(यह लेख असत्य की प्रशंसा नहीं, बल्कि उस मानसिकता पर चिंतन है जो तब जन्म लेती है जब सत्य की उपेक्षा होने लगती है। जब झूठ को सफलता मिलती दिखाई देती है, तब उसका प्रभाव केवल एक व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरे समाज के नैतिक आधार को प्रभावित करता है।)
मनुष्य का जीवन केवल भौतिक आवश्यकताओं पर नहीं टिका होता। उसकी नींव विश्वास, नैतिकता, न्याय और सत्य जैसे मूल्यों पर भी आधारित होती है। जब ये मूल्य दृढ़ रहते हैं, तब समाज में संतुलन बना रहता है। किंतु जब सत्य को दबाया जाने लगे और असत्य को सफलता का मार्ग समझ लिया जाए, तब समाज के भीतर एक धीमा किंतु गहरा परिवर्तन आरंभ हो जाता है।
बचपन से सुनते आए हैं कि “साँच को आँच नहीं आती।” यह कहावत मन में विश्वास जगाती थी कि सत्य चाहे कितनी भी कठिन परिस्थितियों से गुज़रे, अंततः सुरक्षित रहेगा। परंतु जीवन के कुछ अनुभव ऐसे होते हैं जो इस विश्वास को झकझोर देते हैं।
जब सत्य के पक्ष में खड़े प्रमाण मिटा दिए जाएँ, जब शब्दों के अर्थ बदल दिए जाएँ, जब गवाह अपनी बात से मुकर जाएँ और झूठ को इस प्रकार प्रस्तुत किया जाए कि वही सत्य प्रतीत होने लगे, तब मन व्याकुल हो उठता है। उस समय ऐसा लगता है मानो सत्य केवल पराजित नहीं हुआ, बल्कि उसके अस्तित्व के चिह्नों को भी मिटा दिया गया है।
ऐसे क्षणों में न्याय की देवी की आँखों पर बंधी पट्टी भी एक प्रश्न बनकर सामने खड़ी हो जाती है। कहा जाता है कि यह पट्टी निष्पक्षता का प्रतीक है, ताकि न्याय धन, शक्ति, संबंध और प्रभाव से प्रभावित न हो। किंतु जब सत्य असहाय दिखाई देता है, तब एक पीड़ित मन पूछ बैठता है— क्या यह पट्टी निष्पक्षता की है या उस सत्य को न देख पाने का प्रतीक, जो सहायता की प्रतीक्षा में खड़ा है?
यह प्रश्न किसी व्यवस्था के विरुद्ध विद्रोह नहीं, बल्कि एक आहत अंतर्मन की वेदना है।
परंतु मेरी चिंता केवल किसी एक व्यक्ति या एक घटना तक सीमित नहीं है। चिंता इस बात की है कि जब-जब सत्य पराजित दिखाई देता है, तब-तब असत्य का साहस बढ़ता जाता है। छल करने वालों को यह विश्वास मिलने लगता है कि प्रभाव, चतुराई और कपट के बल पर सब कुछ प्राप्त किया जा सकता है। धीरे-धीरे ईमानदारी को मूर्खता और बेईमानी को बुद्धिमत्ता समझा जाने लगता है।
यहीं से जन्म लेती है असत्य की खुमारी।
यह खुमारी किसी नशे की भाँति होती है। इसमें व्यक्ति अपने लाभ के अतिरिक्त कुछ नहीं देखता। वह यह नहीं सोचता कि उसका कार्य उचित है या अनुचित; वह केवल यह देखता है कि उससे उसे कितना लाभ होगा। नैतिकता, संवेदनशीलता और न्याय जैसे मूल्य धीरे-धीरे जीवन के केंद्र से हटकर किसी उपेक्षित कोने में रख दिए जाते हैं।
जब झूठ को बार-बार सफलता मिलती दिखाई देती है, तब नई पीढ़ी के सामने भी एक गलत उदाहरण स्थापित होता है। लोग यह मानने लगते हैं कि सत्य आवश्यक नहीं है, सफलता आवश्यक है; चाहे वह किसी भी मार्ग से प्राप्त हुई हो। तब झूठ बोलने में संकोच नहीं रह जाता, छल करने में अपराधबोध नहीं रहता और धोखा देना सामान्य व्यवहार प्रतीत होने लगता है।
इतिहास साक्षी है कि जब किसी समाज के नैतिक आधार कमजोर होते हैं, तब उसका प्रभाव केवल वर्तमान पर नहीं, आने वाले समय पर भी पड़ता है। मनुष्य का आचरण उसके विचारों को जन्म देता है और विचार समाज की दिशा तय करते हैं। यदि समाज में यह धारणा स्थापित हो जाए कि असत्य अधिक लाभकारी है, तो धीरे-धीरे सत्य का मार्ग चुनने वालों की संख्या कम होने लगती है।
सबसे बड़ी विडंबना यह है कि असत्य की विजय केवल एक व्यक्ति की विजय नहीं होती; वह अनेक लोगों के मन में यह भ्रम भी उत्पन्न कर देती है कि छल ही सफलता का सबसे सरल मार्ग है। और जब यह भ्रम व्यापक हो जाता है, तब समाज का नैतिक पतन आरंभ हो जाता है।
फिर भी एक प्रश्न शेष रहता है— क्या सत्य वास्तव में समाप्त हो सकता है?
मेरा उत्तर है— नहीं।
सत्य को दबाया जा सकता है, उसके प्रमाण नष्ट किए जा सकते हैं, उसकी आवाज़ को कमजोर किया जा सकता है, किंतु जो वास्तव में घटित हुआ है उसे बदला नहीं जा सकता। असत्य लोगों की धारणा बदल सकता है, वास्तविकता नहीं।
हाँ, यह स्वीकार करना होगा कि सत्य की यह स्थिति अत्यंत पीड़ादायक है। क्योंकि मनुष्य केवल सत्य का अस्तित्व नहीं चाहता, वह उसकी प्रतिष्ठा भी चाहता है। वह चाहता है कि सत्य को पहचाना जाए, उसका सम्मान हो और छल को छल कहा जाए।
आज जब मैं समाज के अनेक रूपों को देखती हूँ, तो मन में यही प्रश्न उठता है कि यदि असत्य की खुमारी इसी प्रकार बढ़ती रही, तो आने वाली पीढ़ियों को हम कौन-सा समाज सौंपेंगे? ऐसा समाज जहाँ सत्य केवल पुस्तकों और उपदेशों में रह जाए और व्यवहार में कपट का सम्मान होने लगे?
शायद समय आ गया है कि हम स्वयं से यह प्रश्न पूछें— क्या हम सत्य के साथ खड़े हैं, या असत्य की खुमारी में खोते जा रहे हैं?
क्योंकि किसी भी समाज का भविष्य उसके भवनों, उसकी संपत्ति या उसकी तकनीक से नहीं, बल्कि उसके नैतिक मूल्यों से तय होता है। और जब सत्य कमजोर पड़ता है, तब वास्तव में पूरा समाज कमजोर पड़ने लगता है।
सत्य की राह कठिन हो सकती है, उसकी आवाज़ क्षीण पड़ सकती है, उसके प्रमाण मिटाए जा सकते हैं; परंतु उसके अस्तित्व को समाप्त नहीं किया जा सकता। यही विश्वास मानवता की सबसे बड़ी आशा है और यही वह दीप है जो अंधकार के सबसे घने क्षणों में भी बुझना नहीं चाहिए।
– कौशल्या वाघेला ‘कुंदन’

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