क्या हिंदी अपनी पहचान खो रही है?
यह प्रश्न मेरे मन में बार-बार उठता है। जिस हिंदी को करोड़ों भारतीय बोलते हैं, जिस हिंदी में हमारे विचार, भावनाएँ, संस्कृति और जीवन की धड़कन बसती है, वही हिंदी आज अपने ही घर में सम्मान के लिए संघर्ष करती दिखाई देती है। अनेक बार ऐसा प्रतीत होता है कि अंग्रेज़ी बोलने वाले व्यक्ति को अधिक योग्य, आधुनिक और शिक्षित माना जाता है, जबकि हिंदी में अपनी बात रखने वाले व्यक्ति को कम आँका जाता है। क्या किसी मनुष्य की योग्यता केवल उसकी भाषा से निर्धारित की जा सकती है? यदि नहीं, तो फिर हिंदी भाषी व्यक्ति को हीन दृष्टि से क्यों देखा जाता है?
हिंदी भाषा मेरे लिए केवल अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं है, बल्कि मेरी पहचान का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह भाषा करोड़ों भारतीयों को एक-दूसरे से जोड़ती है। उत्तर से दक्षिण और पूर्व से पश्चिम तक हिंदी ने संवाद का एक ऐसा सेतु बनाया है, जिसने भौगोलिक दूरियों को कम करने का कार्य किया है। हिंदी केवल शब्दों का समूह नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, परंपरा, संवेदनाओं और जीवन-मूल्यों की वाहक है।
यद्यपि मेरी मातृभाषा गुजराती है, तथापि मैंने अपने लेखन के लिए हिंदी को चुना। इसका कारण यह नहीं कि मुझे गुजराती से कम प्रेम है, बल्कि यह है कि हिंदी के माध्यम से मैं अपने विचारों और अनुभवों को अधिक व्यापक पाठक-वर्ग तक पहुँचा सकती हूँ। यदि मेरी कोई रचना किसी पाठक के जीवन में प्रेरणा, सांत्वना या मार्गदर्शन का कारण बन सके, तो मैं अपने लेखन को सार्थक मानूँगी। यही भावना मुझे हिंदी साहित्य की ओर आकर्षित करती है।
आज के समय में अंग्रेज़ी को सफलता, आधुनिकता और उच्च शिक्षा का प्रतीक माना जाता है। निस्संदेह अंग्रेज़ी एक महत्वपूर्ण वैश्विक भाषा है और उसका ज्ञान अनेक क्षेत्रों में उपयोगी भी है। परंतु समस्या तब उत्पन्न होती है जब अंग्रेज़ी को ज्ञान का पर्याय और हिंदी को पिछड़ेपन का प्रतीक मान लिया जाता है। अनेक लोग किसी व्यक्ति की योग्यता का मूल्यांकन उसकी भाषा के आधार पर करने लगते हैं। यदि कोई व्यक्ति अंग्रेज़ी में धाराप्रवाह बोलता है तो उसे बुद्धिमान माना जाता है, जबकि हिंदी में बोलने वाले व्यक्ति को कई बार कमतर समझ लिया जाता है। यह दृष्टिकोण न केवल हिंदी के प्रति अन्याय है, बल्कि उन करोड़ों लोगों के ज्ञान और अनुभवों का भी अनादर है, जो अपनी मातृभाषा या हिंदी के माध्यम से शिक्षा प्राप्त करते हैं।
मेरे जीवन में भी ऐसे अवसर आए हैं जब लोगों की प्रतिक्रियाओं ने मुझे सोचने पर विवश किया। जब मैंने अपने अध्ययन का विषय हिंदी बताया, तो कुछ लोगों के चेहरे पर आश्चर्य और उपेक्षा के भाव दिखाई दिए। मानो हिंदी कोई साधारण या कम महत्व की भाषा हो। उस समय मन में प्रश्न उठा कि क्या किसी भाषा का मूल्य केवल उसके आर्थिक लाभ से निर्धारित किया जा सकता है? क्या किसी भाषा का सम्मान केवल इसलिए बढ़ जाता है कि उससे अधिक रोजगार के अवसर प्राप्त होते हैं?
अपने एक शोधकार्य के दौरान मुझे हिंदी भाषा के बारे में अनेक रोचक तथ्य जानने का अवसर मिला। तब ज्ञात हुआ कि हिंदी केवल भारत तक सीमित नहीं है, बल्कि विश्व के अनेक देशों में पढ़ी और पढ़ाई जाती है। अनेक विदेशी विश्वविद्यालयों में हिंदी अध्ययन के विभाग स्थापित हैं। हिंदी विश्व की प्रमुख भाषाओं में स्थान रखती है और करोड़ों लोग इसे बोलते और समझते हैं। यह तथ्य हिंदी की व्यापकता और उसकी वैश्विक स्वीकार्यता को सिद्ध करते हैं। यदि कोई भाषा विश्व के अनेक देशों तक पहुँच चुकी है, तो यह उसके सामर्थ्य और प्रभाव का प्रमाण है।
फिर भी एक विरोधाभास दिखाई देता है। जिस भाषा को विश्व के अनेक भागों में सम्मानपूर्वक सीखा जा रहा है, उसी भाषा को उसके अपने देश में कई बार अपेक्षित सम्मान नहीं मिलता। हिंदी दिवस और हिंदी पखवाड़े जैसे आयोजन हमें हिंदी के महत्व की याद दिलाते हैं। परंतु कभी-कभी मन में यह प्रश्न भी उठता है कि क्या हम अपनी ही भाषा के प्रति उदासीन होते जा रहे हैं? क्या कारण है कि हमें अपनी भाषा के महत्व को बार-बार स्मरण कराना पड़ता है, जबकि विदेशी भाषाओं के प्रति आकर्षण स्वतः दिखाई देता है?
यहाँ यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि किसी भाषा का सम्मान करने का अर्थ दूसरी भाषा का विरोध करना नहीं है। अंग्रेज़ी सीखना आवश्यक है, अन्य भाषाओं का ज्ञान भी उपयोगी है। ज्ञान की कोई सीमा नहीं होती और भाषा सीखना सदैव स्वागत योग्य है। किंतु अपनी ही भाषा को हीन समझना और उसके बोलने वालों को कमतर आँकना उचित नहीं कहा जा सकता। जिस प्रकार हम अन्य भाषाओं का सम्मान करते हैं, उसी प्रकार अपनी भाषा को भी सम्मान मिलना चाहिए।
भाषा केवल संप्रेषण का माध्यम नहीं होती; वह किसी समाज की संस्कृति, इतिहास, परंपराओं और सामूहिक स्मृतियों की संरक्षक भी होती है। हिंदी में करोड़ों लोगों के सपने, संघर्ष, भावनाएँ और जीवनानुभव समाहित हैं। हिंदी साहित्य की समृद्ध परंपरा, महान साहित्यकारों की रचनाएँ और जनसामान्य की बोलचाल इस भाषा को विशेष बनाती हैं। इसलिए हिंदी का सम्मान करना केवल एक भाषा का सम्मान करना नहीं, बल्कि अपनी सांस्कृतिक पहचान का सम्मान करना है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि हम भाषा के आधार पर मनुष्यों का मूल्यांकन करना बंद करें। किसी व्यक्ति की योग्यता उसके ज्ञान, विचार, चरित्र, कर्म और मानवता से निर्धारित होनी चाहिए, न कि इस बात से कि वह कौन-सी भाषा बोलता है। अंग्रेज़ी जानना एक उपलब्धि हो सकती है, परंतु हिंदी जानना कोई कमी नहीं है। अपनी भाषा पर गर्व करना संकीर्णता नहीं, बल्कि आत्मसम्मान का परिचायक है।
अंततः प्रश्न यह नहीं है कि हिंदी महान है या अंग्रेज़ी। प्रश्न यह है कि क्या हम अपनी भाषाओं के प्रति संतुलित और सम्मानपूर्ण दृष्टिकोण रख पाते हैं? जिस दिन हम यह समझ लेंगे कि प्रत्येक भाषा अपने भीतर एक संस्कृति और एक संसार को समेटे हुए है, उसी दिन हिंदी को उसकी वास्तविक पहचान और सम्मान प्राप्त हो जाएगा।
हिंदी को अपनी पहचान सिद्ध करने की आवश्यकता नहीं है; आवश्यकता केवल हमारी दृष्टि बदलने की है।
— कौशल्या वाघेला ‘कुंदन’

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