्ता नहींं होती। 3 से लेकर साढ़े तीन महीनों के बीच के समय मेंं उस गर्भ में आत्मा नाम की इस सत्ता का माता के आंख, नाक एवं मुख के जरिये गर्भ में प्रवेश  होता है। आत्मा के प्रवेश होते ही गर्भ गर्भाशय में देखने, हिलने, डुलने, सुनने, बोलने, सोचने की कृति करना शुरू कर देता है। 

कारण की आत्मा के अपने कुछ शाश्वत गुण होते है, वह शरीर मेंं आते समय उन्हें ले आता है तथा शरीर से जाते समय उन्हें ले जाता हैं। जैसे सुनने की शक्ति, देखने की शक्ति, बोलने की शक्ति, सोचने की शक्ति, बुद्धि की शक्ति, श्वसन की शक्ति, स्पंदनों की शक्ति ये सभी आत्मा के साथ मेंं आती है, तथा आत्मा के साथ ही जाती है। 

शरीर तो केवल जरिया होता है, साधन है साध्य नहींं। अवचेतन है चेतन नहींं, चेतन सत्ता तो आत्मा है।

आत्मा तो एक अविनाशी ज्योति-बिन्दु स्वरूप चेतन सत्ता है, जो मानव देह में दोनों भृकुटी के बीच में निवास करती है। जैसे रात्रि को अंधकार में आकाश में जगमगाता हुआ तारा एक बिन्दु-सा दिखाई देता है, वैसे ही दिव्य-दृष्टि द्वारा आत्मा भी एक तारे की तरह ही चमकती दिखाई देती है।एक प्रसिद्ध पद में कहा भी है - 

“भृकुटी में चमकता है एक अजब तारा, गरीबां नूं साहिबा लगदा ए प्यारा।” 

आत्मा का वास भृकुटी में होने के कारण ही मनुष्य गहराई से सोचते है, अपयश के बारे में कहता है कि मेरे तो भाग्य खोटे है, आशंकित हो कहता है, तब भी वह यही हाथ लगता है।

आत्मा का यहाँ वास है यह ज्ञात होने के कारण ही भक्त-लोगों में भी यहाँ ही बिन्दी अथवा तिलक लगाने की प्रथा है। यहाँ आत्मा का अलौकिक सम्बन्ध बुद्धि मस्तिष्क से जुड़ा है और मस्तिष्क का सम्बन्ध  शरीर में फैले समस्त ज्ञान-तन्तुओं से है। सदैव आत्मा ही में पहले संकल्प उठता है और फिर मस्तिष्क तथा संवेदनाओं व तन्तुओं द्वारा व्यक्त होता है। आत्मा ही शान्ति अथवा दुःख का अनुभव करती तथा निर्णय करती है और उसी में संस्कार रहते है। 

अत: मन और बुद्धि आत्म से अलग नहीं उसकी अविभाज्य अंग है। परन्तु आज आत्मा स्वयं की इन समस्त शक्तियों  को भूलकर देह- स्त्री, पुरुष, बूढ़ा जवान इत्यादि पदरूप मान बैठी है। यह देह-अभिमान ही दुःख का कारण है।

उपरोक्त रहस्य को मोटर के ड्राईवर के उदाहरण द्वारा भी स्पष्ट होता है। शरीर मोटर के समान है तथा आत्मा इसका ड्राईवर है, अर्थात जैसे ड्राईवर मोटर का नियंत्रण करता है, उसी प्रकार आत्मा शरीर का नियंत्रण करती है। आत्मा के बिना शरीर निष्प्राण है, जैसे ड्राईवर के बिना मोटर। 

अत: परमपिता परमात्मा कहते है कि अपने आपको पहचानने से ही मनुष्य इस शरीर रूपी मोटर  को चला सकता है और अपने लक्ष्य (गन्तव्य स्थान) पर पहुंच सकता है। अन्यथा जैसे कि ड्राईवर कार चलाने में निपुण न होने के कारण दुर्घटना का शिकार बन जाता है और कार उसके यात्रियों को ही चोट लगाती है, इसी प्रकार जिस मनुष्य को अपनी पहचान नहीं है वह स्वयं तो दुखी और अशान्त होता ही है, साथ में अपने सम्पर्क में आने वाले मित्र-सम्बन्धियों को भी दुखी व अशान्त बना देता है। 

अत: सच्चे सुख व सच्ची शान्ति के लिए स्वयं को जानना अति आवश्यक है। यही है राजयोगी ज्ञान की प्रथम उपलब्धि...!!

- वृषाली सानप काले

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