आयु बढ़ती रही, पर आत्मपरिचय अधूरा रहा
जीवन की यात्रा जितनी बाहरी है, उतनी ही आंतरिक भी है। मनुष्य जन्म से लेकर मृत्यु तक अनेक अनुभवों, संबंधों, संघर्षों और उपलब्धियों से गुजरता है। समय उसके शरीर पर अपनी छाप छोड़ता है। बाल श्वेत हो जाते हैं, चेहरे पर झुर्रियाँ उभर आती हैं और आयु का अंक निरंतर बढ़ता जाता है। किंतु एक प्रश्न बार-बार मन को मथता है—क्या आयु के साथ मनुष्य स्वयं को भी जान पाता है, या केवल समय ही बीतता रहता है?
जीवन में अनेक ऐसे लोग देखने को मिलते हैं जो लंबे समय तक संसार में रहते हैं, अनगिनत अनुभव प्राप्त करते हैं, धार्मिक अनुष्ठान करते हैं, पूजा-पाठ में समय लगाते हैं, किंतु उनके व्यवहार में वही राग-द्वेष, ईर्ष्या, अहंकार, असत्य और तुलना के भाव बने रहते हैं। तब मन में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या केवल आयु का बढ़ जाना ही परिपक्वता का प्रमाण है? क्या वर्षों का अनुभव अपने-आप जीवन-बोध में परिवर्तित हो जाता है?
वास्तव में अनुभव और आत्मबोध दो भिन्न अवस्थाएँ हैं। अनुभव तो हर व्यक्ति को प्राप्त होते हैं, किंतु उनसे सीख लेना और स्वयं को समझना एक अलग साधना है। बहुत से लोग जीवन भर दूसरों को देखते हैं, उनकी कमियाँ और खूबियाँ पहचानते हैं, संसार की घटनाओं पर टिप्पणी करते हैं, पर कभी अपने भीतर झाँककर नहीं देखते। वे यह नहीं पूछते कि उनके विचारों का स्रोत क्या है, उनके व्यवहार को कौन-सी भावनाएँ संचालित कर रही हैं, और उनके मन में बार-बार उठने वाले राग-द्वेष का कारण क्या है।
मनुष्य का सबसे बड़ा विरोधाभास यही है कि वह संसार को जानने में तो जीवन व्यतीत कर देता है, पर स्वयं को जानने का प्रयास नहीं करता। वह दूसरों की भूलों को स्पष्ट देख लेता है, किंतु अपनी आदतों, दुर्बलताओं और आसक्तियों को पहचानने से बचता रहता है। यही कारण है कि कभी-कभी वृद्ध शरीर में भी अपरिपक्व मन दिखाई देता है। समय बीतता रहता है, पर चेतना वहीं ठहरी रहती है।
धार्मिकता के क्षेत्र में भी यह स्थिति देखने को मिलती है। अनेक लोग वर्षों तक पूजा-पाठ करते हैं, मंत्रों का जाप करते हैं, धार्मिक ग्रंथों का पाठ करते हैं, किंतु यदि उनके स्वभाव में करुणा, विनम्रता, सत्यनिष्ठा और समता का विकास नहीं होता, तो साधना का वास्तविक उद्देश्य अधूरा रह जाता है। धर्म केवल कर्मकांड नहीं, बल्कि आत्मपरिवर्तन का मार्ग है। यदि पूजा मन को निर्मल न बनाए, यदि भक्ति अहंकार को कम न करे और यदि साधना व्यवहार में मधुरता न लाए, तो व्यक्ति बाहरी धार्मिकता के बावजूद स्वयं से दूर ही बना रहता है।
स्वयं से दूर जीवन का सबसे बड़ा संकेत यह है कि व्यक्ति अपने भीतर के सत्य से आँखें चुराने लगता है। वह अपनी छवि को बचाने में अधिक रुचि रखता है, आत्मनिरीक्षण में नहीं। उसे यह जानने की उत्सुकता नहीं रहती कि वह वास्तव में क्या है; वह केवल यह चाहता है कि संसार उसे क्या समझे। परिणामस्वरूप जीवन बाहरी उपलब्धियों और सामाजिक मान्यताओं के बीच उलझकर रह जाता है।
इसके विपरीत, स्वयं के निकट आने वाला व्यक्ति धीरे-धीरे बदलने लगता है। वह अपने दोषों को स्वीकारने का साहस जुटाता है। वह दूसरों को दोष देने से पहले स्वयं को परखता है। वह जानता है कि जीवन का सबसे कठिन और सबसे महत्वपूर्ण परिचय स्वयं से होता है। यही परिचय उसे विनम्र बनाता है, और यही उसे भीतर से स्वतंत्र भी करता है।
शायद जीवन का वास्तविक उद्देश्य केवल लंबी आयु प्राप्त करना नहीं, बल्कि चेतना का विकास करना है। वर्षों की संख्या बढ़ जाना महत्वपूर्ण नहीं, महत्वपूर्ण यह है कि उन वर्षों ने हमें कितना जागरूक बनाया। यदि मनुष्य स्वयं को जाने बिना ही जीवन व्यतीत कर दे, तो वह संसार के अनेक मार्गों पर चलकर भी अपनी मंज़िल से दूर रह सकता है।
अंततः यही कहा जा सकता है कि जीवन का सबसे बड़ा आश्चर्य यह नहीं कि लोग बूढ़े हो जाते हैं, बल्कि यह है कि बहुत से लोग स्वयं को जाने बिना ही बूढ़े हो जाते हैं। शरीर वृद्ध हो जाता है, किंतु आत्मपरिचय अधूरा रह जाता है। इसलिए आवश्यक है कि हम समय के साथ केवल आयु न बढ़ाएँ, बल्कि अपने भीतर उतरने का साहस भी विकसित करें। क्योंकि जो स्वयं को जान लेता है, वही जीवन को वास्तव में जान पाता है।
— कौशल्या वाघेला ‘कुंदन’ ✍️🌿
जय श्री राम जी। 🙏🏻🌸

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